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श्रीकृष्ण का कोमल, रसिक चित्रण क्यों अधिक?

श्रीकृष्ण का यशोगायन करने के बजाय क्यों अधिकांश साहित्यकारों-कवियों-चिंतकों-कथाकारों ने उनके कोमल एवं रसिक स्वरूप का ही अधिकाधिक चित्रण किया?

इस्लामिक देशों में बदलाव, जगती उम्मीदें

यदि इस्लामिक देश सऊदी अरब वर्तमान की आवश्यकता, सभ्य एवं उदार समाज की रचना-स्थापना और अपने नागरिकों के सुविधा-सुरक्षा-स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए मस्जिदों में ऊँची आवाज़ में बजने वाले लाउडस्पीकरों पर शर्त्तें और पाबन्दियाँ लगा सकता है तो धर्मनिरपेक्ष देश भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। युगीन आवश्यकता एवं वर्तमान परिस्थिति-परिवेश के अनुकूल परिवर्तन सतत चलते रहना चाहिए। इसी में अखिल मानवता और जगती का कल्याण निहित है। परिवर्तन की यह प्रक्रिया चारों दिशाओं और सभी पंथों-मज़हबों में देखने को मिलती रही है। इतना अवश्य है कि कहीं यह प्रक्रिया तीव्र है तो कहीं थोड़ी मद्धिम, पर यदि हम जीवित हैं तो परिवर्तन निश्चित एवं अपरिहार्य है। इस्लाम में यह प्रक्रिया धीमी अवश्य है, पर सतह के नीचे वहाँ भी परिवर्तन की तीव्र कामना और बेचैन कसमसाहट पल रही है। इस्लाम एक बंद मज़हब है। वह सुधार एवं बदलावों से भयभीत और आशंकित होकर अपने अनुयायियों पर भी तरह-तरह की बंदिशें और पाबन्दियाँ लगाकर रखता है। इन बंदिशों एवं पाबंदियों के कारण उसको मानने वाले बहुत-से लोग आज खुली हवा, खिली धूप में साँस लेने के लिए तड़प उठे हों तो कोई आश्चर्य नहीं! तमाम इस्लामिक देशों और उनके अनुयायियों के… Continue reading इस्लामिक देशों में बदलाव, जगती उम्मीदें

योग-आर्युवेद : मुख्य चिकित्सा पद्धत्ति बनने की और?

इक्कीसवीं सदी भारतीय ज्ञान-विज्ञान-विचार-परंपरा की सदी है। कम-से कम 21 जून को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय योग-दिवस और उसे मिलने वाला विश्व-बिरादरी का व्यापक जन-समर्थन यही संकेत और संदेश देता है। योग और आयुर्वेद निर्विकल्प हैं, वे अब केवल वैकल्पिक नहीं, योग-आर्युवेद मुख्य चिकित्सा -पद्धत्ति बनने की दिशा में तेजी से अग्रसर हैं। योग-आर्युवेद मुख्य चिकित्सा : निःसंदेह योग एवं आयुर्वेद को देश-दुनिया तक पहुँचाने में स्वामी रामदेव का योगदान अतुल्य एवं स्तुत्य है। उन्होंने योग और आयुर्वेद को गुफाओं-कंदराओं, शास्त्र-संस्थाओं से बाहर निकाल जन-जन तक पहुँचाने का अभूतपूर्व कार्य किया। इससे आम जन के धन और स्वास्थ्य की रक्षा हुई। उनके कार्यक्रमों को देख-सुन, उनके शिविरों में प्रशिक्षण पा लाखों-करोड़ों लोग लाभान्वित हुए हैं। उनके प्रयासों से योग-प्राणायाम, ध्यान-धारणा-प्रत्याहार जैसी गंभीर एवं पारिभाषिक शब्दावलियों, जटिल प्रक्रियाओं को भी आम लोग अब समझने लगे हैं। इन्हें अपने जीवन में उतारने लगे हैं। यह उनके प्रयासों का ही सुखद परिणाम है कि योग-प्राणायाम-आयुर्वेद को सर्वसाधारण एक जीवन-शैली की तरह अपनाने लगा है। कुल मिलाकर स्वास्थ्य के प्रति व्यापक जन-जागरुकता लाने का असाध्य-असाधारण कार्य स्वामी रामदेव द्वारा धरातल पर सच-सजीव-साकार किया गया है। योग जिसे आध्यात्मिक जगत की गुह्य विषयवस्तु समझा जाता रहा, उसे दैनिक व व्यावहारिक जीवन का अंग बनाने का श्रेय… Continue reading योग-आर्युवेद : मुख्य चिकित्सा पद्धत्ति बनने की और?

लुप्त होती संवेदनाएं, छीजते जीवन मूल्य

कोरोना की दूसरी लहर के बीच जीवनरक्षक दवाइयों-उपकरणों और ऑक्सीजन सिलेंडर की कालाबाजारी के कारण हमारी पूरी दुनिया में थू-थू हुई। रेमडेसिवीर दवा की मुँहमाँगी कीमत वसूली गई, निजी अस्पतालों में जीवन-मृत्यु से जूझ रहे मरीजों और उनके परिजनों का भयावह आर्थिक शोषण किया गया। किसी भी समाज एवं राष्ट्र की वास्तविक परीक्षा युद्ध या संकट-काल में ही होती है। विपदाएँ केवल चुनौतियाँ लेकर ही नहीं आतीं, बल्कि एक समाज एवं राष्ट्र के रूप में वह हमारी सोच-सामर्थ्य-संभावनाओं-संवेदनाओं को भी वैश्विक निकष पर कसती-तौलती हैं। पिछले वर्ष कोरोना की पहली लहर के दौरान संपूर्ण विश्व ने हमारी धीरता, गंभीरता, कुशलता एवं संवेदनशीलता को देखा, परखा और सराहा। तमाम सरकारी एवं गैर सरकारी विभागों के जिम्मेदार एवं कर्त्तव्यनिष्ठ अधिकारियों-कर्मचारियों ने अग्रिम पंक्ति के योद्धा की भूमिका निभाई। चिकित्सकों से लेकर स्वास्थ्य-सेवा में तैनात स्वास्थ्यकर्मियों, सफाईकर्मियों, पुलिसकर्मियों, मीडियाकर्मियों, बैंक के कर्मचारियों आदि ने सेवा एवं कर्त्तव्यपरायणता की अद्भुत मिसाल पेश की। समाज के संपन्न एवं सरोकरधर्मी लोगों द्वारा किए जा रहे परोपकारी कार्यों की चारों दिशाओं में सराहना हुई। केंद्र एवं राज्य सरकारों के प्रयासों की भी प्रशंसा हुई। विभिन्न सरकारों ने सावधानी एवं सतर्कता बरतते हुए ऐहतियातन अनेक कदम उठाए और जनसाधारण ने भी कमोवेश उनका समर्थन किया। गत वर्ष ऐसा… Continue reading लुप्त होती संवेदनाएं, छीजते जीवन मूल्य

हमें सीखना चाहिए इजरायल से

दरअसल तंत्र और नागरिक-समाज राष्ट्र एवं राष्ट्रीय हितों को कितनी प्राथमिकता देता है, उसी पर राष्ट्रीय चारित्र्य निर्भर करता है। विपदा या युद्ध-काल में इजरायल की सरकार, वहाँ के विपक्षी दलों और आम नागरिकों की सोच और आचरण के परिप्रेक्ष्य में स्वयं तय करें कि राष्ट्रीय चारित्र्य एवं नागरिक-जिम्मेदारी के निर्वहन की कसौटी पर हम भारतीय कितना खरा उतरते हैं? यह भी पढ़ें: पश्चिम बंगालः इस हिंसा का अर्थ ? युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं होता। शांति, संवाद, सहयोग, सह-अस्तित्व का कोई विकल्प नहीं हैं। विश्व-मानवता के लिए सुखद है जो इजरायल और हमास के बीच युद्ध-विराम हो गया। उल्लेखनीय है कि 1940 के दशक के मध्य में हंगरी, पोलैंड, जर्मनी, ऑस्ट्रिया के यहूदियों को किन-किन यातनाओं से गुज़रना पड़ा, 1948 में स्वतंत्र होने से लेकर आज तक उसने किन-किन संघर्षों का सामना किया, अपनी विकास-यात्रा में अब तक उसने कैसे-कैसे गौरवशाली आयाम-अध्याय जोड़े, यह दुहराने की आवश्यकता नहीं! पूरी दुनिया ने देखा कि इजरायल और फिलीस्तीन के मध्य हुए हालिया युद्ध के दौरान वहाँ के मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और विपक्षी दल के नेता बेनी गेन्ट्ज इस बात पर एकमत थे कि उनका सबसे पहला और सबसे बड़ा दायित्व उनके राष्ट्र पर आए संकटों का डटकर सामना करना… Continue reading हमें सीखना चाहिए इजरायल से

पश्चिम बंगालः इस हिंसा का अर्थ ?

मनुष्य का मनुष्य हो जाना ही उसकी चरम उपलब्धि है, कि तमाम मत-मतांतरों के बीच भी एक-दूसरे से जुड़े रहने के लिए दोनों का मनुष्य होना ही पर्याप्त है, कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अलग-अलग प्रकार की सामाजिक-राजनीतिक चेतना लोकतंत्र की ताक़त और ख़ूबसूरती है, कमज़ोरी-बदसूरती-बदनीयती नहीं! ज़ुनूनी-मज़हबी-उपद्रवी भीड़ हेतु किसी को निपटाने, किसी को निशाना बनाने के लिए उसका असहमत होना ही पर्याप्त है? सच तो यह है कि पश्चिम बंगाल में हो रही जानलेवा हिंसा का एक प्रमुख कारण वहाँ का जनसांख्यिकीय अनुपात है। पश्चिम बंगाल की 35 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी राजनीति को उपकरण बनाकर 70 प्रतिशत बहुसंख्यकों पर दबाव बनाए रखना चाहती है। इस दबाव के पीछे आर्थिक-सामुदायिक-राजनीतिक निहितार्थ के साथ-साथ वर्चस्ववादी मानसिकता भी काम कर रही है। और राज्य की सत्ता दोषियों को सज़ा देने की बजाय वोट-बैंक को साधे रखने के चक्कर में मौन-मूक दर्शक की मुद्रा एवं भूमिका तक सीमित है। ”ध्रुवीकरण के कारण पश्चिम बंगाल में हिंसा हो रही है, लोग मारे जा रहे हैं, महिलाएँ बलात्कार की शिकार हो रही हैं। चुनाव के बाद छिटपुट हिंसा कहाँ नहीं होती! यह लोकतंत्र की जीत का जश्न है!” ऐसा विश्लेषण या मत प्रकट करने वालों से यह सीधा सवाल पूछा जाना चाहिए कि यदि उनके… Continue reading पश्चिम बंगालः इस हिंसा का अर्थ ?

बंगाल में हिंसा कब तक?

विरला ही कोई ऐसा भारतीय  होगा जो किसी-न-किसी क्षेत्र में बंगाल की असाधारण प्रतिभा एवं तीक्ष्ण बौद्धिकता से प्रभावित न हुआ हो! पर कैसी विचित्र विडंबना है कि जो बंगाल कला, सिनेमा, संगीत, साहित्य, संस्कृति की समृद्ध विरासत और बौद्धिक श्रेष्ठता के लिए देश ही नहीं पूरी दुनिया में विख्यात रहा हो, वह आज चुनावी हिंसा, अराजकता, रक्तपात के लिए जाना जाने लगा है। शायद ही कोई ऐसा दिन बीतता हो जब वहाँ होने वाली हिंसक राजनीतिक झड़पें अख़बारों की सुर्खियाँ न बनती हों! राज्य विधानसभा के लिए चले रहे चुनाव-प्रचार के दौरान इस बार वहाँ भाषा की मर्यादा का जमकर उल्लंघन हुआ, नैतिकता एवं मनुष्यता को ताक पर रख दिया गया, संसदीय परंपराओं की जमकर धज्जियाँ उड़ाई गईं, एक-दूसरे पर अनर्गल आरोपों-प्रत्यारोपों की झड़ी लगा दी गई, कोविड-बचाव के दिशानिर्देशों की घनघोर उपेक्षा एवं अवमानना की गई। और सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि सभी पक्षों ने किसी-न-किसी स्तर पर गंभीरता, जिम्मेदारी एवं सरोकारधर्मिता की कमी दर्शाई। ममता बनर्जी और तृणमूल काँग्रेस ने तो सख़्ती किए जाने पर उलटे चुनाव-आयोग एवं केंद्रीय सुरक्षा बल जैसी संस्थाओं की साख़ एवं विश्वसनीयता पर ही सवाल उछाल दिया। वहाँ छिड़ी चुनावी रंजिशों से उठती हिंसक लपटों ने स्त्री-पुरुष-बाल-वृद्ध-जवान किसी को नहीं बख़्शा। 82… Continue reading बंगाल में हिंसा कब तक?

खुरदुरे यथार्थ की समझ वाले थे बाबा साहेब

डॉ भीमराव आंबेडकर अपने अधिकांश समकालीन राजनीतिज्ञों की तुलना में राजनीति के खुरदुरे यथार्थ की ठोस एवं बेहतर  समझ रखते थे। नारों एवं तक़रीरों की हकीक़त वे बख़ूबी समझते थे। जाति-भेद व छुआछूत के अपमानजनक दंश को उन्होंने केवल देखा-सुना-पढ़ा ही नहीं, अपितु भोगा भी था। तत्कालीन जटिल सामाजिक समस्याओं पर उनकी पैनी निग़ाह थी। उनके समाधान हेतु वे आजीवन प्रयासरत रहे। परंतु उल्लेखनीय है कि उनका समाधान वे परकीय दृष्टि से नहीं, बल्कि भारतीय दृष्टिकोण से करना चाहते थे। स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व पर आधारित समरस समाज की रचना का स्वप्न लेकर वे आजीवन चले। उनकी अग्रणी भूमिका में तैयार किए गए संविधान में उन स्वप्नों की सुंदर छवि देखी जा सकती है। वंचितों-शोषितों-स्त्रियों को न्याय एवं सम्मान दिलाने के लिए किए गए उनके महत कार्य उन्हें महानायकत्व प्रदान करने के लिए पर्याप्त हैं। वे भारत की जड़-ज़मीन-मिट्टी-हवा-पानी से गहरे जुड़े थे। इसीलिए वे कम्युनिस्टों की वर्गविहीन समाज की स्थापना एवं द्वंद्वात्मक भौतिकवाद को कोरा आदर्श मानते थे। देश की परिस्थिति-परिवेश से कटी-छँटी उनकी मानसिकता को वे उस प्रारंभिक दौर में भी पहचान पाने की दूरदृष्टि रखते थे। उन्होंने 1933 में महाराष्ट्र की एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि ”कुछ लोग मेरे बारे में दुष्प्रचार कर रहे हैं… Continue reading खुरदुरे यथार्थ की समझ वाले थे बाबा साहेब

प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा को न जोड़े चुनाव से

प्रायः दो पड़ोसी देशों के बीच तनातनी, रिश्तों में उतार-चढ़ाव, आपसी हितों में टकराव आदि देखने को मिलता रहता है।

शिक्षण-संस्थाओं पर सियासी हमला अनुचित

भारतीय संस्कृति में सेवा, शिक्षा, चिकित्सा क्षेत्रों में कार्यरत व्यक्तियों-संस्थाओं के प्रति विशेष सम्मान रहा है।  योग्य, समर्पित एवं निष्ठावान शिक्षकों-गुरुजनों के प्रति तो जनसाधारण में आज भी प्रायः पूज्य भाव ही देखने को मिलता है

संघ है रचनात्मक और सकारात्मक

संघ का पूरा दर्शन ही ‘मैं नहीं तू ही’, ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’, ‘याची देही याची डोला’ के भाव पर अवलंबित है। संघ समाज के विभिन्न वर्गों-खाँचों-पंथों-क्षेत्रों-जातियों को बाँटने में नहीं, जोड़ने में विश्वास रखता है।

सोशल-डिजिटल मीडिया पर हो नैतिक अंकुश

हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। निःसंदेह सोशल-डिजिटल मीडिया की रचनात्मक-सकारात्मक महत्ता एवं भूमिका की पूर्णतया अनदेखी नहीं की जा सकती

किसान-आंदोलन की साख़ पर सवाल

ग्यारह दौर की वार्त्ता, निरंतर किसानों से संपर्क और संवाद साधे रखने के प्रयास, उनकी हर उचित-अनुचित माँगों को मानने की पेशकश, यहाँ तक की कृषि-क़ानून को अगले डेढ़ वर्ष तक स्थगित रखने  के प्रस्ताव के बावजूद सरकार और किसानों के मध्य गतिरोध ज्यों-का-त्यों बना हुआ है।

बंगाल में हिंसा का कौन जिम्मेदार?

शायद ही कोई ऐसा भारतीय होगा जो बंगाल की प्रतिभा, बौद्धिकता एवं पांडित्य को देखकर अचंभित नहीं रह जाता हो

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