अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के प्रबंधन का मामला उलझता जा रहा है। ऐसा लग रहा है कि मंदिर प्रबंधन संभालने के लिए सीईओ के चयन को उलझाने या उसमें देरी कराने का प्रयास किया जा रहा है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव पद से चंपत राय ने इस्तीफा दे दिया है लेकिन उनकी आत्मा वही है। ट्रस्ट में उनकी स्थिति को लेकर स्पष्टता नहीं है। माना जा रहा है कि वे ट्रस्ट में बने हुए हैं। कुछ दिन पहले खबर आई थी कि वे वापस महासचिव का पद भी हासिल करना चाहते हैं। अगर महासचिव का पद नहीं मिले तब भी वे मंदिर प्रबंधन अपने हाथ से नहीं निकलने देना चाहते हैं। उनके हाथ से निकाल कर मंदिर का प्रबंधन कौन संभालना चाहता है यह स्पष्ट नहीं है लेकिन उन्होंने जिस तरह से नृपेंद्र मिश्रा को निशाना बनाया है उससे लग रहा है कि दूसरा खेमा उनका है। याद करें कैसे मंदिर में चढ़ावा चोरी का विवाद होने के बाद नृपेंद्र मिश्रा ने इसे बड़ा पाप बताया था। एसआईटी की जांच से पहले ही उनका बयान आ गया था। अब चंपत राय की एक कथित चिट्ठी वायरल हो रही है, जिसमें वे नृपेंद्र मिश्रा के ऊपर तमाम तरह से आरोप लगा रहे हैं।
हालांकि नृपेंद्र मिश्रा ने कहा है कि ऐसी कोई चिट्ठी चंपत राय लिख ही नहीं सकते हैं और दूसरी ओर चंपत राय खामोश हो गए हैं। लेकिन नौ पन्नों की उनकी चिट्ठी इस बात का संकेत है कि मंदिर प्रबंधन का मुद्दा सुलझा नहीं है। भले चंपत राय, अनिल मिश्र और गोपाल राव रोमजर्रा के प्रबंधन के काम से बाहर हो गए हैं लेकिन जो नई व्यवस्था बन रही है उस पर भी चंपत राय अपना नियंत्रण रखना चाहते हैं। गौरतलब है कि दो जुलाई को हुई ट्रस्ट की बैठक में एक तीन सदस्यों की कमेटी बनी थी, जिसने मंदिर का प्रबंधन संभालने के लिए मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी सीईओ चुनने के लिए सैकड़ों लोगों के इंटरव्यू किए हैं। सीईओ के चयन का मामला अंतिम चरण में है।
बताया जा रहा है कि आखिरी 110 लोगों का इंटरव्यू करने के बाद टीम तीन लोगों के नाम शॉर्टलिस्ट कर रही है और सितंबर के पहले हफ्ते में नए सीईओ की नियुक्ति हो जाएगी। लेकिन उससे ठीक पहले चंपत राय की चिट्ठी सामने आई। बताया जा रहा है कि इस चिट्ठी का मकसद मामले को उलझाना और देरी कराना है। तभी सवाल है कि क्या तीन लोगों की कमेटी जो सीईओ चुन रही है वह विश्व हिंदू परिषद या चंपत राय की पसंद का नहीं है? क्या तीनों नाम ऐसे हैं, जो संघ, विहिप को पसंद नहीं है? यह भी सवाल पूछा जा रहा है कि क्या विहिप का मौजूदा नेतृत्व सीईओ वाली व्यवस्था को पटरी से उतारने की कोशिश कर रहा है और वापस महासचिव वाली व्यवस्था बहाल करना चाह रहा है? ध्यान रहा उत्तर प्रदेश सरकार की बनाई एसआईटी की जांच रिपोर्ट आ गई है और उसमें चंपत राय और अनिल मिश्र को क्लीन चिट दी गई है। पर चंपत उतने से संतुष्ट नहीं हैं। वे अब वापसी चाहते हैं। लग रहा है कि नृपेंद्र मिश्र उनकी वापसी में बाधा हैं। इसलिए उन पर मनमानी करने, मंदिर निर्माण के लिए एलएंडटी को चुनने, एनबीसीसी के तत्कालीन चेयरमैन से मीटिंग करने या निर्माण समिति अगंभीर लोगों को रखने के आरोप लग रहे हैं।
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