महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता के संदर्भों से यह अकाट्य रूप से सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण द्वारा संचालित कुरुक्षेत्र मैनेजमेंट का प्रत्येक अध्याय आधुनिक जीवन और कॉर्पोरेट जगत के संकटों का अचूक समाधान है। दुर्योधन का प्रबंधन अहंकार, अति आत्मविश्वास और केंद्रीकृत सत्ता का था, जिसका परिणाम विनाश हुआ। इसके विपरीत, श्रीकृष्ण का प्रबंधन विकेंद्रीकृत, नैतिक, रणनीतिक और मानवीय मूल्यों से ओत-प्रोत था।
भारतीय वांग्मय के अमर प्रदाता, योगेश्वर श्रीकृष्ण का चरित्र केवल आध्यात्मिक चेतना का पुंज नहीं, अपितु व्यावहारिक जीवन दर्शन, कूटनीतिक कौशल और का शाश्वत स्रोत भी है। आज का वैश्विक परिदृश्य जिस तीव्र अनिश्चितता, अनपेक्षित जटिलता और मानसिक अवसाद से जूझ रहा है, उसका सम्यक समाधान सहस्रों वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में प्रतिपादित किया जा चुका था। आधुनिक प्रबंधन शास्त्री संकट आने पर डिजास्टर मैनेजमेंट या क्राइसिस रिस्पॉन्स की चर्चा करते हैं, जो बहुधा तात्कालिक और रक्षात्मक होती है। इसके विपरीत श्रीकृष्ण का कुरुक्षेत्र प्रबंधन अग्रगामी और सुधारात्मक है।
कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल दो सेनाओं का टकराव नहीं था, वह संसाधनों की असमानता, मानसिक द्वंद्व, और नैतिक संकट के बीच सर्वश्रेष्ठ परिणाम प्राप्त करने की एक जीवंत कार्यशाला थी। श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय में ही श्रीकृष्ण अर्जुन की किंकर्तव्यविमूढ़ता को देखकर कहते हैं-
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ।।
– श्रीमद्भगवद्गीता 2/2
यहां विषमे समुपस्थितम् पद अत्यंत महत्वपूर्ण है। विषम का अर्थ है- घोर संकट, अप्रत्याशित परिस्थिति। श्रीकृष्ण प्रतिपादित करते हैं कि संकट के समय उत्पन्न होने वाला मानसिक अवसाद अनार्यों (अकुशल प्रबंधकों) का लक्षण है। कुशल प्रबंधक वही है जो संकट के प्रथम प्रहार में अपनी मानसिक एकाग्रता को भंग न होने दे।
महाभारत के उद्योगपर्व में एक अत्यंत रोचक प्रसंग आता है, जो आधुनिक प्रबंधन के संसाधन अनुकूलन सिद्धांत को पूरी तरह स्पष्ट करता है। युद्ध की घोषणा के पश्चात दुर्योधन और अर्जुन दोनों सहायता मांगने द्वारका पहुंचते हैं। श्रीकृष्ण एक ओर अपनी अजेय नारायणी सेना (अथाह भौतिक संसाधन) को रखते हैं और दूसरी ओर स्वयं को (निःशस्त्र, केवल परामर्शदाता के रूप में) प्रस्तुत करते हैं। दुर्योधन ने नारायणी सेना को चुना। यह आधुनिक कॉर्पोरेट जगत के उस एकाधिकारवादी दृष्टिकोण का प्रतीक है, जो केवल संख्याबल, भारी बजट और विपुल मशीनरी को ही सफलता की गारंटी मानता है।
अर्जुन ने निःशस्त्र श्रीकृष्ण को चुना। यह रणनीतिक नेतृत्व और बौद्धिक संपदा का चयन था। महाभारत सिद्ध करता है कि संकट काल में संसाधनों की प्रचुरता उतनी महत्वपूर्ण नहीं होती, जितनी कि उन संसाधनों को दिशा देने वाली मेधा महत्वपूर्ण होती है। दुर्योधन के पास 11 अक्षौहिणी सेना थी, जबकि पांडवों के पास मात्र 7 अक्षौहिणी। संख्याबल में न्यून होने पर भी पांडवों की विजय यह दर्शाती है कि न्यूनतम संसाधनों का यदि सटीक नियोजन किया जाए, तो वह विशालकाय किंतु असंगठित तंत्र को परास्त कर सकता है।
आधुनिक कॉर्पोरेट जगत में कर्मचारी बर्नआउट और कार्यस्थल तनाव आम हैं। कुरुक्षेत्र का युद्धारंभ इसी मानसिक अवसाद से होता है। अर्जुन, जो पांडव सेना का मुख्य परफ़ॉर्मर है, वह अपने गांडीव को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ जाता है-
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते।।
– श्रीमद्भगवद्गीता 1/29
यह किसी भी कुशल कर्मचारी या प्रबंधक की उस स्थिति का सटीक चित्रण है, जब वह लक्ष्य की विशालता और आंतरिक संघर्ष के कारण पैनिक अटैक का शिकार हो जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय में श्रीकृष्ण एक शब्द भी नहीं बोलते। वे अर्जुन को अपनी भड़ास, अपना भय और अपने तर्क पूरी तरह व्यक्त करने का अवसर देते हैं। आधुनिक प्रबंधन में इसे एक्टिव लिसनिंग कहते हैं। द्वितीय अध्याय से श्रीकृष्ण अर्जुन के तर्कों की धज्जियां उड़ाना शुरू करते हैं। वे उसे यह बोध कराते हैं कि जिसे वह करुणा समझ रहा है, वह वास्तव में उसका कायरतापूर्ण मोह- क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ है।
अठारह अध्यायों के संवाद के पश्चात अर्जुन की मानसिक स्थिति बदलती है-
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।।
– श्रीमद्भगवद्गीता 18/73
एक थका हुआ, निराश कर्मचारी जब करिष्ये वचनं तव अर्थात मैं आदेश का पालन करने के लिए तत्पर हूं, की स्थिति में आ जाता है, तो वही मेंटरशिप की वास्तविक सफलता है।
प्रबंधन का सबसे बड़ा संकट है- टारगेट का दबाव। जब व्यक्ति केवल परिणाम पर ध्यान केंद्रित करता है, तो उसके कार्य की गुणवत्ता गिर जाती है। श्रीकृष्ण ने इस वैश्विक समस्या का शाश्वत सूत्र दिया-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।
– श्रीमद्भगवद्गीता 2/47
इस श्लोक को बहुधा गलत समझा जाता है कि फल की चिंता मत करो, बस काम किए जाओ। परंतु इसका गहरा प्रबंधकीय अर्थ है- प्रोसेस ओरिएंटेशन बनाम आउटकम ओरिएंटेशन। कौरव दृष्टिकोण केवल राज्य प्राप्ति था, परिणाम- भय, अधर्म, आंतरिक कलह और अंततः विनाश। कृष्ण-पांडव दृष्टिकोण धर्म की स्थापना था, परिणाम- न्यायसंगत युद्ध (प्रक्रिया) मानसिक शांति, दृढ़ता और अंततः स्थायी विजय।
जब कोई संगठन या व्यक्ति फलेषु (भविष्य के अनिश्चित परिणाम) पर अपनी ऊर्जा नष्ट करने के बजाय कर्मणि (वर्तमान कार्य की उत्कृष्टता) पर ध्यान केंद्रित करता है, तो संकट स्वतः टल जाता है। यही तनाव-मुक्त प्रदर्शन का मूलाधार है।
कुरुक्षेत्र प्रबंधन का एक और विलक्षण आयाम टीम बिल्डिंग है। पांडवों की सेना एकाश्म नहीं थी। उसमें राजा द्रुपद की सेना थी, विराट की सेना थी, यादवों का सात्यकि दल था और घटोत्कच की जनजातीय सेना भी थी। इन विविध संस्कृतियों, क्षमताओं और पृष्ठभूमि के लोगों को एक सूत्र में पिरोना एक जटिल कार्य था। श्रीकृष्ण का यह संगठन कौशल ही था कि उन्होंने सभी सहयोगी दलों को एक ही वृहद् उद्देश्य से जोड़ा- धर्म संस्थापना। कॉर्पोरेट जगत में इसे संगठनात्मक विज़न कहा जाता है। श्रीकृष्ण ने सेनापति पद पर वयोवृद्ध युधिष्ठिर या अति उत्साही भीम को नहीं बिठाया। उन्होंने धृष्टद्युम्न को सेनापति चुना, क्योंकि वह द्रोणाचार्य के वध के विशेष उद्देश्य के लिए ही जन्मा था। शिखंडी को भीष्म के सामने खड़ा करना रणनीतिक भूमिका आवंटन का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।
आधुनिक व्यवसाय में एजाइल पद्धति की बड़ी चर्चा है, जिसका अर्थ है-परिस्थिति के अनुसार तुरंत अपनी रणनीति बदल लेना। कुरुक्षेत्र के युद्ध में श्रीकृष्ण ने पारंपरिक और रूढ़िवादी युद्ध नियमों के स्थान पर परिणाम उन्मुख कूटनीति को वरीयता दी। जब तक भीष्म सेनापति थे, पांडवों की विजय असंभव थी। श्रीकृष्ण ने शिखंडी को ढाल बनाकर भीष्म की प्रतिज्ञा का लाभ उठाया। यहां भीष्म की रूढ़िवादिता के विरुद्ध कृष्ण की लचीली रणनीति विजयी हुई। सत्यवादी युधिष्ठिर से “अश्वत्थामा हतोहतः, नरो वा कुञ्जरो वा” कहलवाना सूचना के रणनीतिक हेरफेर का उदाहरण था। संकट काल में शत्रु की मनोवैज्ञानिक शक्ति को तोड़ना उतना ही आवश्यक है जितना कि भौतिक युद्ध।
योगेश्वर ने अपनी योगमाया (मौसम के सटीक पूर्वानुमान, खगोलीय गणना) का उपयोग करके सूर्यास्त का भ्रम उत्पन्न किया। यह टाइम मैनेजमेंट और सरप्राइज एलिमेंट का चरमोत्कर्ष था।
उल्लेखनीय है कि श्रीकृष्ण अनैतिक नहीं थे। वे सत्य की रक्षा के लिए नियमों के अक्षर को छोड़कर नियमों की आत्मा को अपनाते हैं। संकट के समय यदि नियम विकास और न्याय के मार्ग में बाधा बनें, तो उन नियमों को पुनर्परिभाषित करना ही सिचुएशनल लीडरशिप है। श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय का 50वां श्लोक आधुनिक प्रबंधन विज्ञान का विजन स्टेटमेंट बनने योग्य है-
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ।।
– श्रीमद्भगवद्गीता 2/50
योगः कर्मसु कौशलम् अर्थात -कर्मों में कुशलता ही योग है। कुशलता का अर्थ क्या है?
न्यूनतम इनपुट से अधिकतम आउटपुट निकालना।
कार्य करते समय स्वयं को कर्ताभाव के अहंकार से मुक्त रखना।
संकट की स्थिति में भी विचलित न होकर विवेकपूर्ण निर्णय लेना।
यदि कोई प्रबंधक इस कौशल को सीख लेता है, तो वह किसी भी आर्थिक मंदी, बाजार के उतार-चढ़ाव या संगठनात्मक संकट से अपने संस्थान को सुरक्षित निकाल सकता है।
महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता के संदर्भों से यह अकाट्य रूप से सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण द्वारा संचालित कुरुक्षेत्र मैनेजमेंट का प्रत्येक अध्याय आधुनिक जीवन और कॉर्पोरेट जगत के संकटों का अचूक समाधान है। दुर्योधन का प्रबंधन अहंकार, अति आत्मविश्वास और केंद्रीकृत सत्ता का था, जिसका परिणाम विनाश हुआ। इसके विपरीत, श्रीकृष्ण का प्रबंधन विकेंद्रीकृत, नैतिक, रणनीतिक और मानवीय मूल्यों से ओत-प्रोत था। आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था और कॉर्पोरेट संस्कृति को यदि मंदी, अवसाद और विनाश से बचना है, तो उसे कुरुक्षेत्र के इस प्रबंधन मॉडल को अपने कर्मक्षेत्र में उतारना ही होगा। यही इस पावन जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण के प्रति हमारी वास्तविक वैचारिक अंजलि होगी।
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