यह लाख टके का सवाल है कि तृणमूल कांग्रेस का क्या होगा? इसमें कोई संदेह नहीं है कि ममता बनर्जी सडक पर उतर कर लड़ने वाली नेता हैं और वे आसानी से भाजपा को सरकार नहीं चलाने देंगी। जिस तरह भाजपा को ओडिशा में कोई चुनौती नहीं मिल रही है वैसा पश्चिम बंगाल में नहीं होगा। वहां ममता बनर्जी लगातार सरकार से भिड़ती रहेंगी। लेकिन उम्र उनके साथ नहीं है। दूसरे, उन्होंने भतीजे अभिषेक बनर्जी को अपना उत्तराधिकारी बनाया है लेकिन उनकी छवि वैसी नहीं है, जैसी ममता की रही है। इसलिए पार्टी के ऊपर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। गौरतलब है कि चुनाव के बीच में यह अफवाह उड़ी थी कि तृणमूल कांग्रेस के 15 सांसद भाजपा के संपर्क में हैं। उनके कुछ राज्यसभा सांसदों के भी भाजपा के संपर्क में होने की बात कही गई थी। इसके जवाब में तृणमूल ने कहा कि भाजपा के सांसद ममता बनर्जी के संपर्क में हैं।
असल में चुनाव के दौरान भाजपा का यह माइंडगेम था, जिसके तहत यह साजिश थ्योरी प्रचारित की गई कि ममता बनर्जी के सांसद भाजपा के संपर्क में हैं। लेकिन अब क्या सचमुच ऐसा हो सकता है? क्या साजिश थ्योरी सही साबित हो सकती है? ध्यान रहे पश्चिम बंगाल का इतिहास ऐसा ही रहा है। लेफ्ट के लोग तो पार्टी छोड़ कर नहीं गए। लेकिन कांग्रेस के अनेक नेता पार्टी छोड़ कर गए। ममता बनर्जी की पूरी पार्टी कांग्रेस नेताओं से बनी है। इन नेताओं को सत्ता में रहने की आदत है। अगर उनको लगता है कि अब पश्चिम बंगाल में भाजपा भी कई सालों तक रहने वाली है तो वे पाला बदल सकते हैं। कहा जा रहा है कि भाजपा इसी लोकसभा में अपने सांसदों की संख्या बढ़ा कर बहुमत तक पहुंचना चाह रही है। इसलिए हैरानी नहीं होगी अगर बंगाल में ऑपरेशन लोटस शुरू हो। मुस्लिम बहुल इलाकों को छोड़ कर दूसरे इलाकों के सांसद पाला बदल सकते हैं। ममता की पार्टी के 29 सांसद हैं।


