भारत सरकार दुनिया भर के देशों को पाकिस्तान की आतंकवादी गतिविधियों और उसके खिलाफ हुई सैन्य कार्रवाई यानी ऑपरेशन सिंदूर के बारे में बताने के लिए सात डेलिगेशन भेज रही है। इनमें से दो प्रतिनिधिमंडल की अध्यक्षता भाजपा के सांसद कर रहे हैं और दो का नेतृत्व उसकी सहयोगी पार्टियों जनता दल यू और शिव सेना के सांसद कर रहे हैं।
बाकी तीन का नेतृत्व विपक्षी पार्टियों के सांसदों के हाथ में है। कांग्रेस के शशि थरूर, शरद पवार की एनसीपी की सुप्रिया सुले और डीएमके से कनिमोझी इनका नेतृत्व कर रहे हैं। डेलिगेशन को लेकर कांग्रेस की ओर से जो विवाद हुआ है उसको छोड़ें तो हर डेलिगेशन में दो बातें बहुत ध्यान देने वाली हैं। हर डेलिगेशन में सरकार ने कम से कम एक राजनयिक को रखा है और हर डेलिगेशन में कम से कम एक मुस्लिम सदस्य भी रखा गया है।
राजनयिक रखने की बात तो समझ में आती है कि वे डिप्लोमेसी की बारीकियों को जानते हैं और उस लिहाज से दुनिया के सामने भारत का पक्ष रखने में मदद करेंगे। लेकिन सवाल है कि भाजपा की केंद्र सरकार को हर डेलिगेशन में एक मुस्लिम प्रतिनिधि रखने की क्या जरुरत है? क्या यह हिप्पोक्रेसी नहीं है? गौरतलब है कि लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में भाजपा का एक भी मुस्लिम सांसद नहीं है।
सरकार के डेलीगेशन में मुस्लिम शामिल
भाजपा ने जान बूझकर लोकसभा चुनाव में किसी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया और राज्यसभा में भी मुस्लिम सांसदों का कार्यकाल समाप्त होता गया, वे रिटायर होते गए और उनकी जगह किसी मुस्लिम को उच्च सदन में नहीं लाया गया। एमजे अकबर, मुख्तार अब्बास नकवी और जफर उल इस्लाम उच्च सदन के सदस्य थे।
लेकिन अब एक भी नहीं है। सवाल है कि जब भाजपा ने एक रणनीति के तहत मुस्लिमों को लोकसभा की टिकट नहीं दी और राज्यसभा में नहीं भेजा और उसके नेता राज्यों में 80 व 20 की लड़ाई बनाते रहे तो अब दुनिया के सामने मुस्लिम प्रतिनिधि भेज कर सरकार क्या दिखाना चाहती है? वह क्यों नहीं इस सिद्धांत पर अडिग रही कि उसे मुस्लिमों की जरुरत नहीं है?
भाजपा किसी मुस्लिम को टिकट नहीं देगी, उसे सांसद और मंत्री नहीं बनाएगी लेकिन आतंकवाद और पाकिस्तान के बारे में दुनिया को बताना है तो इधर उधर से खोज कर सात मुस्लिम प्रतिनिधि भेजे जा रहे हैं। मुस्लिम देशों सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन आदि जा रहे डेलिगेशन का नेतृत्व बैजयंत पांडा कर रहे हैं। इसमें मुस्लिम सदस्य के रूप में एमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी को रखा गया है। यूरोपीय देशों जैसे फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन आदि जाने वाले डेलिगेशन का नेतृत्व रविशंकर प्रसाद कर रहे हैं।
इसमें मुस्लिम सदस्य के तौर पर एमजे अकबर हैं। ऐसे ही जदयू नेता संजय झा के नेतृत्व वाले डेलिगेशन में सलमान खुर्शीद हैं। शिव सेना नेता एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली कमेटी में मुस्लिम लीग के ईटी मोहम्मद बशीर हैं। शशि थरूर के नेतृत्व वाले डेलिगेशन में झारखंड मुक्ति मोर्चा के सरफराज अहमद हैं।
कनिमोझी की अध्यक्षता वाली कमेटी में नेशनल कॉन्फ्रेंस के मियां अल्ताफ अहमद हैं और एक पूर्व राजदूत जावेद अशरफ हैं। सातवीं कमेटी सुप्रिया सुले के नेतृत्व वाली है, जिसमें पूर्व राजदूत सैयद अकबरूद्दीन को रखा गया है। सोचें, भाजपा ऐसा क्यों कर रही है? भाजपा को दुनिया के सामने ऐसा सेकुलर और समावेशी चेहरा दिखाने की क्या मजबूरी है? कायदे से तो उसे अपने कट्टर हिंदुवादी चेहरे भेजने चाहिए और उनके जरिए दुनिया में अपना नैरेटिव बनवाना चाहिए।
Also Read: एक अवांछित कड़वाहट
Pic Credit: ANI