शुक्रवार, 21 अगस्त को आऱक्षण विरोधी आंदोलन की मीडिया में चर्चा ज्यादा नहीं हुई क्योंकि राहुल गांधी संसद मार्ग थाने पहुंच गए थे और कई घंटे वहां धरने पर बैठे रहे थे। लेकिन सोशल मीडिया में इसकी खूब चर्चा हुई। असल में जंतर मंतर पर आऱक्षण के विरोध में बड़ा आंदोलन हुआ। हजारों की संख्या में लोग जुटे थे और देर शाम पुलिस को बल प्रयोग करके आंदोलनकारियों को वहां से हटाना पड़ा था। यह पहला मौका था, जब इतना बड़ा आंदोलन हुआ और वह भी पूरी तरह से आर्गेनिक। कोई नेता या किसी पार्टी ने आंदोलन को न तो फंड किया था और न कोई समर्थन करने पहुंचा था। सिर्फ सोशल मीडिया के मोबिलाइजेशन से इतनी भीड़ उमड़ी थी।
प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व सोशल मीडिया में राइटविंग के सबसे बड़े इन्फ्लूएंसर्स में से एक अजीत भारती कर रहे थे। उनके साथ अनेक ऐसे राइटविंग इन्फ्लूएंसर थे, जो कुछ समय पहले तक खुल कर भाजपा का समर्थन करते रहे थे। लेकिन यूनिवर्सिटी और कॉलेज कैम्पस में समानता लाने के नाम पर जो यूजीसी ने इस साल फरवरी में जो दिशानिर्देश जारी किए उसके बाद ये सारे लोग नाराज हो गए और भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। ये अब भी कांग्रेस और लेफ्ट या दूसरी पार्टियों के खिलाफ लड़ते हैं और सनातन का समर्थन करते हैं लेकिन भाजपा और उसकी सरकारों का खुल कर विरोध करते हैं। यूजीसी के गाइडलाइन से लेकर आरक्षण तक या एससी, एसटी और ओबीसी को लेकर लाई जा रही नई योजनाओं का तार्किक तरीके से यह समूह विरोध करता है।
जंतर मंतर पर आंदोलन करने वाला यह समूह क्लेम कर रहा है कि सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने यूजीसी के दिशानिर्देशों पर पुनर्विचार की जो बात कही है वह इनके दबाव का नतीजा है। इनका कहना है कि फॉर्म भरने की फीस से लेकर दूसरी तमाम रियायतें जो सरकार एससी, एसटी और ओबीसी को दे रही है वह ईडब्लुएस को भी देनी होगी। इसके अलावा आरक्षण की समीक्षा की मांग उठाई है। अभी इसके असर का आकलन नहीं किया जा सकता है। कम से कम सोशल मीडिया में और धारणा के स्तर पर तो दिख रहा है कि इनके रुख का भाजपा को नुकसान हो रहा है।
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