चुनावी राजनीति में कई बार संख्या धोखा देने वाला फैक्टर होता है। बड़ी संख्या कई बार नेता और पार्टियों की ताकत नहीं बढ़ाती है तो कई बार कम संख्या बहुत ताकतवर बना देती है। बिहार इसकी मिसाल है। 2020 के विधानसभा चुनाव के बाद बिहार विधानसभा का अंकगणित ऐसा बना कि सिर्फ 43 सीट लेकर नीतीश सबसे शक्तिशाली रहे और दोनों सबसे बड़ी पार्टियों को अपने इशारे पर नचाया। लेकिन वही नीतीश 2025 के चुनाव के बाद 85 सीट लेकर भी इतने असहाय हो गए कि मुख्यमंत्री पद से हटा दिए गए और भाजपा का सीएम बन गया।
संख्या की यही कहानी तमिलनाडु में भी दोहराई जा रही है। पिछली विधानसभा में कांग्रेस ने 18 विधानसभा सीटें जीती थीं लेकिन डीएमके ने उसे सरकार में शामिल नहीं किया। वह इस सिद्धांत पर अड़ी रही कि सरकार सिर्फ डीएमके की बनेगी। असल में दोनों द्रविडियन पार्टियों ने 1967 के बाद से ही यह सिद्धांत अपनाया है। वे किसी भी सहयोगी पार्टी को सरकार में नहीं शामिल करती हैं। सो, एमके स्टालिन ने कांग्रेस को सरकार में नहीं शामिल किया। चूंकि डीएमके को अकेले दम पर बहुमत हासिल था इसलिए कांग्रेस कुछ कर भी नहीं सकी।
परंतु मौजूदा विधानसभा में हालात ऐसे बने कि सिर्फ पांच सीट जीतने वाली कांग्रेस को 60 साल के बाद सरकार में शामिल होने का मौका मिल गया। कांग्रेस के पांच में से दो विधायक मंत्री बने हैं। कांग्रेस विधायक दल के नेता एस राजेश कुमार और पी विश्वनाथन को मंत्री पद की शपथ दिलाई गई है। असल में राज्य की सबसे बड़ी पार्टी टीवीके को 107 सीटें मिली हैं, जो बहुमत से कम है। सो, कांग्रेस की लॉटरी निकल गई। अब माना जा रहा है कि यहां से कांग्रेस की वापसी का दौर शुरू हो सकता है। राज्य अत्यधिक द्रविडियन राजनीति के बाद कांग्रेस को अपने लिए मौका बनता दिख रहा है।
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