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राहुल की हिम्मत और क्षत्रपों की फार्मूला राजनीति

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भारतीय राजनीति एक बहुत ही हिम्मत भरा एपिसोड देख रही है।राहुल को चारों तरफ से घेरा जा रहा है। सत्ता पक्ष तो है ही। मीडिया,विपक्ष का एक हिस्सा और डरे हुए कांग्रेसी भी राहुल के खिलाफ हैं। राहुलजितना ज्यादा साहस का प्रदर्शन करते हैं कांग्रेस के सुविधा और सुरक्षापसंद नेताओं का उतना ही डर बढ़ता जाता है। वे पिछले गेट से सरकार औरभाजपा को मैसेज पहुंचाते रहते हैं कि हम राहुल के साथ नहीं हैं। हम अंधमोदी विरोध की राजनीति नहीं करते। इस वाक्य का सीधा मतलब होता है किराहुल अंध मोदी विरोध करते हैं।

क्या फार्मूलों से राजनीति चलती है? फिलहाल तो ममता, अखिलेश, केसीआर यही समझ रहे हैं। और भरोसा है कि केन्द्र में मोदी और राज्यों में वह राजनीतिचलाते रहेंगे। मगर केजरीवाल की समझ में शायद थोड़ा आ गया होगा कि केन्द्रमें भाजपा के रहते सरकार ताबेदार की हैसियत से ही चलाई जा सकती है।बराबरी के दोस्ती के स्तर पर नहीं। उप मुख्यमंत्री रहे मनीष सिसोदिया और वित्त मंत्री रहे सत्येन्द्र जैन गिरफ्तार होकर जेल में हैं और उनकी सरकार को विधानसभा में बजट पेश करने की इजाजत तक नहीं दी जा रही है।

दिल्ली जब से राज्य बना है। केन्द्र में अलग और राज्य में अलग पार्टी कीसरकार रही है। मगर कभी इस तरह राज्य सरकार के चलाने में रोज अड़ंगे नहींडाले गए। केजरीवाल ने कांग्रेस और भाजपा दोनों की सरकारें केन्द्र मेंदेख ली हैं। और वे दावा भी सबसे ज्यादा करते हैं कि मैं पढ़ा लिखा मुख्यमंत्री हूं। मगर शिक्षा जो सबसे विशेष योग्यता लाती है अंतर करने कीविश्लेषण करने की कार्य कारण संबंध बताने की वह शायद उनमें नहीं है या वेउसका इस्तेमाल नहीं करते हैं। नहीं तो वे समझ जाते और बोलते कि मोदीसरकार एक राज्य को स्वतंत्र रूप से काम क्यों नहीं करने दे रही।

केजरीवाल प्रगतिशील और उदार विचारधारा और दक्षिणपंथी एवं प्रतिक्रियावादीविचारधारा का फर्क समझते है। देश की राजधानी दिल्ली में जहां सारे देशों काराजनयिक और मीडिया बैठा है वहां लोकतांत्रिक तरीकों का हनन क्या मैसेजदेता है? अगर पढ़ाई लिखाई का कोई मतलब होता है तो वह केजरीवाल को बतानाचाहिए। और साथ ही यह भी सोचना चाहिए की बड़ी और स्थाई राजनीतिक समस्याक्या है?

और केजरीवाल के उदाहरण से ममता, अखिलेश और केसीआर एवं अन्य जो भी तीसरेमोर्चे के समर्थक हैं उन्हें समझना चाहिए कि मोदी जी चक्रवर्ती सम्राटहैं या होना चाहते हैं। उनकी सल्तनत में किसी स्वतंत्र राज्य का कोईअस्तित्व नहीं रह सकता। केन्द्र में मोदी और राज्यों में यह के फार्मूलेपर सोच रहे इन क्षेत्रिय नेताओं को यह भी देखना चाहिए कि भाजपा राज्योंमें भी यह सुनिश्चित किया जाता है कि मुख्यमंत्रियों का कद एक निश्चितसाइज में मोदी जी से कम रहे। इसका एक मजेदार उदाहरण मोदी सेअंडरस्टेंडिंग करने वाले नेताओं को देखना चाहिए।

राज्य के विज्ञापनों मेंजो केजरीवाल से कम नहीं होते हैं और जिन पर आपत्ति है उनमें प्रधानमंत्रीके फोटो से मुख्यमंत्री के फोटो काफी छोटे होते हैं। इसे समझने के लिएलिए 9 साल पहले के विज्ञापन देखे जा सकते हैं जिनमें राज्यों के विज्ञापनमें या तो प्रधानमंत्री के फोटो होते ही नहीं थे। या मुख्यमंत्री केबराबर के साइज के। पहले राज्यों के जनसम्पर्क विभाग की चिन्ता होती थी किसीएम साहब नाराज न हो जाएं। आज दबाव यह रहता है कि पीएम साहब नाराज न होजाएं।

ममता अखिलेश केसीआर, मोदी के साथ जाने की तैयारी करें मगर यह याद रहे किक्या वे उसकी कीमत चुका पाएंगे? अपना स्वतंत्र अस्तित्व छोड़कर मातहती करपाएंगे?

विपक्ष की राजनीति इस समय बहुत दिलचस्प मोड़ पर है। एक तरफ राहुल अपनीधुन में मोदी को चैलेंज करते हुए चले जा रहे हैं। वह एक अलग ही दृश्य है।ऐसी निडरता पिछले कई सालों में राजनीति में देखी नहीं गई। इसके लिए फैजकी वही पंक्तियां याद आती हैं कि-

‘जिस धज से कोई मकतल में गया वह शान सलामत रहती है

यह जान तो आनी जानी है इस जां की तो कोई बात नहीं!”

सोमवार को जिसने राहुल को अपने संसदीय क्षेत्र वायनाड में बोलते देखा होवह इसे अच्छी तरह समझ सकता है। राहुल की बेहतरीन स्पीचों में से एक।हिम्मत भरी। खुला चैलेंज देती हुई। जो करना है करो। मैं नहीं डरता।

क्यों?  क्योंकि मैं सत्य के साथ हूं। एक बार नहीं जितनी बार पुलिस भेजनाहै भेजो। जितने मुकदमे चलाना है चलाओ। मुझे डरा नहीं पाओगे। यही आपकी (मोदी जी) समस्या है। मगर मैं कुछ नहीं कर सकता। क्योंकि मैं ऐसा ही हूं।राहुल ने अपना दिल खोलकर रख दिया। राहुल का घोषणापत्र! कहते हैं भाषण हरजगह अच्छा नहीं होता है। यह राहुल का संसदीय क्षेत्र था। इसलिए आत्मा कीआवाज।

राहुल लोकतांत्रिक हैं। पार्टी में लोकतंत्र की सबसे बड़ी स्थापना कर दी।हर आदमी कहता था नहीं, नहीं ऐसा नहीं होगा। परिवार का ही कोई बनेगा। मगरराहुल ने सबको गलत साबित करते हुए परिवार के बाहर के खड़गे को अध्यक्षबना दिया। ऐसे राहुल कुछ क्षेत्रीय नेताओं को पसंद नहीं आ रहे। वे मोदीजी के साथ अंडरस्टेंडिंग कर रहे हैं। राज्यों में वे और केन्द्र मेंमोदी।

देखना दिलचस्प होगा कि यह फार्मूला कितना चलता है। फिलहाल तो केजरीवाल कोबहुत भारी पड़ रहा है। उन्हें कुछ भी करने नहीं दिया जा रहा है। शायद इसीलिएजहां दूसरे संसद में विपक्ष के सामूहिक प्रदर्शन में साथ नहीं आ रहे आमआदमी पार्टी रोज आ रही है। और उसके सांसद संजय सिंह पूरे जोश में नारेलगा रहे हैं। बाकी तृणमूल अपना अलग प्रदर्शन करके साफ मैसेज दे रही है किविपक्ष से डरने की जरूरत नहीं। विपक्ष पूरी तरह विभाजित है।

तृणमूल की हालत इस समय उस डरे हुए व्यक्ति की तरह हो रही है जो डरानेवाले की गोद में ही जाकर बैठना चाहता है मगर संकोच यह है कि बाकी लोगक्या कहेंगे। बंगाल में तृणमूल आज वह नहीं है जो दो साल पहले मोदी सेलड़ते हुए जीत कर आई थी। अभी उपचुनाव में कांग्रेस ने उसे धो कर रख दिया।भ्रष्टाचार और झूठ ममता के खिलाफ बड़े आरोप हैं। उनके भतीजे अभिषेकबनर्जी जो पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं को ईडी ने समन भेजा है। बंगालमें सब जानते हैं कि अब अभिषेक ही तृणमूल हैं। खादी की सूती साड़ी औरहवाई चप्पल की छवि ईडी के सामने काम नहीं करेगी। उसकी असलियत जनता की समझमें भी आ रही है। अभिषेक के खिलाफ बहुत मामले हैं। और  बंगाल में कहा जारहा है कि इनको सामने लाने के पीछे ममता के वही नजदीकी लोग हैं जो अभिषेकके सर्वोसर्वा बनने से खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।

ईडी का ही डर केसीआर और अखिलेश को भी है। केसीआर की बेटी को भी तलब कियागया है। अखिलेश शुरू से ही स्मार्ट खेल रहे हैं इसलिए आराम से बचे हुएहैं। मायवती की तरह वे भी अब सारे इंस्ट्रक्शन मानने को तैयार हो गए हैं।

ऐसे में वायनाड में राहुल का यह कहना बहुत मायने रखता है कि जितनी पुलिसभेजो, मुकदमे लगाओ मैं डरने वाला नहीं हूं। आज की तारीख में इतनी हिम्मतसे ऐसी बात कौन कह सकता है! ऐसे में बीजेपी के रोज संसद में राहुल माफीमांगों नारे लगाने का कोई मतलब नहीं है। माफी मांगने का तो सवाल ही नहीं

है राहुल उससे आगे बढ़कर चुनौति दे रहे हैं कि-

“जुल्म में तेरे जोर है कितना देख लिया और देखेंगे! “

परिणाम जो हो भारतीय राजनीति एक बहुत ही हिम्मत भरा एपिसोड देख रही है।राहुल को चारों तरफ से घेरा जा रहा है। सत्ता पक्ष तो है ही। मीडिया,विपक्ष का एक हिस्सा और डरे हुए कांग्रेसी भी राहुल के खिलाफ हैं। राहुलजितना ज्यादा साहस का प्रदर्शन करते हैं कांग्रेस के सुविधा और सुरक्षापसंद नेताओं का उतना ही डर बढ़ता जाता है। वे पिछले गेट से सरकार औरभाजपा को मैसेज पहुंचाते रहते हैं कि हम राहुल के साथ नहीं हैं। हम अंधमोदी विरोध की राजनीति नहीं करते। इस वाक्य का सीधा मतलब होता है किराहुल अंध मोदी विरोध करते हैं।

इतिहास में इसे देखकर एक ही पात्र याद आता है। शल्य। कर्ण का सारथी। जोपूरे युद्ध में कर्ण को हतोत्साहित करता रहा। और अर्जुन की वीरता केगुणगान करता रहा। कर्ण भी थोड़ी शंका में पड़े थे मगर राहुल फिलहाल अभीतक दुविधा में नहीं दिखे।

By शकील अख़्तर

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स के पूर्व राजनीतिक संपादक और ब्यूरो चीफ। कोई 45 वर्षों का पत्रकारिता अनुभव। सन् 1990 से 2000 के कश्मीर के मुश्किल भरे दस वर्षों में कश्मीर के रहते हुए घाटी को कवर किया।

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