भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा में अपनी सीटों की संख्या में अच्छा खासा इजाफा कर लिया है। इस साल के दोवार्षिक चुनावों की घोषणा से पहले भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के पास 126 सीटें थीं, जो बढ़ कर 132 हो गई हैँ। यानी छह सीटों का फायदा हुआ है। हालांकि पहले जो 126 सीटें थीं, उनमें से ओडिशा की दो सीटें दलबदल के जरिए हासिल हुई थीं। राज्य में भाजपा की सरकार बनने के बाद नवीन पटनायक की बीजू जनता दल के दो सांसदों ममता मोहंता और सुजीत कुमार ने पाला बदला था। इस बार भाजपा ने ममता मोहंता को टिकट नहीं दिया। उनकी जगह अपने प्रदेश अध्यक्ष मनमोहन सामल को पार्टी ने टिकट दिया।
इन दो सीटों के अलावा भाजपा ने एक सीट अतिरिक्त ओडिशा में हासिल की। उसने पूर्व कोयला मंत्री और कारोबारी दिलीप रे को निर्दलीय उम्मीदवार बना कर बीजू जनता दल और कांग्रेस के साझा उम्मीदवार डॉक्टर दत्तेश्वर होता को चुनाव हरवा दिया। कांग्रेस और बीजद दोनों के कई विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की। कांग्रेस की तो इकलौती महिला विधायक सोफिया फिरदौस ने ही क्रॉस वोटिंग कर दी, जबकि कांग्रेस ने अपनी ओर से पहल की थी कि अगर नवीन पटनायक किसी प्रसिद्ध ओडिया व्यक्ति को उम्मीदवार बनाते हैं तो वह उनका समर्थन करेगी।
बहरहाल, भाजपा ने निर्धारित सीट से एक सीट ज्यादा बिहार में भी हासिल की। बिहार में विपक्षी महागठबंधन के पास 41 विधायक थे और एक सीट जीतने के लिए इतने ही वोट की जरुरत थी। लेकिन वहां भी भाजपा ने निर्विरोध चुनाव नहीं होने दिया। एनडीए ने पांचों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए। इसके बाद बड़े पैमाने पर क्रॉस वोटिंग का प्रयास शुरू हुआ। विधायकों के पुराने मामले निकाले गए। उनको धमकी दिए जाने की खबर है। इसके अलावा कई चीजों का प्रलोभन दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस के तीन और राजद के एक विधायक वोटिंग से गैरहाजिर हो गए। राजद के तो मुस्लिम विधायक फैसल ने वोट नहीं डाला। बताया गया कि वे ओवैसी की पार्टी के साथ आने से नाराज थे क्योंकि ओवैसी ने उनके खिलाफ उम्मीदवार उतारा था। यह भी कहा गया कि वे अपनी मां के इलाज के लिए दिल्ली में थे। लेकिन उनके चुनाव क्षेत्र में चर्चा है कि गुवाहाटी में एक पुराने मर्डर केस में उनकी फाइल निकाली गई थी।
बहरहाल, असम में भाजपा को एक सीट का फायदा बिना लड़े हो गया। वहां भी कांग्रेस और बदरूद्दीन अजमल की पार्टी के पास एक सीट जीतने के लिए जरुरत से ज्यादा वोट थे। लेकिन इससे पहले भी निर्दलीय अजीत कुमार भुइंयां वहां से जीते थे और इस बार तीसरी सीट पर भाजपा ने अपनी सहयोगी यूपीपीएल के नेता प्रमोद बोडो को उम्मीदवार बना दिया था। चूंकि कांग्रेस और एआईयूडीएफ के बीच तालमेल नहीं है और विधानसभा चुनाव होने वाले हैं इसलिए किसी की ओर से पहल नहीं की गई। दोनों पार्टियां अलग अलग लड़ रही हैं और चुनाव में अलग अलग दिखना भी चाहती हैं। इसलिए दोनों ने पहल नहीं की।
इसका नतीजा यह हुआ कि चौथा उम्मीदवार चुनाव में नहीं आया। दो सीटें भाजपा के खाते में गईं और एक अतिरिक्त सीट उसकी सहयोगी यूपीपीएल को मिल गई। गौरतलब है कि भाजपा ने पिछले दिनों बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ भी तालमेल किया, जिससे प्रमोद बोडो नाराज चल रहे थे। अब चुनाव से पहले उनको भी राज्यसभा भेज दिया। अपनी संख्या के दम पर भाजपा और एनडीए को जो फायदा हुआ वह अपनी जगह है लेकिन बिना संख्या के बिहार, असम, और ओडिशा में एनडीए को तीन सीटों का फायदा हो गया।


