ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस पार्टी ने एक ट्रेंड बना लिया है कि चुनाव नजदीक आएंगे तो अध्यक्ष बदलना है। एक के बाद एक राज्यों में यह ट्रेंड देखने को मिल रहा है। कांग्रेस के नेता भी इसका मजाक उड़ाने लगे हैं। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के मुख्यालय में पार्टी के एक नेता से पत्रकारों ने अनौपचारिक बातचीत में एक प्रदेश का अध्यक्ष बदलने के बारे में पूछा तो उन्होंने मजाक में कहा कि चुनाव नजदीक आने के इंतजार कीजिए। सोचें, यह क्या रणनीति है? जिस नेता को चार साल या पांच साल तक लगातार प्रदेश अध्यक्ष बना कर रखते हैं उसे चुनाव से ऐन पहले बदल देते हैं और नया अध्यक्ष ला देते हैं। पंजाब में अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को साढ़े चार साल तक अध्यक्ष बनाए रखा गया और चुनाव से चार महीने पहले उनको बदल कर परगट सिंह को प्रधानी दे दी। यह ज्यादा हैरान करने वाली बात इसलिए है क्योंकि दो महीने पहले तक तत्कालीन प्रभारी भूपेश बघेल कह रहे थे कि अध्यक्ष बदलना गुड्डे गुड़ियों का खेल नहीं है। उन्होंने दो टूक अंदाज में कहा था कि राजा वड़िंग रहेंगे। लेकिन अंत में बघेल भी बदले गए और वड़िंग भी गए।
इसके बाद एक और चुनावी राज्य उत्तर प्रदेश में अध्यक्ष बदला गया। तीन साल से अजय राय प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाल रहे थे और कांग्रेस की भाजपा विरोध की राजनीति को धार दे रहे थे। लेकिन ऐन चुनाव से पहले उनको हटा कर आराधना मिश्रा उर्फ मोना मिश्रा को अध्यक्ष बना दिया गया। वे कांग्रेस के राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी की बेटी हैं। वहां भी कुछ समय पहले कांग्रेस ने प्रभारी बदला था। सो, यह भी एक ट्रेंड देखा जा रहा है कि प्रभारी बदलो और फिर प्रभारी के हिसाब से अध्यक्ष बदल दो। इसी तरह का काम पिछले साल यानी 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव के समय भी किया गया था। कांग्रेस ने पहले मोहन प्रकाश को प्रभारी पद से हटाया और उसके बाद अखिलेश प्रसाद सिंह को अध्यक्ष पद से हटा दिया।
राहुल गांधी के करीबी कृष्णा अल्लावरू बिहार के प्रभारी बने और राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद सीट बंटवारे में जो बदमजगी हुई वह सबने देखी। पार्टी आलाकमान ने अंत में अशोक गहलोत को भेजा और तब जाकर सीट बंटवारा हुआ। इसके बावजूद कांग्रेस, राजद और लेफ्ट के बीच नौ सीटों पर दोस्ताना लड़ाई हुई। इसमें कांग्रेस की जीती हुई सीटें भी थीं। अंत नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस 16 से घट कर पांच सीट पर आ गई। आज बिहार में एमएलसी के चुनाव में भी कांग्रेस और राजद अलग अलग लड़ रहे हैं और सब एक दूसरे को हराने में लगे हैं। बिहार से पहले यही काम कांग्रेस ने झारखंड में किया था। 2024 के नवंबर में विधानसभा चुनाव से ऐन पहले तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर को हटा दिया गया। वे ढाई साल से प्रदेश का संगठन संभाल रहे थे। लेकिन चुनाव से तीन महीने पहले उनको हटा कर केशव महतो कमलेश को अध्यक्ष बनाया गया। हालांकि झारखंड में इसके बाद भी कांग्रेस सर्वाइव कर गई क्योंकि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मइया सम्मान योजना शुरू करके महिलाओं के खाते में हर महीने ढाई हजार रुपए भेजने शुरू कर दिए, जिसका लाभ पूरे गठबंधन को मिला। हेमंत सोरेन की सरकार वापस लौटी तो कांग्रेस भी लौट गई। लेकिन बिहार बिगड़ गया और पंजाब व यूपी में क्या होता है यह देखना होगा।
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