राजनीति के अपने मूल्य होते हैं, जो वैयक्तिक और सामाजिक मूल्यों से भिन्न होते हैं। व्यक्ति के जीवन में ईमानदारी, विचारों के लिए प्रतिबद्धता, व्यक्तियों के प्रति वफादारी आदि आवश्यक मूल्य हैं। लेकिन राजनीति में इनको अवगुण माना जाता है। ईमानदार, प्रतिबद्ध और वफादार व्यक्ति राजनीति में कभी सफल नहीं हो सकता है। वैसे तो व्यक्तियों के लिए भी ऐसा कहा जाता है। अंग्रेजी की कहावत है ‘नाइस गाई फिनिश लास्ट’ यानी अच्छा व्यक्ति हमेशा हारता है। फिर भी व्यक्तिगत जीवन और समाज में इन चीजों की अच्छे मूल्य के तौर पर मान्यता है और इन मूल्यों के साथ जीने वाला व्यक्ति कामयाब भले न हो पर समाज का सम्मान पा सकता है। इसके उलट राजनीति में सम्मान और सफलता तभी मिलती है, जब नेता में अवसरवादिता हो, बेईमानी व कुटिलता हो और किसी व्यक्ति या विचार के प्रति वफादारी नहीं हो।
तभी जब कांग्रेस कार्य समिति की बैठक के बाद यह खबर आई कि सोनिया गांधी ने नीतीश कुमार को ‘गद्दार’ कहा तो बड़ी हैरानी हुई। हैरानी दो कारणों से हुई। पहला तो यह कि आमतौर पर सोनिया गांधी सार्वजनिक रूप से किसी नेता के बारे में इस तरह की बातें नहीं कहती हैं। दूसरा कारण यह था कि सोनिया गांधी ने यह बात कही! एमके स्टालिन इस बयान से जुड़ी विडम्बना पर क्या सोच रहे होंगे! इस साल चार मई को तमिलनाडु के चुनाव नतीजे आए थे और जिस डीएमके के कंधे पर सवार होकर कांग्रेस पिछले 20 साल से ज्यादा समय से तमिलनाडु में राजनीति कर रही थी उसके हारते ही उसे छोड़ कर टीवीके से हाथ मिला लिया। अपने पांच विघायकों का समर्थन फिल्म स्टार विजय को देकर कांग्रेस ने दो मंत्री पद हथिया लिया और एक राज्यसभा की सीट भी हासिल कर ली। सोनिया गांधी ने जो बात कथित तौर पर नीतीश कुमार के लिए कही उससे मिलते जुलते कई विशेषण स्टालिन ने कांग्रेस के लिए इस्तेमाल किए। नीतीश कुमार भी अगर स्वस्थ होते तो कह सकते थे, ‘बुत हमको कहे काफिर अल्लाह की मर्जी है’।
बहरहाल, जानकार सूत्रों के हवाले से आई खबर के मुताबिक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में कहा कि ‘इंडिया’ ब्लॉक को नीतीश कुमार को रोकना चाहिए था। उनका कहना था कि 2024 के चुनाव से पहले नीतीश को नहीं जाने देना चाहिए था। बताया जा रहा है कि इसी पर सोनिया गांधी ने कहा कि नीतीश ‘गद्दार’ हैं और अच्छा हुआ जो वे पहले चले गए। सोनिया और मल्लिकार्जुन खड़गे ने यह भी कहा कि नीतीश विपक्षी गठबंधन से निकलने का बहाना खोज रहे थे। बहरहाल, कांग्रेस नेताओं द्वारा नीतीश कुमार को ‘गद्दार’ कहना हिप्पोक्रेसी है यह तो स्पष्ट है। लेकिन यह कहना कि वे निकलने का बहाना खोज रहे थे, सोनिया और खड़गे के अपराध बोध को भी दिखाता है। असल में कांग्रेस अपनी गलतियों पर परदा डालने के लिए नीतीश पर ठीकरा फोड़ रही है, जो अभी अपना बचाव करने की स्थिति में नहीं हैं।
यह कांग्रेस नेताओं का अपना अपराध बोध छिपाना इसलिए है क्योंकि दिग्विजय सिंह ने जो बात कही वह सौ फीसदी सही थी। अगर कांग्रेस नेता किसी तरह से नीतीश कुमार को ‘इंडिया’ ब्लॉक में रखने में कामयाब हो जाते तो 2024 के चुनाव का नतीजा अलग होता। भाजपा 240 से भी काफी नीचे जा सकती थी। एनडीए को बिहार में जो 30 सीटें मिलीं वह नीतीश के बिना मुमकिन ही नहीं था। उनके होने का मैसेज पूरे देश में भी अलग होता। सोनिया गांधी और खड़गे दोनों को पता है कि नीतीश कुमार के निकलने का तात्कालिक कारण क्या था। जनता दल यू के नेता नीतीश को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करने की बात नहीं कर रहे थे। वे नीतीश के लिए संयोजक पद चाहते थे। लेकिन दिसंबर 2023 में हुई वर्चुअल बैठक में राहुल गांधी ने ममता बनर्जी की मंजूरी लेने का हवाला देकर नीतीश का नाम रोका। इसके बाद ममता बनर्जी तो ‘इंडिया’ ब्लॉक में नहीं ही आईं, नीतीश भी निकल गए। अगर सोनिया गांधी की यह बात सही है कि वे बहाना खोज रहे थे तो कांग्रेस को उन्हें बहाना नहीं देना चाहिए था। लेकिन कांग्रेस ने बहाना दिया।
यह एक तरह से कांग्रेस नेताओं की नासमझी का भी इजहार है। क्या कांग्रेस पार्टी के नेता नहीं जानते थे कि नीतीश कुमार पाला बदल सकते हैं? असल में कांग्रेस नेता अपनी सुविधा से यह बात भूल गए थे कि नीतीश पहले पाला बदल चुके थे। 2015 में जदयू, राजद और कांग्रेस मिल कर लड़े थे लेकिन 2017 में नीतीश कुमार वापस एनडीए में चले गए थे। 2022 में फिर एनडीए छोड़ कर महागठबंधन में आए। कांग्रेस को यह इतिहास पता था फिर भी वह उनकी पहल में शामिल हुई। असल में भाजपा के मुकाबले विपक्ष का साझा गठबंधन बनाने का प्रयास ममता बनर्जी, के चंद्रशेखर राव, अरविंद केजरीवाल आदि नेता भी कर रहे थे लेकिन कामयाबी नहीं मिली। नीतीश कामयाब हुए। उन्होंने सभी पार्टियों को एकजुट किया। जून 2023 में पटना में उनके आधिकारिक आवास पर विपक्षी नेताओं की पहली बैठक हुई। सोचें, नीतीश ने वह काम किया, जो बाकी नेता नहीं कर पाए। भले वे 2024 के चुनाव से पहले गठबंधन से निकल गए लेकिन उनके बनवाए गठबंधन का फायदा यह हुआ कि कांग्रेस 52 से एक सौ सीट पर पहुंच गई। अगर नीतीश की पहल को कांग्रेस नहीं संभाल सकी, ‘इंडिया’ ब्लॉक का औपचारिक ढांचा नहीं बना या कोई संयोजक नियुक्त नहीं हुआ या कोई सचिवालय नहीं बना तो इसके लिए कांग्रेस दोषी है, नीतीश को ‘गद्दार’ कहने से कांग्रेस की अपनी नासमझी और गलती नहीं छिपने वाली है।
अंत में, अगर गठबंधन छोड़ने के नाम पर किसी नेता को ‘गद्दार’ कहा जाएगा तब तो फिर भारत गद्दारों का लोकतंत्र कहलाए। भारत में तो सबने गठबंधन बनाए और तोड़े हैं। कभी एक साथ थे, आज एक दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं और संभव है कि कुछ समय के बाद फिर साथ होंगे। यह तो भारतीय राजनीति की सचाई है। बुधवार, 30 सितंबर को ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक में सोनिया और राहुल गांधी के साथ जो नेता बैठे थे उनमें से लगभग सभी के खिलाफ कांग्रेस कभी न कभी खूब लड़ी है। राजद, शिव सेना, जेएमएम, सीपीएम सबसे कांग्रेस की घमासान लड़ाई रही है। आज दोस्ती है। कल हो सकता है फिर लड़ाई हो। लेकिन इस आधार पर कोई ‘गद्दार’ नहीं कहा जाएगा।
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