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जी-20 से बेमतलब उम्मीद

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जी-20 की उम्र इसीलिए भी पूरी हो चुकी है कि जिस विश्व अर्थव्यवस्था के संचालन के लिए उसे बनाया गया था, उसका स्वरूप बुनियादी रूप से बदल गया है। जी-20 भूमंडलीकरण के दौर की अर्थव्यवस्था के संचालन के लिए बना था, जबकि अब दौर डी-ग्लोबलाइजेशन यानी भूमंडलीकरण की दिशा पलटने का है। इस नए दौर में नए मंच उभर रहे हैं। ब्रिक्स (ब्राजील- रूस- भारत- चीन- दक्षिण अफ्रीका) अब ब्रिक्स प्लस का रूप लेने जा रहा है। उसके साथ शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) एक सुरक्षा संगठन के रूप में उभर रहा है। आने वाले समय में दुनिया जी-7 और ब्रिक्स प्लस-एससीओ की धुरियों पर बंटी रहेगी।

नई दिल्ली में इकट्ठा हुए ग्रुप-20 के विदेश मंत्रियों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह सटीक बात कही कि विश्व संचालन की संस्थाएं नाकाम हो चुकी हैं। मोदी ने कहा- ‘वित्तीय संकट, जलवायु परिवर्तन, महामारी, आतंकवाद और युद्धों के समय हाल के वर्षों में हुए अनुभवों से यह साफ है कि विश्व संचालन की व्यवस्था विफल हो चुकी है।’ लेकिन इसके बाद उन्होंने एक निर्रथक टिप्पणी की। कहा- ‘जिन मुद्दों को हम हल नहीं कर सकते, हमें उनको उन मुद्दों की राह में बाधक नहीं बनने देना चाहिए, जिनका समाधान हम ढूंठ सकते हैं।’

यह टिप्पणी इसलिए निरर्थक है, क्योंकि जिन वजहों से दूसरे विश्व युद्ध के बाद अस्तित्व में आई संस्थाएं नाकाम हुई हैं, उन वजहों ने विश्व परिस्थिति को आमूल रूप से बदल दिया है। ऐसे में पुरानी व्यवस्थाओं से कोई उम्मीद जोड़ने कोई तर्क नहीं हो सकता।

बेशक संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था की भूमिका पर भी आज कई गंभीर सवाल हैं। उसकी नाकामियों से निराशा लगातार गहरी होती जा रही है। फिर भी दुनिया में कोई ऐसा ताकतवर देश नहीं है, जो संयुक्त राष्ट्र की जरूरत महसूस ना करता हो। लेकिन जिस मंच का औचित्य अब पूरी तरह से संदिग्ध हो गया है, वह बेशक जी-20 है। भारत सरकार ने जी-20 की रोटेशन से मिली मेजबानी को देश की जनता के सामने अपनी एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया है। जबकि इंडोनेशिया के बाली में हुए जी-20 के पिछले शिखर सम्मेलन में ही यह साफ हो गया था कि इस मंच से अब कुछ हासिल नहीं हो सकता।

इस मंच की प्रासंगिकता पर ऐसे सवाल उठने की एक लंबी पृष्ठभूमि है। यह पृष्ठभूमि कम से कम एक दशक पहले तक जाती है। इसके बावजूद यूक्रेन संकट खड़ा होने से पहले तक सूरत उतनी गंभीर या तनावपूर्ण नहीं थी। यूक्रेन में रूस की सैनिक कार्रवाई शुरू होने के साथ ही दुनिया में पहले से बढ़ रही दरार अचानक ना पाटे जा सकने वाली खाई में तब्दील हो गई। इसलिए जब भारत को मेजबानी मिली, तभी हमारे नीति निर्माताओं को इस मंच की लगातार बढ़ रही अनुपयोगिता का अहसास अवश्य रहा होगा।

फिर भी इस मेजबानी को लेकर भारत में सनसनी पैदा करने की कोशिश की गई और उस माहौल को लगातार बनाए रखा जा रहा है, तो उसके पीछे कारण भारत की घरेलू राजनीति में इसके इस्तेमाल की संभावना है। स्पष्टतः जब देश में अगले आम चुनाव का माहौल बनने लगा है, तब विश्व नेताओं की भारत में उपस्थिति को प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व की सफलता के रूप मे पेश कर उसका चुनावी फायदा उठाने की रणनीति अपनाई गई है। इसीलिए जी-20 बैठकों की पहले से तय नाकामी पर भारतीय मीडिया में परदा डालने की कोशिश साफ नजर आती है।

मगर उससे इस मंच के संकट को छिपाया नहीं जा सकता। फरवरी के आखिरी हफ्ते में बंगलुरू में जी-20 के वित्त मंत्रियों की बैठक हुई। उसके साथ ही वहां ऋण गोलमेज सम्मेलन का भी आयोजन किया गया, जिसका मकसद इस समय कर्ज संकट से जूझ रहे विकासशील देशों को राहत देने के उपायों पर विचार-विमर्श करना था। लेकिन बंगलुरू में हुई बैठकें सिरे से नाकाम रहीं। जी-20 के वित्त मंत्री किसी साझा बयान पर राजी नहीं हो सके। धनी मुल्कों के समूह जी-7 के सदस्य देश और रूस एवं चीन अलग-अलग धुरियों पर खड़े नजर आए, जैसाकि बाली में भी हुआ था।

बाली में इंडोनेशिया की कूटनीति सीमित रूप में सफल रही थी। उसके परिणामस्वरूप रूस की तरफ से वहां आए विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव को संयुक्त विज्ञप्ति जारी होने के पहले ही बाली से चले जाने के लिए राजी कर लिया गया। उसके बाद संयुक्त विज्ञप्ति जारी हुई, जिसमें कहा गया कि जी-20 के ‘ज्यादातर देशों ने’ यूक्रेन पर हमले की निंदा की, लेकिन कई देशों ने इससे अलग विचार व्यक्त किए। चीन ने भी इस विज्ञप्ति पर दस्तखत नहीं किया था।

बंगलुरू में जारी साझा बयान में बाली घोषणापत्र के दो पैराग्राफ को बिना किसी फेरबदल के शामिल कर लिया गया। इसके बावजूद रूस और चीन ने सहमति नहीं दी। बल्कि पश्चिमी देशों ने रूसी प्रतिनिधिमंडल के भाषण का बहिष्कार कर वहां कटुता और बढ़ा दी। उसका सीधा असर नई दिल्ली में विदेश मंत्रियों की बैठक पर पड़ा। ये गौरतलब है कि सर्गेई लावरोव ने यहां अपने भाषण के दौरान मेजबान भारत से ‘पश्चिमी देशों के व्यवहार के लिए’ माफी मांगी और फिर पश्चिमी देशों को खूब खरी-खोटी सुनाई। उन्होंने कहा- ‘पश्चिमी देश पहले दूसरों की जमीन को जीत लेते थे और लोगों का शोषण करते थे। दुर्भाग्यपूर्ण है कि पश्चिम ने वह आदत अभी भी नहीं छोड़ी है। वह विश्व समुदाय के हितों की बिना चिंता किए अपने स्वार्थ को आगे बढ़ा रहा है।’

जब किसी सम्मेलन में मौजूद देशों के लिए वहीं किसी अन्य देश की तरफ से ऐसी बात कही जाए, तो फिर साफ है कि उस बैठक से किसी नतीजे की उम्मीद करना निराधार होगा। तो दिल्ली बैठक का भी बंगलुरू जैसा ही अंजाम हुआ। बिना किसी साझा विज्ञप्ति पर सहमति बने इसकी समाप्ति हो गई। दरअसल, मेजबान भारत को अगले सितंबर तक ऐसे ही अनुभवों से गुजरने की आदत डाल लेनी चाहिए, जब जी-20 का शिखर सम्मेलन नई दिल्ली में होगा। उसके पहले उससे संबंधित कई और बैठकें होनी हैं, लेकिन उनका अंजाम भी कोई अलग नहीं हो सकता।

यह सूरत इसलिए बनी है, क्योंकि जी-20 अपनी उम्र पूरी कर चुका है। जी-20 का गठन पिछली सदी के आखिर वर्ष में उस समय हुआ था, जब सोवियत संघ के बिखराव के बाद एक-ध्रुवीय दुनिया बनती दिख रही थी। तब अमेरिकी का नेतृत्व (या दादागीरी) को चुनौती देने वाली कोई ताकत मौजूद नहीं थी। 1990 के दशक के आखिरी वर्षों में पूर्वी एशियाई देशों में आए वित्तीय संकट के बाद अमेरिकी पहल पर दुनिया की 20 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का यह मंच बना। इसका मकसद विश्व अर्थव्यवस्था को मिल-जुल कर चलाना बताया गया था। हालांकि असल मकसद यह था कि जी-20 में शामिल देश विश्व अर्थव्यवस्था को अपने मुताबिक चलाने में अमेरिका का सहयोग करें।

वह स्थिति आज पूरी तरह बदल चुकी है। 2008 की आर्थिक मंदी के बाद अमेरिका और यूरोपीय देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं को आज तक नहीं संभाल पाए हैँ। संभालने का आवरण देने के लिए उन्होंने कमखर्ची की जो नीतियां अपनाईं, उससे उनके अपने समाजों में विभाजन और उथल-पुथल पैदा हुई है। दूसरी तरफ चीन एक नई आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभर चुका है। अमेरिका और उसके साथी देशों की पूरी चिंता चीन के जारी उभार को रोकना है। चीन को घेरने की रणनीति के तहत उन्होंने दुनिया को एक नए शीत युद्ध में धकेल दिया है।

उधर रूस भी सोवियत संघ बिखरने के बाद के वर्षों में लगे भीषण झटकों के असर से अपने को उबार चुका है। अब वह 1990 के दशक जैसी पश्चिमी दादागीरी को सहने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए उसने अमेरिकी नेतृत्व वाली सैन्य संधि- नाटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) के लगातार उसकी सीमा तक किए जा रहे विस्तार पर विराम लगाने का निर्णय लिया। अगर रूस की इस सुरक्षा संबंधी चिंता का पश्चिमी देश सम्मान करते, तो यूक्रेन संकट खड़ा नहीं होता। लेकिन उन्होंने रूस के प्रस्तावों और गुजारिशों को सिरे से ठोकर मार दिया। नतीजा, यूक्रेन युद्ध के रूप में सामने आया है, जिसमें असल में यूक्रेन सिर्फ नाटो का एक प्रॉक्सी है। वास्तविक लड़ाई रूस और नाटो के बीच हो रही है।

इन परिस्थितियों में रूस और चीन एक धुरी पर इकट्ठे हो गए हैँ। सदियों की पश्चिमी दादागीरी से परेशान तीसरी दुनिया का बड़ा हिस्सा इसमें उनके साथ आ गया है। खुद यूरोपियन यूनियन के चंदे से चलने वाले थिंक टैंक यूरोपियन काउंसिल फॉर फॉरेन रिलेशन्स ने पिछले महीने जारी अपनी एक अध्ययन रिपोर्ट में कहा कि यूक्रेन युद्ध शुरू होन के बाद जहां पश्चिमी देश अधिक एकजुट हुए हैं, वहीं बाकी दुनिया से उनकी दूरी बढ़ गई है।

इन परिस्थितियों में ऐसा कोई समूह कैसे कोई सार्थक भूमिका निभा सकता है, जिसमें पश्चिमी देशों के साथ-साथ रूस और चीन भी शामिल हों? जब दोनों खेमों की विश्व दृष्टि बंट चुकी है, जब दोनों के आर्थिक मॉडलों का बुनियादी फर्क सामने आ चुका है और दोनों के हित परस्पर विरोधी हो चुके हैं, तो उनके बीच किसी साझा रुख या सहमति की उम्मीद करना बेमतलब है।

जी-20 की उम्र इसीलिए भी पूरी हो चुकी है कि जिस विश्व अर्थव्यवस्था के संचालन के लिए उसे बनाया गया था, उसका स्वरूप बुनियादी रूप से बदल गया है। जी-20 भूमंडलीकरण के दौर की अर्थव्यवस्था के संचालन के लिए बना था, जबकि अब दौर डी-ग्लोबलाइजेशन यानी भूमंडलीकरण की दिशा पलटने का है। इस नए दौर में नए मंच उभर रहे हैं। ब्रिक्स (ब्राजील- रूस- भारत- चीन- दक्षिण अफ्रीका) अब ब्रिक्स प्लस का रूप लेने जा रहा है। उसके साथ शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) एक सुरक्षा संगठन के रूप में उभर रहा है। आने वाले समय में दुनिया जी-7 और ब्रिक्स प्लस-एससीओ की धुरियों पर बंटी रहेगी।

भारत की मुश्किल यह है कि जहां उसके स्वाभाविक हित ब्रिक्स-एससीओ से जुड़ते हैं, लेकिन भारत के शासक वर्ग ने अपने स्वार्थों और नजरिए को पश्चिमी वित्तीय पूंजी से जोड़ रखा है। इसलिए भारत की विदेश नीति विखंडित और भटकी हुई नजर आती है। अगर भारतीय नेतृत्व ने अपने इस रुख में बुनियादी बदलाव नहीं किया, तो यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि जी-7 और ब्रिक्स प्लस-एससीओ के बीच अंतर्विरोध बढ़ने के साथ भारत का भटकाव और मुश्किल दौर में पहुंचता जाएगा।

By सत्येन्द्र रंजन

वरिष्ठ पत्रकार। जनसत्ता में संपादकीय जिम्मेवारी सहित टीवी चैनल आदि का कोई साढ़े तीन दशक का अनुभव। विभिन्न विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता के शिक्षण और नया इंडिया में नियमित लेखन।

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