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कौन भ्रष्टाचार खत्म करना चाहता है?

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भारत में कुछ सत्ताधारी दलों द्वारा भ्रष्टाचार को ऐसा संगठित रूप दे दिया गया है, जिस में ‘पार्टी के लिए’ अरबों-खरबों का भ्रष्टाचार कराने वाले भी स्वच्छ कहे जाते हैं! इस का प्रारंभिक रूप बंगाल में सीपीएम ने बनाया, कि सत्तासीन नेता व्यक्तिगत रूप से ईमानदार दिखते थे, जबकि राज्यतंत्र को ऐसा कर दिया कि किसी का कोई भी काम बिना पार्टी इकाई को चढ़ावा दिए नहीं हो सकता था! उस से सीख कर हरेक दल की प्रतिभाओं ने कीर्तिमान बना डाले – हजारों करोड़ के वारे-न्यारे करके भी वे अपने को राजा हरिश्चन्द्र कहते हैं! जलील की तर्ज पर: रिंद के रिंद रहे, हाथ से जन्नत न गई। यानी, पार्टी-फंड के नाम पर बेतहाशा, बेहिसाब धन, अघोषित अनुचित शर्तों पर, इकट्ठा कर भी ईमानदार कहलाना!

कर्नाटक चुनाव ने पहली बार भाजपा पर भी ‘40 % कमीशन’ वाली पार्टी का तमगा लगा दिया। यदि आरोप सच हो तो कहना होगा कि न केवल इस्लाम-परस्ती (‘तुष्टिकरण’ से बढ़कर ‘तृप्तिकरण’) में, बल्कि भ्रष्टाचार और अंध-नेताभक्ति में भी भाजपा ने कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया। अब ‘संघ-चिंतक’ जैसे लोग भी कहते हैं कि ‘‘राजनीति की कोठरी ही काली है, जो इस में जाएगा उसे कालिख लगेगी ही।’’

किन्तु यह साफ झूठ है। राज कर्मचारियों द्वारा चुपचाप कुछ लेना, चुराना सारी दुनिया में सदैव रहा है। किन्तु आधुनिक लोकतंत्रों में नेताओं द्वारा पदों, ठेकों, आदि की दलाली, नीलामी जैसा नियमित धंधा कुछ और है। ऊपर से, भारत में कुछ सत्ताधारी दलों द्वारा भ्रष्टाचार को ऐसा संगठित रूप दे दिया गया है, जिस में ‘पार्टी के लिए’ अरबों-खरबों का भ्रष्टाचार कराने वाले भी स्वच्छ कहे जाते हैं! इस का प्रारंभिक रूप बंगाल में सीपीएम ने बनाया, कि सत्तासीन नेता व्यक्तिगत रूप से ईमानदार दिखते थे, जबकि राज्यतंत्र को ऐसा कर दिया कि किसी का कोई भी काम बिना पार्टी इकाई को चढ़ावा दिए नहीं हो सकता था!

उस से सीख कर हरेक दल की प्रतिभाओं ने कीर्तिमान बना डाले – हजारों करोड़ के वारे-न्यारे करके भी वे अपने को राजा हरिश्चन्द्र कहते हैं! जलील की तर्ज पर: रिंद के रिंद रहे, हाथ से जन्नत न गई। यानी, पार्टी-फंड के नाम पर बेतहाशा, बेहिसाब धन, अघोषित अनुचित शर्तों पर, इकट्ठा कर भी ईमानदार कहलाना! इस कुकर्म का बचाव सत्ताधारी पार्टियों के कारकून, समर्थक यह कह करते हैं कि ‘चुनाव लड़ने के लिए करना पड़ता है’। परन्तु यह बिलकुल झूठा बहाना है।

पहले तो, दर्जनों लोकतांत्रिक देशों में चुनाव होते हैं, जहाँ किसी पार्टी को बेहिसाब धन की जरूरत नहीं पड़ती। वही पद्धति सरलता से यहाँ भी अपना सकते हैं, जिस में एक संसदीय चुनाव-क्षेत्र में चुनाव लड़ने में भी किसी उम्मीदवार को पंद्रह-बीस लाख रूपयों से अधिक खर्च न हो। चूँकि सादी, सरल चुनाव व्यवस्था करने के लिए जरूरी नियम, प्रतिबंध, आदि सभी दलों पर समान लागू होंगे, अतः कोई आपत्ति भी नहीं कर सकेगा। बल्कि, वैसी व्यवस्था से हर कहीं अच्छे उम्मीदवारों के भी चुनाव लड़ने और चुने जाने का मार्ग खुलेगा।

पर, दरअसल अनेक बड़ी पार्टियाँ नहीं चाहतीं कि उन्हें छोटे दलों, या अच्छे स्थानीय उम्मीदवारों से चुनौती मिले। भाजपा के एक चुनाव सुपरवाइजर के अनुसार, आज के भाजपा नेता ने चुनाव लड़ने को इतना मँहगा रूप दे दिया कि स्वतंत्र उम्मीदवार क्या, अच्छी-अच्छी पार्टियाँ तक चुनाव लड़ने की क्षमता खो रही हैं। इस के पीछे सत्ता पर एकाधिकार रखने की चाल है। जो नाकाम हो जाएगी यदि चुनाव लड़ना इंग्लैंड या जापान की तरह सस्ता, आबंडरहीन बना दिया जाए।

संगठित भ्रष्टाचार का दूसरा विराट रूप है – सत्ताधारी दलों द्वारा सालो-भर राजकीय संसाधनों को पार्टी-नेता प्रचार में लगाना। जैसे, राजकीय विभागों, संस्थानों द्वारा अखबारों को विज्ञापन के नाम पर सत्तासीन नेता को नियमित रूप से लोगों के सामने फैलाते रहना। ऊपर से, मीडिया के एक वर्ग को सत्ताधारी के सामने पालतू बनाना। यानी, दोहरा कदाचार। एक बार, देश के एक बड़े अखबार के कुल 32 पृष्ठों में 23 पर एक सत्ताधारी नेता की छोटी, बड़ी, पूरे, आधे पृष्ठों पर तस्वीरें थी। सब कोई न कोई सूचना या ‘बधाई देने’ हेतु। पर असल उद्देश्य साफ था – उस नेता और उस की पार्टी का प्रचार। उन विज्ञापनों का बिल केवल एक दिन, केवल एक अखबार को, कम से कम 2-3 करोड़ रूपए रहा होगा, जो राजकोष से गया।

यदि देश के दर्जनों बड़े-छोटे अखबारों को भी जोड़ लें जिन में उस दिन वे विज्ञापन थे, तो केवल एक दिन में शायद पचास-साठ करोड़ रूपए उड़ाए गए! ऐसे जितने विज्ञापन पूरे वर्ष विविध पत्र-पत्रिकाओं व टीवी चैनलों को जाते हैं, जिस में सूचना नगण्य, तथा नेता-दल-प्रचार मुख्य रहता है, उन सब का हिसाब करें तो राजकोष के सालाना अरबों रूपए पार्टी-नेता-प्रचार में उड़ाए जाते हैं! वह भी जबकि यहाँ राज्यतंत्र के पास अपने प्रचार-प्रकाशन, रेडियो, टी.वी. चैनल, आदि हैं।

दूसरी ओर, जिन रोजमर्रे बातों से लोग नियमित प्रभावित होते हैं – विविध दफ्तरों, यातायात, अस्पताल, आदि में – तो विविध कामों के लिए बदलते नियमों, शर्तों, पाबंदियों, आदि की जानकारी शायद ही कभी प्रमुखता से दी जाती है। फिर, असंख्य सूचनाएं, आवेदन फॉर्म, साइनबोर्ड, ट्रैफिक चेतावनी, आदि केवल अंग्रेजी में होती हैं। फलतः अधिकांश लोग असहाय, मुँहताज रहते हैं। यदि ‘जन-हित’ की चिन्ता होती, तो सब से पहले यह सब दुरुस्त और स्थानीय भाषाओं में सूचित किया जाता।

यही नहीं, जरा उन विज्ञापनी तमाशों की तुलना करें, तो दुनिया की सब से धनी कंपनियाँ भी अपने काम या कंपनी के मालिक का फिजूल विज्ञापन नहीं करतीं। टाटा या टोयोटा के प्रबंधकों को सपने में भी ख्याल नहीं आता कि नियमित रूप से अखबारों में करोड़ों डॉलर के ‘बधाई’ विज्ञापन देकर मालिक की छवि फैलाएं! अतः यहाँ सत्ताधारी नेताओं द्वारा राजकोष का धन आत्म-प्रचार और पार्टी-प्रचार में फूँकना भयावह भ्रष्टाचार है। साथ ही, सत्ताहीन दलों के प्रति घोर अन्याय भी, जिन के नेताओं का वही प्रचार असंभव रहता है।

प्रकारांतर, यह चुनावी भ्रष्टाचार भी है, जब मंत्रिपदधारकों का पार्टी-प्रचार राजकोष से होता रहता है। जबकि सत्ताविहीन पार्टियों के नेताओं को अपना प्रचार अपने कोष से करना है। यह अन्याय आसानी से रुक सकता है। राजकीय विभागों, संस्थानों के विज्ञापनों में सत्ताधारी नेताओं के नाम व फोटो नहीं डालने का नियम बना कर। तमाम जरूरी सूचनाएं, विज्ञप्तियाँ उसी तरह, छोटे रूप में दी जा सकती हैं, जैसे टेंडरों या खाली पदों के विज्ञापन छपते हैं। चूँकि यह नियम भी समान रूप से देश भर की राजकीय संस्थाओं, विभागों पर लागू होंगे, इसलिए कोई मंत्री शिकायत नहीं कर सकेगा कि उसे हानि हो रही है।

उसी क्रम में, हरेक मंत्री को चुनाव में केवल अपने चुनाव क्षेत्र में प्रचार करने की अनुमति हो। वह भी बिना कोई राजकीय कार्यक्रम जोड़े। सो, मंत्रियों का पूरे देश या राज्य में घूम-घूम कर चुनाव प्रचार करना रोका जाए। क्योंकि उस से सत्ताविहीन पार्टियों, उम्मीदवारों के प्रति अन्याय होता है कि उस के कार्यक्रमों, सभाओं में राजकीय तंत्र नहीं लगा होता, जो मंत्रियों के लिए व्यवस्था, सुरक्षा, आदि के नाम पर जुड़ा रहता है। यह भी राजकोष का दलीय दुरुपयोग है, जिसे रोकना संभव है।

उपर्युक्त केवल उदाहरण हैं। संगठित भ्रष्टाचार के अनेक अन्य रूप भी हैं। राजकीय संस्थाओं, बिल्डिंगों को सत्ताधारी दलों के नेताओं के नाम देना, आदि भी पार्टी-प्रचार का तरीका है। यानी, राजकोष का दुरुपयोग। वरना राजकीय तेल कंपनी के मुख्यालय पर किसी मामूली दिवंगत पार्टी नेता की मूर्ति लगाना बेतुका है। अतः नियमित, भारी, फिजूल विज्ञापनबाजी, और अन्य तरीकों से नेता और पार्टी-प्रचार में राजकोष के अरबों रूपए उड़ाना घोर भ्रष्टाचार है। जो यूरोपीय, अमेरिकी लोकतंत्रों में अकल्पनीय है।

अंतत, भारत में राजनीतिक दलों को ‘सूचना के अधिकार’ से छूट, तथा अपने आय-व्यय की स्थिति गोपनीय रखने की अनुमति उन्हें भ्रष्टाचार का विशेषाधिकार देने समान है। सामान्य नागरिकों, दुकानों, कंपनियों से एक-एक रूपए का हिसाब देना अनिवार्य कर दिया गया है। वहीं राजनीतिक दलों को अरबों रूपए भी, कहीं से भी, चुपचाप, लेने और कैसे भी खर्चने की छूट भयंकर अन्याय है। इस में, वह संसदीय निर्णय (2018 ई.) भी जोड़े लें कि राजनीतिक दलों द्वारा ‘‘विदेशी स्त्रोतों से लिए गए धन की जाँच नहीं होगी’’, तो भयंकरता और भी विराट दिखेगी।

यह सब 95%  तक सटीक रूप से और निर्विवाद रूप से बंद किया जा सकता है – गर भ्रष्टाचार खत्म करने की मंशा हो! महामहिम राष्ट्रपति, या सुप्रीम कोर्ट, या चुनाव आयोग भी यह कर सकते हैं। राज्यतंत्र के दलीय दोहन और विविध अन्य कदाचारों को रोकने हेतु वे सदाशयी, निष्पक्ष जानकारों की एक समिति बना सकते हैं। वह ऐसे नियम प्रारूप बना सकती है जिस से सभी चुनाव सादगी से, और सभी दलों, उम्मीदवारों की स्थिति समान बना कर हों।

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By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और स्तंभकार। राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। कई पुस्तकें प्रकाशित, जिन में कुछ महत्वपूर्ण हैं: 'भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहासलेखन', 'गाँधी अहिंसा और राजनीति', 'इस्लाम और कम्युनिज्म: तीन चेतावनियाँ', और 'संघ परिवार की राजनीति: एक हिन्दू आलोचना'।

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