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विपक्ष के लिए पटना का महत्व

बैठक

अगले साल के लोकसभा चुनाव की लड़ाई की शुरुआत विपक्ष ने पटना से की है। नीतीश कुमार की पहल पर पटना में बैठक हुई और लगभग सभी विपक्षी पार्टियां इसमें शामिल हुईं। कांग्रेस पर दबाव बनाने के लिए बैठक का बहिष्कार करने की घोषणा करने वाली आम आदमी पार्टी के दोनों मुख्यमंत्री शामिल हुए तो किसी न किसी तरह से कांग्रेस से दूरी दिखा रही तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेता भी पटना पहुंचे। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने पहली बार पटना की धरती पर कदम रखा। एमके स्टालिन का भी पटना की बैठक में शामिल होना मामूली घटनाक्रम नहीं है। सो, कह सकते हैं कि शुरुआत बहुत अच्छी हुई है। लेकिन इसके आगे क्या? क्या पटना से शुरू हुआ सत्ता विरोधी संघर्ष उसी तरह विपक्ष को दिल्ली की गद्दी दिला देगा, जिस तरह 1977 में मिली थी?

सभी विपक्षी पार्टियां ऐसी उम्मीद कर रही हैं और उन्होंने जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति को याद भी किया। सबने कहा कि दिल्ली में बदलाव की शुरुआत पटना से ही होती है। यह विडंबना देखिए कि जिस कांग्रेस की सरकार के खिलाफ पटना से जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन किया था वह कांग्रेस आज जेपी की सौगंध खाने वालों के साथ खड़ी है। बहरहाल, जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के बाद से गंगा जमुना में बहुत पानी बह चुका है। फिर भी दिल्ली की सत्ता के खिलाफ पटना से बिगुल फूंकने का कुछ प्रतीकात्मक महत्व है। विपक्षी पार्टियां इसे समझ रही हैं इसलिए पटना का चुनाव किया गया। बदलाव के ऐतिहासिक प्रतीक के तौर पर बिहार का हमेशा नाम लिया जाता है। लेकिन एक राजनीतिक प्रतीक के तौर पर बिहार का ज्यादा महत्व है।

देश की आधुनिक राजनीति में बिहार सबसे बड़े सामाजिक ध्रुवीकरण का प्रतीक राज्य रहा है। नब्बे के दशक से लेकर अभी हाल के चुनावों तक में इसे देखा जा सकता है। बिहार वह राज्य है, जहां भाजपा का हिंदुत्व का मुद्दा अकेले दम पर कभी कामयाब नहीं हुआ है। अपवाद के तौर पर एकाध चुनाव की मिसाल दी जाती है। जैसे कहा जाता है कि 2014 में भाजपा ने अपने दम पर लोकसभा का चुनाव जीता था। लेकिन वह भाजपा का दम नहीं था, बल्कि सामाजिक न्याय की पार्टियों के वोटों का बंटवारा था।

उस समय किसी मुगालते का शिकार नीतीश कुमार अलग लड़े थे और त्रिकोणात्मक संघर्ष में भाजपा जीती थी। उसके अगले ही साल विधानसभा चुनाव में राजद और जदयू साथ आ गए तो भाजपा बुरी तरह से हारी। तभी 2019 के चुनाव में अपनी जीती हुई सीटें छोड़ कर भाजपा ने नीतीश कुमार से तालमेल किया था। इसलिए बिहार में हमेशा भाजपा का हिंदुत्व का मुद्दा किसी बड़े सामाजिक समीकरण का मोहताज रहा है या सामाजिक न्याय के नेता का पिछलग्गू रहा है। पहली बार भारतीय जनसंघ को सत्ता का स्वाद कर्पूरी ठाकुर के पीछे लग कर मिला था और उसके बाद हर बार बिहार की सत्ता नीतीश कुमार के दम पर मिली। हिंदी पट्टी के दूसरे राज्यों में जैसे हिंदुत्व के नाम पर ध्रुवीकरण होता है और भाजपा जीतती है वैसा बिहार में नहीं होता है।

वह सांप्रदायिक आधार पर विभाजित नहीं होता है और वहां सामाजिक न्याय की ताकतों के एक होने की कई मिसालें हैं। सो, इसका पहला प्रतीकात्मक महत्व तो यह है कि बिना कुछ कहे या बिना कुछ घोषित किए विपक्षी पार्टियों का राजनीतिक एजेंडा तय हो गया। नीतीश कुमार की सदारत में हुई पहली बैठक से अपने आप यह मैसेज गया है कि विपक्ष सोशल इंजीनियरिंग के बिहार फॉर्मूले को अपना रहा है, जिसमें पिछड़े, दलित, वंचित, आदिवासी और अल्पसंख्यक मुख्य रूप से शामिल होंगे।

दूसरा प्रतीकात्मक महत्व खुद नीतीश कुमार का है। कांग्रेस के राहुल गांधी से लेकर विपक्ष का कोई नेता ऐसा नहीं है, जिसके ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे हैं या कोई न कोई मुकदमा नहीं चल रहा है। ज्यादातर नेताओं की जांच केंद्रीय एजेंसियां कर रही हैं और उनके नेता जमानत पर हैं। नीतीश इसका अपवाद हैं। वे समूचे विपक्ष में संभवतः इकलौते नेता हैं, जिनके ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं हैं। काम नहीं करने या बिहार को पिछ़ड़ा बनाए रखने के आरोप उनके ऊपर लगे हैं लेकिन वे निजी तौर पर भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त हैं।

उनका एक महत्व यह भी है कि वे पिछड़ी जाति से आते हैं और पढ़े-लिखे, विनम्र स्वभाव के नेता हैं, जिनको केंद्र में बड़े मंत्री पद संभालने से लेकर राज्य में 17 साल तक मुख्यमंत्री रहने का अनुभव है। उनका तीसरा महत्व यह है कि विपक्ष के नेताओं में वे इकलौते हैं, जिन पर परिवारवाद का आरोप नहीं है। उनकी पहल पर विपक्षी पार्टियां एक साथ आई हैं। इसलिए उनको विपक्ष का चेहरा बनाएं या नहीं बनाएं लेकिन उनके नाम से विपक्ष देश के बड़े तबके को एक संदेश दे सकता है।

इसके बावजूद यह सवाल अपनी जगह है कि पटना से आगे क्या? क्या विपक्षी पार्टियां सचमुच अपने हितों की कुर्बानी देकर आपस में समझौता कर लेंगी और एकजुट होकर भाजपा को टक्कर देंगी? इस सवाल का जवाब कई घटनाक्रमों पर निर्भर करेगा। लेकिन यह जरूर है कि जितनी पार्टियां पटना में एक साथ बैठी थीं, उनमें से ज्यादातर का मिलना प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि संगठन और राजनीतिक स्तर पर उनका तालमेल पहले से बना हुआ है। तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके साथ हैं तो बिहार में कांग्रेस, राजद व जदयू एक साथ हैं। झारखंड में कांग्रेस और जेएमएम का तालमेल बना हुआ है तो महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी पहले से एक साथ हैं और उनके गठबंधन में अब शिव सेना का उद्धव ठाकरे गुट शामिल हुआ है।

जम्मू कश्मीर में कांग्रेस और पीडीपी व नेशनल कांफ्रेंस पहले से एक साथ हैं और पिछली विधानसभा भंग होने से ठीक पहले तीनों पार्टियों ने साथ मिल कर सरकार बनाने की पहल की थी। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पहले साथ मिल कर चुनाव लड़ते रहे हैं तो लेफ्ट के साथ कांग्रेस का पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में तालमेल है। इस तरह विपक्षी बैठक में शामिल डीएमके, एनसीपी, समाजवादी पार्टी, शिव सेना उद्धव ठाकरे गुट, जेएमएम, राजद, जदयू, पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस, सीपीआई, सीपीएम और सीपीआई एमएल का कांग्रेस के साथ तालमेल है या पहले रहा है। इस तरह 15 में से 13 पार्टियां पहले से एक साथ हैं। उनके दिल मिले हुए हैं।

सिर्फ तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के साथ कांग्रेस का तालमेल होगा या नहीं होगा और होगा तो कैसा होगा यह तय होना है। दूसरी पार्टी के चंद्रशेखर राव की भारत राष्ट्र समिति है, जिसने बैठक में हिस्सा नहीं लिया था। इनका मामला थोड़ा उलझा हुआ है। आम आदमी पार्टी के साथ कांग्रेस तालमेल नहीं चाहती है। दिल्ली में 2013 में कांग्रेस ने आप की सरकार बनवाई थी और उसके बाद वह दिल्ली से खत्म ही हो गई। इसलिए किसी और राज्य में कांग्रेस उसको समर्थन या सहयोग नहीं देगी।

पश्चिम बंगाल की स्थिति थोड़ी जटिल है। वहां पिछले लोकसभा चुनाव में 60 फीसदी हिंदू वोट भाजपा के साथ गए थे। कांग्रेस और लेफ्ट ने साथ लड़ कर 12 फीसदी वोट हासिल किया था, जिससे तृणमूल को फायदा हुआ था। वहां तीनों को मिल कर लड़ना चाहिए या पिछली बार की तरह त्रिकोणात्मक मुकाबला बनाना चाहिए यह एक रणनीतिक मामला है, जो आगे तय होगा। तेलंगाना में भी कांग्रेस और बीआरएस का तालमेल भाजपा को फायदा पहुंचा सकता है। इसलिए वहां का फैसला भी बहुत सरल नहीं है।

अंत में चुनाव के एजेंडे का सवाल है तो वह भी बिहार की पहली बैठक से तय हो गया है। वह जातीय जनगणना और सामाजिक न्याय पर केंद्रित होगा। इसके अलावा आम लोगों के रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी चीजों, जैसे रोजगार, महंगाई, गरीबी आदि के ईर्द-गिर्द विपक्ष अपना नैरेटिव बनाएगा। भाजपा के हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के कोर एजेंडे के बरक्स विपक्ष का एजेंडा अलग होगा। इस बारे में आगे की बैठकों में फैसला किया जाएगा। लेकिन ध्यान रहे खड़गे और राहुल के साथ पहली बैठक में नीतीश ने सामाजिक न्याय का जो एजेंडा समझाया है वह केंद्र में होगा।

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