nayaindia दिल्ली की विचित्रता: सरकारी विवादों और सामाजिक मुद्दों का संग्राम
अजीत द्विवेदी

दिल्ली में दो सरकारों की लड़ाई

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सामाजिक मुद्दों

दिल्ली में सरकार की अनोखी व्यवस्था है। राजधानी दिल्ली में दो सरकारें हैं। एक दिल्ली के लोगों की चुनी हुई सरकार, जो विधानसभा के प्रति जिम्मेदार है और जिसके मुखिया अरविंद केजरीवाल हैं तो दूसरी केंद्र की सरकार, जो संसद के प्रति जिम्मेदार है और दिल्ली में जिसके मुखिया उप राज्यपाल विनय कुमार सक्सेना हैं। केंद्र ने एक कानून बनाया है, जिसका नाम जीएनसीटीडी एक्ट यानी गवर्नमेंट ऑफ नेशनल टेरेटरी दिल्ली एक्ट है और इसके मुताबिक उप राज्यपाल ही असली सरकार हैं। केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी राज्य में विपक्ष में है और राज्य में सत्तारूढ़ दल केंद्र में विपक्ष में है। इससे दिल्ली की प्रशासनिक व्यवस्था और भी अनोखी हो गई है। जो सरकार में है वह विपक्ष में भी है और जो विपक्ष में है वह सरकार में भी है। इसलिए दोनों अपने को दिल्ली का मालिक मानते हैं और दिल्ली की सत्ता के लिए लड़ते रहते हैं। दोनों के बारे में एक और अनोखी बात यह है कि दोनों प्रचार की राजनीति और सामाजिक मुद्दों में माहिर हैं। इसका नतीजा यह है कि दिल्ली में सब कुछ ठप्प पड़ा हुआ है।

दोनों पार्टियों के झगड़े से दिल्ली और समूचे एनसीआर के लोगों को किस तरह की मुश्किलें हैं, इसका एक नमूना दो फरवरी को देखने को मिला, जिस दिन दोनों पार्टियों ने अलग अलग मुद्दों पर प्रदर्शन किया था। आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया है कि भाजपा ने चंडीगढ़ के मेयर के चुनाव में जनादेश चुरा लिया। उसने 20 वोट होने के बावजूद आप और कांग्रेस के आठ वोट अवैध कर दिए और अपने 16 वोट के आधार पर मेयर का चुनाव जीत गई। इसे लेकर आप ने दिल्ली में प्रदर्शन किया तो दूसरी ओर भाजपा ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए प्रदर्शन किया और कहा कि वे गिरफ्तारी के डर से शराब घोटाले में पूछताछ के लिए ईडी के सामने पेश नहीं हो रहे हैं।

इस प्रदर्शन में शामिल होने के लिए पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान भी पहुंचे थे और आप ने पंजाब, हरियाणा हर जगह से लोग बुलाए थे। दूसरी ओर भाजपा ने भी दिल्ली के साथ साथ पूरे एनसीआर से लोगों को जुटाया। नतीजा यह हुआ है कि दिल्ली की कई सीमाओं पर बैरिकेडिंग हुई और दिल्ली के अंदर कई सड़कें बंद रहीं। कामकाजी दिन में पूरे दिन सड़कों पर भीषण जाम लगा रहा और लोग संघर्ष करते रहे। दोनों की लड़ाई का यह एक छोटा नमूना है।

अभी एक नया मामला दिल्ली के अस्पतालों का सामने आया है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का दावा है कि उनकी सरकार कुल बजट का 14 फीसदी के करीब हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च करती है, जबकि भारत सरकार का खर्च दो फीसदी के करीब है। दिल्ली सरकार का दावा है कि उसने दिल्ली की स्वास्थ्य सेवाओं में बड़ा सुधार कर दिया है।

दूसरी ओर उप राज्यपाल ने तीन फरवरी को मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिख कर मीडिया रिपोर्ट के हवाले दिल्ली के अस्पतालों की दयनीय स्थिति के बारे में सवाल पूछे हैं। दिलचस्प बात यह है कि केजरीवाल ने अस्पतालों की दयनीय स्थिति के आरोपों को खारिज नहीं किया है, बल्कि कहा है कि दिल्ली के वित्त व स्वास्थ्य सचिवों के कारण ऐसा है। उनका कहना है कि अगर इन दो सचिवों को हटा दिया जाए तो स्थिति सुधार जाएगी। सोचें, क्या सही है? विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सुविधाओं का दावा या सचिवों की वजह से अस्पतालों की दयनीय दशा?

हकीकत यह है कि दिल्ली के अस्पताल बद से बदतर हो गए हैं। केजरीवाल भले जो भी दावा करें लेकिन दिल्ली के लोग भी इलाज के लिए दिल्ली के अस्पतालों को प्राथमिकता नहीं देते हैं। वे केंद्र सरकार के अस्पतालों जैसे एम्स, सफदरजंग, राम मनोहर लोहिया, लेडी हार्डिंग जैसे अस्पतालों में जाना चाहते हैं। दिल्ली के अस्पताल उनकी मजबूरी हैं।

विश्वस्तरीय अस्पताल बनाने के दावे की हकीकत यह है कि ज्यादातर अस्पतालों में मरीजों के जांच की सुविधा नहीं है और आए दिन खबर आ रही है कि मरीज भटकते रहे और अस्पताल ने भर्ती नहीं किया, जिससे मरीज की जान चली गई। दो जनवरी को दिल्ली पुलिस एक घायल को लेकर भटकती रही थी। दिल्ली के तीन अस्पतालों- जग प्रवेश चंद, जीटीबी और एलएनजेपी में इलाज की बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलीं और आठ घंटे भटकने के बाद घायल को राम मनोहर लोहिया ले जाया गया, जहां उसने दम तोड़ दिया। यह एक प्रतिनिधि घटना है।

ऐसी घटनाएं आए दिन हो रही हैं। ऊपर से आरोप है कि दिल्ली सरकार की मुफ्त जांच योजना के तहत भारी घोटाला हुआ है। मोहल्ला क्लीनिक से लेकर दिल्ली सरकार के अस्पतालों में डॉक्टरों की हाजिरी अपने आप बनती रही, फर्जी मरीजों का इलाज चलता रहा और उनकी फर्जी जांच निजी लैब्स में होती रही। सैकड़ों करोड़ रुपए के इस घोटाले की जांच के आदेश दिए गए हैं। दिल्ली सरकार ने सड़क दुर्घटना में घायलों को अस्पताल पहुंचाने की फरिश्ते योजना शुरू की थी वह बंद है क्योंकि सरकार का दावा है कि उप राज्यपाल ने राशि की मंजूरी रोक रखी है।

चाहे दिल्ली सरकार की अकर्मण्यता की वजह से स्वास्थ्य सेवाएं बिगड़ी हों या सचिवों के कारण और उप राज्यपाल के फंड रोकने के कारण बिगड़ी हों लेकिन हकीकत यह है कि दिल्ली के लोगों को विश्वस्तरीय तो छोड़िए सामान्य स्वास्थ्य सुविधाएं भी नहीं मिल रही हैं।

स्वास्थ्य के अलावा दिल्ली सरकार का दूसरा दावा विश्वस्तरीय शिक्षा व्यवस्था का है। इसकी अलग कहानी है। दिल्ली विश्वविद्यालय के 12 कॉलेज ऐसे हैं, जिनको फंड दिल्ली सरकार देती है। शिक्षा के लिए कथित तौर पर प्रतिबद्ध दिल्ली सरकार ने इन कॉलेजों का फंड रोक दिया है। दिल्ली सरकार चाहती है कि उसे इन कॉलेजों के प्रशासन का पूरा अधिकार मिले या इन कॉलेजों को दिल्ली विश्वविद्यालय से निकाल कर राज्य सरकार के विश्वविद्यालय के अधीन कर दिया जाए तो राज्य सरकार फंड देगी। क्या इसे शिक्षा के लिए प्रतिबद्धता कहेंगे या कॉलेजों का प्रशासन और भरती-तबादले का अधिकार अपने हाथ में लेने की बेचैनी कहेंगे? उप राज्यपाल और मुख्यमंत्री के झगड़े में इन कॉलेजों के शिक्षक, शिक्षकेत्तर कर्मचारी और छात्रों की क्या स्थिति है वह समझा जा सकता है।

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के किराड़ी में चार जनवरी को एक साथ चार स्कूलों का शिलान्यास किया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कुछ स्कूलों की इमारतें बनी हैं और कुछ स्कूलों में नए क्लासरूम जोड़े गए हैं। लेकिन क्या क्लासरूम जोड़ने और इमारत बनाने से दिल्ली की शिक्षा विश्वस्तरीय हो गई है? उससे तो ठेकेदारों, नेताओं, अधिकारियों को फायदा होता है।

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए नियुक्तियां कहां हुई हैं? हकीकत यह है कि पिछले साल 15 हजार अतिथि शिक्षकों को नियमित करने का बिल आया लेकिन उसके बाद फाइल ही खो गई। इस तरह की रिपोर्ट है कि परीक्षाओं में व्यवस्थित तरीके से छात्रों की मदद करके नतीजे बेहतर किए जा रहे हैं। इसके बावजूद मेडिकल में दाखिले से लेकर इंजीनियरिंग में दाखिले और प्रशासनिक सेवाओं तक में झंडे गाड़ रहे हैं तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक के छात्र! दिल्ली के स्कूलों की पढ़ाई औसत से बेहतर नहीं हुई है। और यह स्थिति तब है, जब सरकार बजट का 26-27 फीसदी शिक्षा पर खर्च कर रही है।

दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था सीधे केंद्र सरकार के अधीन है। दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है। लेकिन राजधानी होने के बावजूद कानून व्यवस्था की स्थिति बेहद खराब है। दिसंबर 2023 में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी ने आंकड़े जारी करके बताया कि 2021 के मुकाबले 2022 में दिल्ली में अपराध में 3.3 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई। दिल्ली में तीन लाख आपराधिक मामले दर्ज हुए हैं और साइबर क्राइम में सौ फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है। यानी साइबर क्राइम दोगुने हो गए हैं।

साफ-सफाई दिल्ली सरकार और नगर निगम की जिम्मेदारी है लेकिन पिछली बरसात में जैसे दिल्ली डूबी उससे इसकी भी पोल खुल गई। सो, कुल मिला कर न सुरक्षा की व्यवस्था विश्वस्तरीय है और न शिक्षा, स्वास्थ्य व साफ-सफाई की। सिर्फ प्रचार और विज्ञापन विश्वस्तरीय हैं और झगड़े भी विश्वस्तरीय हैं। दोनों एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। दिल्ली वाली सरकार का आरोप है कि उसके विधायक खरीद कर सरकार गिराने की कोशिश हो रही है तो केंद्र वाली सरकार एक के बाद एक भ्रष्टाचार के आरोप लगा रही है और मामले सीबीआई को सौंपते जा रही है। नेताओं के साथ साथ अधिकारी भी इस झगड़े में एक पक्ष हैं और राजधानी में रहने वाले तमाशबीन बने हैं।

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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