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उलटी दिशा में कदम

मोदी सरकार उचित ही यूपीआई की सफलता को अपनी एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करती आई है। अब यह समझना कठिन है कि अपनी इस कामयाबी को पलटने का रास्ता वह क्यों तैयार कर रही है?

केंद्र ने संसद से वह विधेयक पारित करवा लिया है, जिसके बाद बैंकों को यूपीआई पेमेंट पर फीस लगाने का अधिकार देने का रास्ता खुल गया है। यह आपत्तिजनक पहल है। नरेंद्र मोदी सरकार उचित ही यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस की सफलता को अपनी एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करती आई है। मोदी सरकार रुपे कार्ड की शुरुआत कर स्वदेशी भुगतान की एक और महत्त्वपूर्ण पहल करने में सफल रही थी। अब यह समझना कठिन है कि अपनी बड़ी कामयाबी को पलटने का रास्ता वह क्यों तैयार कर रही है? सरकार ने खुद कहा है कि बड़े लेनदेन कारोबारियों से बैंकों को भुगतान फीस वसूलने का अधिकार दिया जा सकता है।

सरकार का दावा है कि इससे महज पांच प्रतिशत यूजर प्रभावित होंगे। यानी आम भुगतानकर्ताओं पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मगर, व्यवहार में इसे सुनिश्चित करना शायद संभव नहीं होगा। वेंडर्स यूजर्स पर उन शुल्कों को ट्रांसफर ना करें, इसकी गारंटी करना बेहद कठिन साबित होगा। नतीजतन, फीस का चलन लागू होने के बाद व्यवहार में असल में यह होगा कि लोग नकदी लेनदेन या क्रेडिट कार्ड का उपयोग करने की दिशा में लौटेंगे। यह सरकार की घोषित प्राथमिकताओं के खिलाफ होगा। वैसे भी, जब सरकार यह सिस्टम चलाने के लिए हर साल डेढ़ से दो हजार करोड़ रुपये की सब्सिडी बैंकों को दे रही है, तो फिर बैंकों को फीस लेने की आजादी देने का क्या तर्क हो सकता है?

ऐसे प्रश्नों का सटीक उत्तर मौजूद ना होने के कारण ही इस संदेह को हवा मिली है कि इस फैसले के पीछे अमेरिकी दबाव की भूमिका है। यूपीआई और रुपे कार्ड के चलन में आने से अमेरिकी कंपनियों- मास्टरकार्ड, वीजा, अमेरिकन एक्सप्रेस आदि के भारत में मौजूद बाजार पर प्रतिकूल असर पड़ा। अब कहा जा रहा है कि उन कंपनियों के हित में भारत पर अमेरिका के ट्रंप प्रशासन का परोक्ष दबाव पड़ा है। मुमकिन है कि ऐसी बातों में कोई दम ना हो। मगर खुद मोदी सरकार ने भारतीय कारोबारियों और यूजर्स पर अनावश्यक बोझ डालने की तैयारी कर ऐसी चर्चाओं की जमीन तैयार की है।

By NI Editorial

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