केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तीन दिन तक बिहार के सीमांचल की यात्रा पर थे। य़ह बहुत असामान्य बात है कि केंद्रीय गृह मंत्री किसी इलाके में इतना लंबा प्रवास करें। आमतौर पर बड़े नेता अपने गृह प्रदेश या चुनाव क्षेत्र में भी इतना समय नहीं देते हैं। अमित शाह नक्सल प्रभावित इलाकों में भी रूके हैं। लेकिन सीमांचल का मामला थोड़ा अलग है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और घुसपैठ को लेकर सीमांचल में कई मीटिंग्स की। उनके साथ केंद्र और राज्य के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे। बिहार के उप मुख्यमंत्री सह गृह मंत्री सम्राट चौधरी हर बैठक में मौजूद रहे। शाह की इस यात्रा और इन मीटिंग्स के बाद ही अलग राज्य की चर्चा तेज हुई।
हालांकि अभी तक इसका कोई ठोस प्रस्ताव सामने नहीं आया है। लेकिन यह अनायास नहीं था। बंगाल चुनाव को ध्यान में रख कर देखने पर इसका महत्व समझ में आता है। ध्यान रहे भाजपा ने घुसपैठ को बंगाल चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बनाया है। तभी अगर यह चर्चा चलती है कि बिहार के मुस्लिम बहुल इलाकों खास कर किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया के कुछ हिस्से को मिला कर पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाकों मालदा व उत्तरी दिनाजपुर के साथ जोड़ कर अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाएगा तो इसका बड़ा मनोवैज्ञानिक असर बंगाल के मतदाताओं पर होगा। उत्तरी दिनाजपुर और मालदा दोनों किशनगंज और कटिहार से सटे हैं। अगर इन जिलों को मिला कर अलग केंद्र शासित प्रदेश बनता है तो वहां बहुसंख्यक आबादी जम्मू कश्मीर जैसी होगी। वहां उप राज्यपाल और सीमावर्ती राज्य होने की वजह से सेना और अर्धसैनिक बलों की तैनाती करके नियंत्रण रखा जा सकता है।
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