अब राहुल गांधी बैकग्राउंड में चले गए हैं। उनके साथ अक्सर ऐसा होता है। वे कोई मुद्दा उठाते हें और उसे बीच में ही छोड़ देते हैं। वे अब वोट की लूट और चुनाव आयोग की कथित गड़बड़ियों का मुद्दा नहीं उठा रहे हैं। लेकिन ममता बनर्जी ऐसा नहीं करती हैं। वे कोई मुद्दा उठाती हैं तो जब तक उसको किसी नतीजे पर नहीं पहुंचाती हैं या उससे अपना राजनीतिक लक्ष्य हासिल नहीं कर लेती हैं तब तक उसे छोड़ती नहीं हैं। अभी उनके निशाने पर चुनाव आयोग है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर शुरू होने के दिन से वे आयोग के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। आयोग ने भी एसआईआर में 60 लाख नाम काटने के बाद दूसरे चरण में तीन लाख नाम और काट दिए। फिर उसके बाद 60 लाख से ज्यादा नाम विचाराधीन श्रेणी में डाल दिया। इस तरह पश्चिम बंगाल में एक करोड़ 23 लाख नाम कटने का खतरा पैदा हो गया।
ममता बनर्जी इसकी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ रही हैं। वे खुद वकील बन कर अदालत में खड़ी हुईं और दलीलें रखीं। सड़क पर उनकी लड़ाई चल रही है। उन्होंने पिछले शुक्रवार को चुनाव आयोग के खिलाफ धरना शुरू किया। जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार बाकी आयुक्तों के साथ चुनाव तैयारियों पर विचार के लिए कोलकाता पहुंचे तो ममता समर्थकों ने उनके खिलाफ प्रदर्शन किया। और अब ममता की पार्टी संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रही हैं। उनकी पार्टी ने इस बारे में विपक्षी नेताओं से बात की है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस और अन्य पार्टियां सहमत हैं। सबको पता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए सदन में मौजूद और वोट करने वाले सदस्यों में से दो तिहाई का समर्थन चाहिए। विपक्ष के पास साधारण बहुमत नहीं है तो विशेष बहुमत के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है। फिर भी ममता बनर्जी सड़क से संसद और सुप्रीम कोर्ट तक लड़ने का मैसेज बनाना चाह रही हैं।
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