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मगर बात पहुंची कहां?

भारत का जोर इस पर है कि सरहद से जुड़े मुद्दों को पहले हल किया जाए, तभी संबंध सुधार की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। इस बीच भारत की निगाह में व्यापार संबंधी चीन के “प्रतिबंधात्मक कदम” भी संबंध में रोड़ा बन गए हैं।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के विदेश मंत्रियों की बैठक में भाग लेने चीन गए हैं, तो वहां उनकी चीनी विदेश मंत्री वांग यी से द्विपक्षीय वार्ता भी हुई। इसके बाद दोनों पक्षों की तरफ से जो बताया गया, उससे यही संकेत मिला कि फिलहाल दोनों देश बातचीत जारी रहने को ही एक उपलब्धि मान रहे हैं। दोनों देश गुजरे एक वर्ष में संबंध सुधार की दिशा में हुई प्रगति का उल्लेख करते हुए संबंध और बेहतर करने इच्छा जता रहे हैं, संभवतः इसे भी एक कामयाबी माना जा सकता है। वरना, कड़वी हकीकत यह है कि वार्ता के दौरान दोनों पक्षों ने अपने-अपने रुख को दोहराया भर है।

भारत का मुख्य जोर इस पर है कि सरहद से जुड़े मुद्दों को पहले हल किया जाए, तभी संबंध सुधार की प्रक्रिया तेज गति से आगे बढ़ेगी। इस बीच भारत की निगाह में व्यापार संबंधी चीन के “प्रतिबंधात्मक कदम” भी संबंध सुधार में बाधक बन गए हैं। जब ये बात जयशंकर ने वांग के सामने कही, तो साफ तौर पर उनका इशारा चीन द्वारा रेयर अर्थ खनिजों के निर्यात पर रोक तथा अपने तकनीकी विशेषज्ञों की सेवा वापस लेने जैसे फैसलों की तरफ था। मगर भारत की बातों का कोई असर चीन पर होता नहीं दिखता है। उसकी तरफ से हर बार यही दोहराया जाता है कि भारत और चीन दोनों पूर्वी सभ्यता और उभरती अर्थव्यवस्थाएं हैं।

दोनों देशों के रिश्तों का सार सद्भावपूर्ण सह-अस्तित्व को अपनाने और पारस्परिक सफलता की राह पर चलने में है। इन अमूर्त बातों का अर्थ संभवतः चीन की यह इच्छा है कि भारत उसकी विश्व दृष्टि एवं वैश्विक पहल से समन्वय बनाए। अन्यथा चीन की दिलचस्पी भारत से टकराव को नियंत्रित रखने तक सीमित रहेगी। गौरतलब है कि लद्दाख में सीमा पर दोनों देशों की फौजों के बीच आमने-सामने तैनाती की स्थिति बदली है, मगर अपनी- अपनी तरफ सेनाओं का जमाव जारी है। वार्ता के दौरान भारतीय विदेश मंत्री ने सीमा पर तनाव घटाने- यानी फौज वापसी पर जोर दिया। मगर चीन ने इस पर कोई सकारात्मक जवाब दिया, इसका कोई संकेत नहीं है।

By NI Editorial

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