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अमेरिका का स्वेज नहर क्षण

अब ऐसी ताकतों का उदय हो चुका है, जो अमेरिका को नहींकह सकते हैं। वे उस इनकार पर कायम बने रह सकते हैं। जो ऐसा करने में सक्षम हैं, वे सभी एक ध्रुव हैं। ईरान ने खुद को एक ऐसा ध्रुव साबित किया है। उसने दिखाया है कि अपनी खास भौगोलिक स्थिति, सैन्य क्षमताओं में निवेश, और परिणाम भुगतने की राजनीतिक इच्छाशक्ति के सही संयोजन से कोई क्षेत्रीय शक्ति अपने पास-पड़ोस में अमेरिकी दादागीरी को नकार सकती है।

ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजराइल के साझा युद्ध के चार हफ्ते पूरे होने तक यह साफ हो गया है कि इस लड़ाई का नियंत्रण दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य महाशक्ति के हाथ में नहीं रहा। नतीजा है कि डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन युद्ध से निकलने की बेताबी के बावजूद उससे निकल नहीं पा रहा है। और इसीलिए ये राय पुख्ता हुई है कि यह युद्ध अमेरिका का ‘स्वेज नहर क्षण’ साबित हो सकता है।

स्वेज नहर कृत्रिम जल मार्ग है, जो भू-मध्य सागर को लाल सागर से जोड़ने के लिए बनाया गया है। फिलहाल, ये नहर मिस्र की संपत्ति है। उससे होने वाले परिवहन का संचालन मिस्र की सरकारी एजेंसी- स्वेज नहर प्राधिकरण करती है। मगर पहले यह Suez Canal Company की संपत्ति थी, जिसका मालिकाना ब्रिटेन और फ्रांस के शेयरधारकों के हाथ में था। 1956 में मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति और अरब राष्ट्रवाद के नायक गमाल अब्देल नासिर ने नहर का राष्ट्रीयकरण कर लिया।

स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण वह महत्वपूर्ण घटना थी, जिसने ब्रिटेन की वैश्विक शक्ति में गिरावट की पुष्टि की। उससे साफ हो गया कि ब्रिटेन अब अमेरिका की अनुमति के बिना स्वतंत्र रूप से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता। इस घटना ने ब्रिटिश साम्राज्य के पतन को अंतिम गति प्रदान की। इसलिए इसे आधुनिक इतिहास में एक युगांतकारी अवसर के रूप में याद किया जाता है।

जुलाई 1956 में मिस्र के राष्ट्रपति नासिर ने स्वेज नहर कंपनी का राष्ट्रीयकरण किया, तो उससे ब्रिटिश साम्राज्य के रुतबे को भारी चोट पहुंची। उसके विरोध में ब्रिटेन, फ्रांस, और इजराइल ने एक गुप्त समझौता किया। उसके तहत तय हुआ कि इजराइल मिस्र पर हमला करेगा, जिसके बाद ब्रिटेन और फ्रांस वहां सैन्य हस्तक्षेप करेंगे।

यह आक्रमण 29 अक्टूबर 1956 को शुरू हुआ। सैन्य दृष्टि से यह सफल कार्रवाई थी। फिर भी ब्रिटेन के लिए वह राजनीतिक आपदा साबित हुई। नवोदित महाशक्ति अमेरिका को इस घटनाक्रम में ब्रिटेन के प्रभाव को हमेशा के लिए दफन करते हुए अपना रुतबा कायम करने का मौका नजर आया। तो उसने महत्त्वपूर्ण दखल दिया। अमेरिका ने ब्रिटिश पाउंड के अपने भंडार को बेचने की धमकी दी, जिससे ब्रिटिश मुद्रा का मूल्य तेजी से गिरने लगा। इससे ब्रिटिश अर्थव्यवस्था गहरे दबाव में आ गई। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर ने ब्रिटेन एवं फ्रांस के संरक्षण में हुए इजराइली हमले की सार्वजनिक निंदा की थी। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में तत्काल संघर्ष विराम की मांग करने वाले प्रस्ताव का समर्थन किया। अलग-थलग पड़ गए ब्रिटेन को उस प्रस्ताव का पालन करने के लिए मजबूर होना पड़ा। उससे अमेरिका पर बनी उसकी पूर्ण निर्भरता जग-जाहिर हो गई।

वैसे ब्रिटेन को उस मुकाम तक पहुंचाने में तत्कालीन सोवियत संघ की सबसे अहम भूमिका रही। सोवियत संघ ने मिस्र की ओर से युद्ध में उतरने तक की चेतावनी दी थी। जब संकट के चरम पर था, तो तत्कालीन सोवियत प्रधानमंत्री निकोलई बुल्गानिन ने ब्रिटेन, फ्रांस, और इजराइल के नेताओं को पत्र भेजे। कई इतिहासकार इन पत्रों को शीत युद्ध की तब तक की सबसे “खतरनाक बयानबाजी” मानते हैं।

तो कुल मिलाकर स्वेज संकट वो उत्प्रेरक बना, जिसने कमजोर पड़ चुके ब्रिटेन के विश्व वर्चस्व की बची-खुची धारणा को जमींदोज कर दिया। इतिहासकारों ने स्वेज युद्ध को “ब्रिटिश साम्राज्य का अंतिम संघर्ष” कहा है।

बहरहाल, इस विरोधभास पर अवश्य ध्यान देना चाहिएः सैन्य रूप से ब्रिटेन और फ्रांस के संरक्षण में इजराइल ने प्रभावशाली सफलता हासिल की थी। इन देशों ने लगभग हर सामरिक उद्देश्य हासिल कर लिया। फिर भी राजनीतिक रूप से यह युद्ध ब्रिटेन के लिए आपदा साबित हुआ।

तो अब वर्तमान में आएं। एक बार फिर युद्ध का मैदान पश्चिम एशिया है। आक्रमण का एक पात्र फिर इजराइल है। इस बार उस पर संरक्षण अमेरिका का है। मगर नई सूरत यह है कि ये दोनों देश अपने ही शुरू किए युद्ध को अपने काबू में रखने में नाकाम होते दिखे हैं। साफ संकेत हैं कि सैन्य विमर्श में जिसे escalation dominance (युद्ध प्रभुत्व) कहा जाता है, वह ईरान के हाथ में चला गया है। escalation dominance उस क्षमता को कहा जाता है, जिससे युद्ध के दौरान कोई देश आगे इतने गंभीर परिणाम होने की ऐसी विश्वसनीय धमकी दे सके, जिससे शत्रु देश बराबरी पर मुकाबला करने के बजाय तनाव कम करने की इच्छा जताने लगे।

escalation dominance कायम करने के लिए जरूरी नहीं है कि शत्रु को सैन्य रूप से निर्णायक रूप से परास्त कर दिया जाए। यह भी जरूरी नहीं है कि सभी क्षेत्रों में संबंधित देश समान मुकाबला कर रहा हो। दरअसल, असमान शक्ति वाले देशों के बीच युद्ध में escalation dominance के साथ-साथ जीत-हार के पैमाने भी अलग होते हैं। इस सिलसिले में कमजोर शक्ति के लिए महज इतना जरूरी समझा जाता है कि वह ऐसी स्थिति पैदा कर दे, जिससे मजबूत देश युद्ध से निकलने का रास्ता ढूंढने को मजबूर हो जाए।

इस युद्ध में कमजोर शक्ति ईरान है। उसने ऐसी स्थिति बना दी है, जिससे युद्ध खत्म करने की पहल अमेरिका करता दिखा है। दुनिया पर अमेरिकी वर्चस्व बनने के बाद यह पहली घटना है, जब वह ऐसे हाल में दिखा हो। खासकर शीत युद्ध के अंत (1991 में सोवियत संघ के विघटन) के बाद से अमेरिका ने हर युद्ध में अपने शत्रु पर प्रभुत्व बनाए रखा। उन युद्धों में वह अपना सैन्य मकसद हासिल कर पाया या नहीं, यह दीगर बात है। हकीकत यह है कि अधिकांश मौकों पर वह ऐसा नहीं कर पाया।

मगर सर्बिया (युगोस्लाविया) से लेकर इराक और अफगानिस्तान से लेकर लीबिया तक के युद्धों में अमेरिकी क्षमता को लेकर कभी सवाल नहीं उठे। दरअसल, तब अमेरिका का भय ऐसा था कि युद्ध के मैदान पर उसे चुनौती देने के लिए सोचना तक कठिन लगता था। बेशक, कई देशों ने राष्ट्रीय आत्म-सम्मान की भावना या विचारधारा से प्रेरित होकर अमेरिका का विरोध जारी रखा, लेकिन यह राय किसी की नहीं थी कि युद्ध हुआ तो अमेरिका के खिलाफ कोई escalation dominance कायम कर पाएगा।

मगर ईरान की कहानी कुछ और है। उसने भारी बर्बादी झेलते हुए भी हर चुनौती को स्वीकार किया है। मसलन, अमेरिका-इजराइल ने ईरान के तेल ठिकानों पर हमले किए, तो ईरान उसका उसी रूप में जवाब दिया। ईरान के बिजली ग्रिड तबाह करने की धमकी ट्रंप ने दी, तो ईरान ने लगे हाथ वैसी ही कार्रवाई करने का माद्दा दिखा दिया। ईरान के इसी जज्बे ने अमेरिकी नीति-निर्माताओं को पीछे हटने के लिए मजबूर किया है।

दूसरे महायुद्ध के बाद अमेरिका का बराबरी के स्तर पर सैन्य मुकाबला करने का जज्बा सिर्फ सोवियत संघ ने दिखाया था। मगर ईरान सोवियत संघ नहीं है। उसके पास परमाणु हथियार नहीं हैं। ईरान की अर्थव्यवस्था अमेरिका की तुलना में कहीं नहीं ठहरती। फिर भी, अपनी ताकत के बिंदुओं पर खेलने की रणनीति से उसने असमान परिणाम पैदा किया है। इस तरह उसने अमेरिका की सैन्य शक्ति की सीमाओं को दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया है। जबकि इस युद्ध के पहले तक ऐसा कभी नहीं हुआ।

इस युद्ध के दौरान और क्या हुआ है, उस पर सरसरी नज़र डालेः

     एक महीने से भी कम समय में खाड़ी देशों में अमेरिका के लगभग सभी सैन्य अड्डे निशाना बने और तकरीबन 17 अड्डों का ये हाल हुआ कि वहां किसी के लिए रहना संभव नहीं रह गया।

     उस क्षेत्र में लगे अमेरिका के उन्नत रडार और मिसाइल इंटरसेप्टर नष्ट हुए या उन सिस्टम्स की क्षमता चूक गई। इसी क्रम में जाहिर हुआ कि अपनी कमजोर उत्पादक क्षमता के कारण अमेरिका तुरंत उनकी भरपाई करने की स्थिति नहीं है।

     अमेरिकी बेड़ों- अब्राहम लिंकन और जेराल्ड फोर्ड ईरानी मिसाइलों का निशाना बने, जिससे उन्हें युद्ध क्षेत्र छोड़ कर जाना पड़ा।

     ईरानी हमले के कारण अनेक अमेरिकी टैंकरों से लपटें उठती दिखीं।

     अमेरिका के सैन्य अड्डों के मेजबान देशों- यूएई, बहरीन, कुवैत, कतर, और सऊदी अरब को यह अहसास दिलाने में ईरान कामयाब रहा कि अमेरिका का सुरक्षा कवच उनकी हिफाजत की गारंटी नहीं है। यूएई जिस मॉडल पर खड़ा होकर चमकता नजर आता था, वह आज ढहता नजर आता है।

     दुबई एवं अन्य खाड़ी देशों में अचल संपत्ति में अमेरिकियों के निवेश, अमेरिकी बैंक, डेटा केंद्र, और तेल कंपनियों की आदि के लिए अब वो इलाका महफूज नहीं रह गया है।

     इन कारणों से ही अमेरिकी शक्ति में उसके समर्थकों का विश्वास डोला है। अमेरिका की प्रतिष्ठा आज दांव पर लगी हुई है।

     इस बीच होरमुज जलडमरूमध्य को बंद कर ईरान ने विश्व अर्थव्यवस्था पर अभूतपूर्व दबाव बनाया है। इसके साथ ही उसने पेट्रो-डॉलर सिस्टम को खंडित करने की दिशा में सुनियोजित कदम उठाए हैं।

     इसका असर अमेरिकी बॉन्ड्स पर दिखा है, जिन्हें बेचने के लिए उसे अधिक ब्याज देने पर राजी होना पड़ रहा है।

     भू-राजनीतिक नजरिए से देखें, तो इस युद्ध के परिणास्वरूप अमेरिका को अपने कई कदमों को वापस लेना पड़ा है। उसने रूस और ईरान के कच्चे तेल की बिक्री पर से प्रतिबंध हटा दिए। रूस अब बाजार भाव से भी ऊंची कीमत पर कच्चा तेल बेच कर अपने पिछले नुकसान की भरपाई कर रहा है।

     युद्ध के कारण ऐतिहासिक वैश्विक ऊर्जा संकट उत्पन्न हुआ है और दुनिया के एक बड़ी आर्थिक मंदी की ओर बढ़ती नजर आ रही है।

     इससे पैदा हुए दबाव के बीच अमेरिका का अपना खेमा बिखरता नजर आया है। नाटो के लेकर आज जितनी अनिश्चितताएं हैं, उतनी पहले कभी नहीं रहीं।

     ट्रंप काल में अमेरिका अपने सॉफ्ट पॉवर की चिंता नहीं करता। मगर उसे पहुंचे नुकसान पर भी ध्यान दें, तो साफ है कि अमेरिका के लिए अपने पुराने ‘गौरवशाली’ दिन वापस पाना अब लगभग नामुमकिन हो गया है।

     और सबसे ऊपर वह है, जो इजराइल में होता दिखा है। अपनी स्थापना के बाद से इजराइल उस क्षेत्र में अपने विरोधी देशों को ‘पीटता’ ही रहा है। अल्पकालिक युद्धों में अपने तात्कालिक उद्देश्य हासिल कर वह अपनी शर्तों पर युद्ध खत्म करता रहा है। ऐसा वह अमेरिका एवं अन्य पश्चिमी देशों के अटूट संरक्षण की वजह से कर पाता था। लेकिन इस बार कहानी अलग है। यह पहला मौका है, जब उसकी ‘पिटाई’ हो रही है। कहा तो यहां तक गया है कि यह देश तेजी से ना रहने योग्य होता जा रहा है। वहां बर्बादियों के आलम एवं असुरक्षा के साये की वजह से बड़ी संख्या में लोग देश छोड़ कर जा रहे हैं, जो शायद कभी वापस ना आएं। ऐसा हो रहा है, तो इसका कारण भी उसके संरक्षक अमेरिका की जाहिर हुई कमजोरियां हैँ।

ये वो कमजोरियां हैं, जो इस युद्ध के दौरान सबके सामने आ गई हैं। बेहिचक इनकी तुलना स्वेज नहर संकट के समय ब्रिटेन की जाहिर हुई अवस्था से की जा सकती है।

इन सबके क्या परिणाम होंगे?

इस पर विचार करते समय यह अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि उत्पादक अर्थव्यवस्था के मामले में अमेरिका काफी पहले चीन से पिछड़ चुका है। तकनीकी आविष्कार के मामले में भी वह अब अतुलनीय नहीं रहा। यानी सैन्य ताकत ही उसकी सबसे बड़ी बची पहचान है। उसकी दूसरी बची शक्ति डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था है, मगर उस पर भी ईरान ने इस युद्ध में खुल कर चोट पहुंचाई है।

इस पृष्ठभूमि में हम बेशक अनुमान लगा सकते हैं कि यह युद्ध इस बात की पुष्टि कर जाएगा कि अमेरिका दुनिया की सबसे प्रमुख धुरी अब नहीं रहा। दुनिया अब बहु-ध्रुवीय बन चुकी है।

बहु-ध्रुवीयता का अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका बिल्कुल शक्तिशाली नहीं है। इसका यह अर्थ नहीं होगा कि अमेरिकी सेना बलहीन हो चुकी है। दरअसल, इसका यह मतलब भी नहीं है कि अमेरिका का आर्थिक महत्त्व खत्म हो गया है।

बहु-ध्रुवीयता का अर्थ सिर्फ यह है कि दुनिया के हर हिस्से और हर देश को अपने मन-माफिक चलाने की अमेरिकी क्षमता चूक गई है। अब वह धमकी देकर या प्रतिबंध लगा कर अपने आदेशों का हर जगह पालन कराने की हैसियत में नहीं रहेगा। अब यह नहीं होगा कि जो लक्ष्मण रेखा अमेरिका ने खींच दी, हर देश उसका पालन करने के लिए मजबूर हो जाए।

मतलब दरअसल, यह है कि अब ऐसी ताकतों का उदय हो चुका है, जो अमेरिका को “नहीं” कह सकते हैं। वे उस इनकार पर कायम बने रह सकते हैं। जो ऐसा करने में सक्षम हैं, वे सभी एक ध्रुव हैं। ईरान ने खुद को एक ऐसा ध्रुव साबित किया है। उसने दिखाया है कि अपनी खास भौगोलिक स्थिति, सैन्य क्षमताओं में निवेश, और परिणाम भुगतने की राजनीतिक इच्छाशक्ति के सही संयोजन से कोई क्षेत्रीय शक्ति अपने पास-पड़ोस में अमेरिकी दादागीरी को नकार सकती है। जो देश ऐसा करने योग्य हैं, वे खुद एक धुरी समझ सकते हैं। बहु-ध्रुवीयता की फिलहाल यही परिभाषा है।

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By सत्येन्द्र रंजन

वरिष्ठ पत्रकार। जनसत्ता में संपादकीय जिम्मेवारी सहित टीवी चैनल आदि का कोई साढ़े तीन दशक का अनुभव। विभिन्न विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता के शिक्षण और नया इंडिया में नियमित लेखन।

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