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सिसोदिया के लिए पूरा विपक्ष लड़े, खासकर कांग्रेस!

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कांग्रेस सबसे बड़ा विपक्षी दल है। इस लिए जिम्मेदारी भी उसकी सबसे ज्यादा है। उसे आगे बढ़कर विपक्षी एकता का अलख जगाना होगा। यदि मोदी की हैट्रिक हो गई तो फिर उसके बाद कांग्रेस और दूसरा विपक्ष कहां देखने को मिलेगा?.. यह एक टेस्ट केस है कि विपक्ष मेंकितनी हिम्मत बची है। वह कितना प्रतिरोध कर सकता है?कांग्रेस के महासचिव और जयराम रमेश ने गिरफ्तारी का विरोध करके अपने रायपुर महाधिवेशन की उस भावना को व्यक्तकर दिया कि विपक्षी एकता आज की सबसे बड़ी जरूरत है।…. पर कांग्रेस को हर विपक्षी पार्टी के लिए खुल कर मैदान में आना चाहिए।

मुद्दा मनीष सिसोदिया नहीं हैं। आम आदमी पार्टी भी नहीं है। सवाल संवैधानिक एजेंसियों का दुरुपयोग है।

अल्लामा इकबाल के साथ थोड़ी सी रियायत लेते हुए-

“ न समझोगे तो मिट जाओगे ओ विपक्ष वालों

तुम्हारी दास्तां तक न होगी दास्तानों में! “

और इसे कांग्रेस के नेताओं को खास तौर पर समझना चाहिए। 2014 में सरकार बदलते ही मनमोहन सिंह के यहां सीबीआई पहुंचना कांग्रेसीशायद भूल गए हैं। मगर अभी केन्द्रीय गृहमंत्री रहे पी चिदम्बरम की गिरफ्तारी और उनके साथ दुर्व्यवहार करने को भी क्या कांग्रेसी भूल गए? हैरानी की बात है सोमवार सुबह कांग्रेस के नेता जश्न में डूबे थे। मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी कासमर्थन कर रहे थे।

मगर शाम होते होते कांग्रेस को समझ में आ गया कि यहकिसी पार्टी या व्यक्ति पर हमला नहीं है यह एक टेस्ट केस है कि विपक्ष मेंकितनी हिम्मत बची है। वह कितना प्रतिरोध कर सकता है?

कांग्रेस के महासचिव और कम्यूनिकेशन डिपार्टमेंट के इन्चार्ज जयराम रमेशने गिरफ्तारी का विरोध करके अपने रायपुर महाधिवेशन की उस भावना को व्यक्तकर दिया कि विपक्षी एकता आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

कांग्रेस में हमेशा दुविधा की भरमार होती है। आज जब उसे विपक्षी एकता कीसबसे ज्यादा जरूरत है तो उसे एकला चलो की और धकेला जा रहा है। और 2004 से14 तक जब अकेले मजबूत होने का समय था तब उसे मिलजुल कर काम करने के जालमें फंसा रखा था।

कांग्रेस में आज इन्दिरा गांधी के समय की तरह कोई दृढ़ निश्चयी केन्द्रीयनेतृत्व नहीं है जो सही, समयानुकूल एक फैसला लेने के बाद उसे नीचे तकपहुंचा दे। राहुल के अति उदार और अनिश्चित रवैये की वजह से कई बार गलत मैसेज सर्कुलेटेड हो जाता है।

मनीष सिसोदिया दिल्ली के उप मुख्यमंत्री हैं। उनसे लगातार महीनों पूछताछहुई। अगर सीबाआई चाहती तो आगे भी कर सकती थी। मगर उन्हें गिरफ्तार करनाऔर फिर रिमांड पर लेने का क्या मतलब है। देश की राजधानी के उपमुख्यमंत्री से थाने में पूछताछ!

आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पत्रकार रहे अनुराग ढांडा का यह कहनासही है कि अगर आबकारी का मामला होता तो हरियाणा में दिन रात ठेके खुलतेहैं वहां जांच होती। गुजरात में सैंकड़ों लोग जहरीली शराब से मर गए वहांजांच होती। अनुराग का दावा है कि यह शिक्षा का नया और सफल मॉडल है जिससेभाजपा डर गई। हर मां बाप और बच्चे भी अब शानदार सरकारी स्कूल की बात करनेलगे हैं। यह भाजपा के शिक्षा, चिकित्सा के निजीकरण पर बड़ी चोट है।

अनुराग ढांडा इसका एक राजनीतिक पक्ष भी बताते हैं कि एमसीडी में हमारामेयर और डिप्टी मेयर नहीं बनता तो यह गिरफ्तारी नहीं होती। पहले पंजाबमें हम भाजपा और अकालियों का विकल्प बन कर आए और फिर दिल्ली में हमारे एकभी पार्षद को बीजेपी वाले डरा और तोड़ नहीं पाए। उसीकी खीझ और बदला हैमनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी। अनुराग कहते हैं कि हरियाणा में हमने भाजपासरकार की चूलें हिला दी हैं। वह हमें डराना चाहती है। और आम आदमी पार्टीको ही नहीं सारे विपक्ष को। हर जगह जांच एजेंसियों का दुरुपयोग हो रहाहै। विपक्षी नेताओं के यहां छापे पड़ रहे हैं। उन्हें गिरफ्तार किया जारहा है। इसके खिलाफ लड़ना होगा। किसी के भी चुप रहने और डरने से काम नहींचलेगा।

बात सही है। आज प्रधानमंत्री मोदी इतने ताकतवर हो गए हैं कि कोई भीपार्टी या तीसरा मोर्चा उन्हें 2024 के लोकसभा चुनाव में नहीं हरा सकता।केवल संयुक्त विपक्ष ही आगामी लोकसभा चुनाव में उनका मुकाबला कर सकता है।वह जैसा कि कहते है कि खेल में कौन किसीका गुइंया! वैसे ही राजनीति मेंकौन किसके साथ परमानेंट दोस्ती या विरोध। कोई कभी सोच सकता था किकांग्रेस शिवसेना के साथ मिलकर सरकार बनाएगी? या भाजपा कश्मीर में महबूबामुफ्ती के साथ मिलकर सरकार चलाएगी ?

राजनीति में ऐसी उलटबांसिया बहुत होती रहती है। हमने 1989 के लोकसभाचुनाव में एक ही मंच पर भाजपा और सीपीएम दोनों के झंडे साथ लहराते देखेहैं। लेकिन 2014 के बाद तो यह चमत्कार ऐसे होने लगे है कि सारे समानविचार या नेचुरल एलाइंस की धारणाएं चकनाचूर हो गई हैं। महाराष्ट्र मेंभाजपा और शिवसेना जो एक दूसरे को स्वाभाविक मित्र कहते थे वे दुश्मनों कीतरह लड़े। और पंजाब में भाजपा अकाली का सबसे पुराना गठबंधन टूट गया।कांग्रेस से गुलामनबी आजाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे लोग टूटे जिनकेबारे में 9 साल पहले कोई सपने में नहीं सोच सकता था।

तो राजनीति इन दिनों बहुत अलग स्टेज पर पहुंच गई है। इसे वापस जनता केसाथ जोड़ने से पहले कई बाधाएं तोड़ना होंगी। राहुल बार कहते हैं अभीसोनिया गांधी ने भी कहा कि संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा कर लिया गया है।झूठे सवालों को सच के मुद्दों बेरोजगारी, महंगाई, चीन के दबाव पर हावी करदिया गया है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने तो यह कहकर देश के पूरे आत्मसम्मान को दांव पर लगा दिया कि वह बड़ी इकानमी है हम उससे कैसे लड़ सकतेहैं? मतलब डर कर ही रहना है। राहुल ने इस पर रायपुर महाधिवेशन में अच्छाप्रहार किया कि यह कौन सा राष्ट्रवाद है कि ताकतवर से डरना और कमजोर को डराना!

लेकिन यह सब मुद्दे जनता के बीच जा नहीं पा रहे हैं। मीडिया इन्हेंदिखाता बताता ही नहीं है। मीडिया हर चीज वह छुपा लेता है जो भाजपा केखिलाफ जा सकती हो। मगर एक चीज वह नहीं छुपा पाता। यही विपक्ष को समझनाचाहिए। वह चीज है चुनावों की जीत। उसे यह बताना पड़ता है।

अभी जैसा रायपुर में प्रियंका ने बड़ी चेतवनी देते हुए कहा कि केवल एकसाल बचा है। कांग्रेस को खासतौर पर और विपक्ष को भी यह ध्यान में रखनाचाहिए कि समय बहुत तेज गति से बीत रहा है। 2024 सिर पर खड़ा है। अगर यहहार गए तो फिर खूब आपस में लड़ते रहना। कोई पूछने वाला नहीं होगा।

कांग्रेस आज आश्चर्यजनक ढंग से पूछ रही है कि नीतीश का भाजपा से क्यासंबंध रहा? अरे संबंध! वे तो भाजपा के पार्ट और पार्सल थे। पूरी राजनीतिभाजपा के साथ की। 1977 से। वे तो उससे टूटकर तुम्हारी तरफ आए हैं। और आपउनसे पूछ रहे है कि आपकी राजनीति क्या है?

कमाल है कांग्रेस के नेता भी। वे यह भूल गए कि 2009 के लोकसभा चुनाव सेपहले जब नीतीश कांग्रेस के घोर विरोधी थे तब राहुल ने उनके काम काज कीप्रशंसा की थी। ठीक चुनाव से पहले राहुल ने दिल्ली के होटल अशोक में एकबड़ी प्रेस कान्फेंस की थी। उन दिनों राहुल आज की तरह इफरात में प्रेसकान्फ्रेंस नहीं करते थे। इसलिए उसका बड़ा महत्व था। वहां वे नीतीश कोफीलर दे रहे थे। और आज जब नीतीश खुले आम एक हफ्ते में दूसरी बार कांग्रेसकी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे हैं तो कांग्रेस मुंह से तो विपक्षी एकता,तीसरा मोर्चा भाजपा का मददगार बोले जा रही है मगर अपने हाथ पीछे रखकरबांधे हुए हैं।

कांग्रेस सबसे बड़ा विपक्षी दल है। इस लिए जिम्मेदारी भी उसकी सबसेज्यादा है। उसे आगे बढ़कर विपक्षी एकता का अलख जगाना होगा। सीधा सवाल हैकि अकेले लड़कर वह कितनी सीटें पर जीत लेगी? और अगर मोदी की हैट्रिक होगई तो फिर उसके बाद कांग्रेस और दूसरा विपक्ष कहां देखने को मिलेगा? वह जैसे आजकल की भाषा में कहते हैं कि किस गोले पर!

By शकील अख़्तर

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स के पूर्व राजनीतिक संपादक और ब्यूरो चीफ। कोई 45 वर्षों का पत्रकारिता अनुभव। सन् 1990 से 2000 के कश्मीर के मुश्किल भरे दस वर्षों में कश्मीर के रहते हुए घाटी को कवर किया।

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