पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत के बाद इस पर कोई संदेह नहीं होना चाहिए था कि कौन मुख्यमंत्री बनेगा। शुभेंदु अधिकारी पिछले पांच साल से भाजपा के चेहरे के तौर पर लड़ रहे थे। उन्होंने सड़क पर उतर कर उसी तरह से संघर्ष किया है, जैसे ममता बनर्जी पहले लेफ्ट से लड़ती रही थीं। शुभेंदु वैसे भी ममता की ही पाठशाला से प्रशिक्षित नेता हैं। उन्होंने एक इतिहास यह भी बनाया है कि लगातार दो चुनावों में मुख्यमंत्री को हराया। पहले 2021 में नंदीग्राम सीट पर ममता को हराया और फिर 2026 में भबानीपुर में भी उनको हराया। ममता भी मुख्यमंत्री पद पर रहते दो बार हारने वाली पहली नेता बन गई हैं। बहरहाल, शुभेंदु को जिस तरह से इस बार चुनाव में पेश किया गया था उससे भी लग रहा था कि वे मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार हैं।
लेकिन अब जबकि भाजपा 206 सीटें जीत कर सरकार बनाने जा रही है तो शुभेंदु अधिकारी के नाम का विरोध शुरू हो गया है। भाजपा के पुराने नेता उनके खिलाफ मोर्चा खोल रहे हैं। कई पुराने नेता, जिनकी आपस में नहीं बनती है वे एकजुट हो रहे हैं। पहले प्रदेश अध्यक्ष शामिक भट्टाचार्य के नाम की चर्चा हुई। इसके बाद अचानक दिलीप घोष के नाम की भी चर्चा शुरू हो गई है। ध्यान रहे दिलीप घोष के प्रदेश अध्यक्ष रहते भाजपा लोकसभा में दो सीट से 18 पहुंची थी और विधानसभा में तीन से 77 पहुंची थी। हालांकि उसके बाद वे हाशिए में चले गए थे। परंतु इस बार विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार शुरू होने से पहले अमित शाह जब कोलकाता पहुंचे तो उन्होंने दिलीप घोष को बुलवाया और पूरे प्रदेश में दौरा करने को कहा। जिम्मेदारी मिलने के बाद दिलीप घोष सक्रिय हुए। वे खड़गपुर से विधानसभा का चुनाव जीते हैं।
सो, शुभेंदु अधिकारी के चैलेंजर के रूप में शामिक भट्टाचार्य और दिलीप घोष को आगे किया गया है। केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार के समर्थक उनके भी नाम की चर्चा चलाए हुए हैं। इसी तरह बिहार में जब भाजपा का पहला मुख्यमंत्री बनाने की बात आई तो शुद्धतावादी लोगों की कहना था कि पहला सीएम तो वह होना चाहिए, जो आरएसएस से जुड़ा रहा हो या भारतीय जनता पार्टी का अपना नेता हो लेकिन भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने सम्राट चौधरी को चुना। वह इसलिए हुआ क्योंकि बिहार की राजनीतिक वास्तविकताओं पर वे ही फिट बैठते हैं और इसलिए भाजपा ने कई साल पहले से उनको इस भूमिका के लिए तैयार किया था। वैसे ही पश्चिम बंगाल में भाजपा ने शुभेंदु अधिकारी को इस भूमिका के लिए तैयार किया है। उनको पिछली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया। इस बार उनको फिर से ममता बनर्जी के खिलाफ उतारना भी इस बात का संकेत है कि भाजपा उनके लिए बड़ी भूमिका सोच रही है।
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