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केजरीवाल को कांग्रेस की जरूरत!

केजरीवाल

कांग्रेस से लड़ते लड़ते अरविंद केजरीवाल को अब कांग्रेस की जरूरत महसूस होने लगी है। असल में आम आदमी पार्टी की पूरी राजनीति कांग्रेस के साथ किसी न किसी रूप में जुड़ी है। अगर कांग्रेस कमजोर होगी तो उसके दम पर आम आदमी पार्टी फल-फूल सकती है, जैसे देश की कई प्रादेशिक पार्टियों के साथ हुआ है। दूसरी स्थिति यह है कि कांग्रेस मदद करे तो आम आदमी पार्टी मजबूत हो सकती है। इन्हीं दो मॉडल पर क्षेत्रीय पार्टियां राज्यों में मजबूत हुई हैं। जहां जहां कांग्रेस कमजोर होती गई वहां क्षेत्रीय पार्टियों ने उसकी जगह ले ली और जहां कांग्रेस ने किसी क्षेत्रीय पार्टी से तालमेल किया वहां भी वह क्षेत्रीय पार्टी कांग्रेस का वोट लेकर मजबूत हो गई।

अरविंद केजरीवाल की पार्टी की सफलता की भी ये ही दो स्थितियां हैं। अभी तक जिन राज्यों में आम आदमी पार्टी आगे बढ़ी है और मजबूत हुई है वहां वह कांग्रेस की कीमत पर हुई है। दिल्ली, पंजाब और गुजरात इन तीनों राज्यों में कांग्रेस के वोट लेकर ही आम आदमी पार्टी आगे बढ़ी है। लेकिन अब किसी अन्य राज्य में ऐसी स्थिति नहीं दिख रही है कि कांग्रेस का एकमुश्त वोट आम आदमी पार्टी की ओर शिफ्ट हों, इसलिए केजरीवाल को अब कांग्रेस की मदद की जरूरत महसूस हो रही है।

यह अनायास नहीं है कि केंद्र के अध्यादेश पर कांग्रेस की ओर से रुख स्पष्ट नहीं करने के बाद भी आम आदमी पार्टी उसके प्रति सद्भाव दिखा रही है। दो ऐसे संकेत मिले हैं, जिनसे लग रहा है कि केजरीवाल की पार्टी के रुख में नरमी आई है। पहला संकेत तो यह है कि गुजरात हाई कोर्ट ने जब मानहानि के मामले में राहुल गांधी की याचिका खारिज की और उन्हें राहत नहीं दी तो आम आदमी पार्टी ने आधिकारिक बयान में राहुल के प्रति सद्भाव दिखाया और उनका समर्थन किया। दूसरा संकेत यह है कि पार्टी के चुनाव रणनीतिकार और प्रबंधक संदीप पाठक ने कांग्रेस की बड़ी हैसियत को स्वीकार किया है।

ध्यान रहे पार्टी अब तक कांग्रेस को उसकी औकात दिखाती रहती थी और बताती थी कि अब कांग्रेस खत्म हो रही है। लेकिन राज्यसभा सांसद संदीप पाठक ने कहा है कि कांग्रेस की हैसियत बहुत बड़ी है और विपक्षी एकता बनवाने में उसको बड़ी भूमिका निभानी है। पाठक ने कहा है कि कांग्रेस को अपना अहंकार छोड़ना होगा और हर छोटी बड़ी पार्टी से बात करनी होगी क्योंकि विपक्षी एकता में उसको बड़ी भूमिका निभानी है।

अगर आम आदमी पार्टी मान रही है कि विपक्षी एकता में कांग्रेस को बड़ी भूमिका निभानी है तो इसका मतलब है कि कांग्रेस के साथ तालमेल के रास्ते उसने बंद नहीं किए हैं। पिछले कुछ दिनों से इस बात की चर्चा हो रही थी कि आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और भारत राष्ट्र समिति का एक अलग मोर्चा हो सकता है। ध्यान रहे इन चार में से दो पार्टियों, सपा और तृणमूल को कांग्रेस से नहीं लड़ना है। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की हैसियत कुछ नहीं है। इसलिए इन दो पार्टियों को कांग्रेस की राजनीति से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।

लेकिन भारत राष्ट्र समिति और आम आदमी पार्टी की राजनीति तो पूरी तरह से कांग्रेस से जुड़ी है। तेलंगाना में अगर कांग्रेस मेहनत करती है और अच्छे से चुनाव लड़ती है तो उसका बड़ा नुकसान भारत राष्ट्र समिति को होगा। इसी तरह आम आदमी पार्टी को हर राज्य में कांग्रेस की बाधा झेलनी है।

यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का जो गुबार उठा था वह अब थम गया है। उस आंदोलन की आंधी से उड़ी धूल अब सतह पर जम गई है। उस आंधी में कांग्रेस के पैर उखड़ गए थे, लेकिन अब उसके पैर जमने लगे हैं। पिछले 10 साल में कांग्रेस के खिलाफ चला भ्रष्टाचार का नैरेटिव अपनी चमक खो रहा है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लाभान्वित हुईं दोनों पार्टियां- भाजपा और आप के ऊपर भी आरोप लग रहे हैं।

आप के कई नेता जेल में बंद हैं तो जिस थोक भाव से भाजपा ने भ्रष्टाचार के आरोपी नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल किया है उससे किसी भी पार्टी के अलग होने का फर्क मिट गया है। मुंहजबानी कोई कितना भी दावा करे किसी की कमीज ज्यादा उजली नहीं दिख रही है। सो, भ्रष्टाचार के आरोपों से लड़खड़ाई कांग्रेस के संभलने से भाजपा से ज्यादा आप की चिंता बढ़ी है।

दूसरे, आम आदमी पार्टी ने विचारधारा की बजाय वस्तुएं और सेवाएं मुफ्त में देकर लोगों को आकर्षित करने की राजनीति की वह अब मुख्यधारा की राजनीति है। कांग्रेस ने अपनी विचारधारा के साथ साथ ‘मुफ्त की रेवड़ी’ बांटने की राजनीति को चुनाव लड़ने का मुख्य हथियार बनाया है। सो, अब केजरीवाल की पार्टी को लगने लगा है कि कांग्रेस को जितना कमजोर करके उसका वोट हासिल कर सकते थे उतना कर लिया, अब उसके खिलाफ लड़ कर उसे हराना मुश्किल है। इसलिए उसका वोट हासिल करने का दूसरा तरीका अपनाने की कोशिश हो रही है। दूसरा तरीका यह है कि कांग्रेस के साथ गठबंधन हो जाए तो स्वाभाविक रूप से उसका वोट आप को मिल जाएगा। कर्नाटक के बाद अल्पसंख्यकों का जो सद्भाव कांग्रेस के प्रति बना है उसमें भी आप की हिस्सेदारी हो जाएगी।

अभी तक की जो स्थिति है उसमें साफ है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में आम आदमी पार्टी का प्रचार अभियान जोर नहीं पकड़ पा रहा है। केजरीवाल ने भगवंत मान के साथ जाकर राजस्थान और मध्य प्रदेश में रैलियां की हैं लेकिन उस पर मिली प्रतिक्रिया उत्साहजनक नहीं है। अगर आम आदमी पार्टी अकेले चुनाव लड़ती है, तो उसका हस्र कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की तरह हो सकता है। तीन राज्यों- राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस व भाजपा की सीधी लड़ाई है तो तेलंगाना में बीआरएस, कांग्रेस और भाजपा की लड़ाई है। कहीं भी आम आदमी पार्टी लड़ाई में नहीं है।

केजरीवाल और उनके चुनाव रणनीतिकार संदीप पाठक को अंदाजा है कि लोकसभा चुनाव से पहले हो रहे इन राज्यों के चुनावों में अगर आम आदमी पार्टी कुछ नहीं कर पाती है तो लोकसभा चुनाव में उसके लिए कोई संभावना नहीं बचेगी। इसलिए वह विपक्षी एकता की बात कर रही है और उसमें कांग्रेस की बड़ी भूमिका बता कर उसके प्रति सद्भाव दिखा रही है। कांग्रेस इसके खतरे को जान रही है। उसको दिल्ली का अनुभव याद होगा, जहां उसने आप को समर्थन देकर उसकी सरकार बनवाई थी और उसके बाद दिल्ली में खत्म हो गई थी। इसलिए कांग्रेस के नेता किसी स्थिति में आम आदमी पार्टी से तालमेल के पक्ष में नहीं हैं। उनको पता है कि इससे आप को वैधता मिलेगी, जिसका लंबे समय में कांग्रेस को नुकसान होगा।

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