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भारत का डेटा संदिग्ध?

एक ब्रिटिश मेडिकल जर्नल, जिसके विचार-विमर्श का दायरा राजनीतिक नहीं है, वह भारत के आम चुनाव के मौके पर संपादकीय लिख कर सतर्क करने की जरूरत महसूस करे, तो यह खुद जाहिर है कि संबंधित समस्या उसकी नजर में कितना गंभीर रूप ले चुकी है।

मशहूर ब्रिटिश मेडिकल जर्नल द लांसेट ने आम चुनाव के मौके पर भारतवासियों को देश में स्वास्थ्य संबंधी डेटा की बढ़ती किल्लत और मौजूद डेटा पर गहराते संदेह को लेकर आगाह किया है। एक ब्रिटिश मेडिकल जर्नल, जिसके विचार-विमर्श का दायरा राजनीतिक नहीं है, वह किसी देश के आम चुनाव के मौके पर संपादकीय लिख कर सतर्क करने की जरूरत महसूस करे, तो यह खुद जाहिर है कि संबंधित समस्या उसकी नजर में कितना गंभीर रूप ले चुकी है।

पत्रिका ने संपादकीय ‘भारत का चुनावः डेटा और पारदर्शिता क्यों महत्त्वपूर्ण है’ शीर्षक के तहत लिखा है। इसमें कहा गया है- “नरेंद्र मोदी के शासनकाल में स्वास्थ्य देखभाल की स्थिति कमजोर रही है। स्वास्थ्य पर कुल सरकारी खर्च में गिरावट आई है, जो अब जीडीपी के 1.2 प्रतिशत की दयनीय स्तर पर है। इस कारण लोगों का अपनी जेब से इलाज खर्च बेहद ऊंचा बना हुआ है।

प्राथमिक चिकित्सा और सबके लिए स्वास्थ्य की व्यवस्था उन लोगों को जरूरी सेवाएं देने में अब तक नाकाम है, जिन्हें इनकी सर्वाधिक जरूरत है। इलाज तक पहुंच और उसकी गुणवत्ता में मौजूद गैर-बराबरी जानी-पहचानी बात है। लेकिन एक और जिस बाधा का सामना भारत को करना पड़ रहा है, जिसकी अनेक भारतीयों को संभवतः जानकारी भी ना हो, वह स्वास्थ्य संबंधी डेटा और डेटा की पारदर्शिता का अभाव है।”

द लासेंट ने जिक्र किया है कि 2021 की जनगणना अब तक नहीं कराई गई है और स्वास्थ्य संबंधी कई प्रमुख सर्वे या तो हुए ही नहीं, या फिर उनके आंकड़े सामने नहीं आए। इस बात का उल्लेख भी पत्रिका ने किया है कि राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वे की सदारत करने वाले राष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान के निदेशक केजे जेम्स को इस्तीफा देना पड़ा, जिसको लेकर संदेह जताया गया कि ऐसा सर्वे से सरकार के मनमाफिक आंकड़े सामने ना आने के कारण हुआ। पत्रिका ने आगाह किया है कि आंकड़ों के अभाव में धुंध पैदा करने से ऐसी स्थिति बनी है, जिसमें संभव है कि भारत के लोग अपनी स्थिति से अनजान बने रहें। बेशक, भारतवासियों को अपने हित में इस चेतावनी को गंभीरता से लेना चाहिए।

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