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न्यायपालिका संवैधानिक अधिकारों की संरक्षक

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की जटिलता बढ़ती जा रही है और विचाराधीन श्रेणी के 60 लाख मतदाताओं में से जिनके नाम कट रहे हैं उनकी सुनवाई के लिए बने अपीलीय ट्रिब्यूनल ने अभी तक अपना कामकाज आरंभ नहीं हुआ है। विचाराधीन श्रेणी के करीब 40 फीसदी यानी लगभग 24 लाख मतदाताओं के नाम कटने की संभावना है। इन पर विचार के लिए बने 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल में सुनवाई के बगैर अंतिम फैसला नहीं हो सकता है।

पश्चिम बंगाल की सभी पार्टियां चुनाव लड़ने को तैयार हैं। सारी पार्टियां चुनाव प्रचार में लगी हैं। सबको जीत का भरोसा है। ऐसा लग रहा है कि मतदाताओं के अधिकार की रक्षा के लिए कुछ भी करने का दम भरने वाली ममता बनर्जी चाहती हैं कि किसी तरह से चुनाव समय पर हो जाए। मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी भी कमर कस कर चुनाव के लिए तैयार है। प्रदेश में हाशिए पर की दोनों पार्टियां, कांग्रेस और सीपीएम चाहते हैं कि जब तक मतदाता सूची का शुद्धिकरण नहीं हो जाता है तब तक चुनाव नहीं होना चाहिए। परंतु दोनों मुख्य पार्टियां चुनाव के पक्ष में दिख रही हैं। तभी यह यक्ष प्रश्न है कि क्या यह संविधानसम्मत होगा? क्या भारत की सर्वोच्च न्यायपालिका इसकी अनुमति देगी कि लाखों की संख्या में नागरिकों के नाम मतदाता सूची से कट जाएं और उनको अपना पक्ष रखने का अंतिम अवसर न मिले? ये प्रश्न इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की जटिलता बढ़ती जा रही है और विचाराधीन श्रेणी के 60 लाख मतदाताओं में से जिनके नाम कट रहे हैं उनकी सुनवाई के लिए बने अपीलीय ट्रिब्यूनल ने अभी तक अपना कामकाज आरंभ नहीं हुआ है। विचाराधीन श्रेणी के करीब 40 फीसदी यानी लगभग 24 लाख मतदाताओं के नाम कटने की संभावना है। इन पर विचार के लिए बने 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल में सुनवाई के बगैर अंतिम फैसला नहीं हो सकता है।

ध्यान रहे पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का मामला दूसरे राज्यों से अलग है। स्वंय सर्वोच्च न्यायालय ने इस ओर ध्यान दिलाया, जब पिछली सुनवाई में उसने कहा कि दूसरे राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया सहज रूप से संपन्न हुई, जबकि पश्चिम बंगाल एकमात्र राज्य है, जहां इतनी समस्या आ रही है। यह भी ध्यान रखने की बात है कि पश्चिम बंगाल में एसआईआऱ के पहले चरण के बाद हर कदम पर सर्वोच्च न्यायालय इस प्रक्रिया में शामिल है। एसआईआर के पहले चरण के बाद की सारी व्यवस्था सर्वोच्च न्यायालय की बनवाई हुई है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर एडजुटिकेशन के लिए प्राधिकार बनाया गया और बंगाल के साथ साथ ओडिशा और झाऱखंड के न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त करके विचाराधीन श्रेणी में रखे गए मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच शुरू हुई।

ऐसे ही सर्वोच्च न्यायपालिका के निर्देश पर 19 ट्रिब्यूनल का गठन किया गया। यह एक तरह से एसआईआर का चौथा चऱण हो गया। पहले चरण के बाद जो मसौदै सूची जारी हई उसमें चुनाव आय़ोग ने 58 लाख मतदाताओं के नाम काटे और सवा करोड़ के करीब मतदाताओं को तार्किक विसंगति के आधार पर नोटिस जारी किए गए। इसके बाद दूसरे चरण में आयोग ने अंतिम मतदाता सूची जारी की तो उसमें पांच लाख नाम और काटे गए। यानी कुल 63 लाख नाम कट गए। साथ ही अंतिम मतदाता सूची में चुनाव आयोग ने 60 लाख से कुछ ज्यादा नामों को विचाराधीन श्रेणी में डाल दिया। ये 60 लाख मतदाता वो हैं, जिनको तार्किक विसंगति के आधार पर नोटिस दिया गया था। तीसरे चरण में इन मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर सात सौ न्यायिक अधिकारियों के अपीलीय प्राधिकार का गठन किया गया।

तभी यह सवाल उठा कि इस अपीलीय प्राधिकार की जांच के बाद जिन मतदाताओं के नाम कटेंगे क्या उनके दावे और आपत्तियों पर सुनवाई होगी? सर्वोच्च अदालत ने ऐसे मतदाताओं के दावे और आपत्तियों पर सुनवाई के लिए 19 ट्रिब्यूनल बनाने का आदेश दिया। इस चौथे चरण में हाई कोर्ट के रिटायर जजों का एक ट्रिब्यूनल एक जिले के मतदाताओं के दावे और आपत्तियां सुनेगा। कुछ ट्रिब्यूनल ऐसे हैं, जहां एक से ज्यादा जिलों की आपत्तियां सुनी जाएंगी।

एक मार्च से सात सौ न्यायिक अधिकारी 60 लाख विचाराधीन श्रेणी के मतदाताओं की सुनवाई कर रहे हैं और अभी तक उन्होंने करीब 40 लाख मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच कर ली है। एक अनुमान के मुताबिक इसमें 15 से 16 लाख नाम कट रहे हैं। अगर इस अनुपात से देखें तो 60 लाख विचाराधीन नामों में से अगर 40 फीसदी नाम कटते हैं तो इसका अर्थ होगा कि लगभग 24 लाख नाम और कट जाएंगे। ध्यान रहे पहले 63 लाख नाम कट चुके हैं। इसका अर्थ है कि कुल 87 लाख नाम कटेंगे और पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में पौने सात करोड़ के करीब मतदाता बचेंगे। यही असली समस्या आती है। विचाराधीन श्रेणी के जिन 24 लाख लोगों के नाम कटेंगे, ट्रिब्यूनल में उनकी सुनवाई कैसे होगी और कब तक होगी? इसी से जुड़ा सवाल यह है कि अगर वह सुनवाई नहीं पूरी होती है और इन मतदाताओं के बारे में ट्रिब्यूनल का अंतिम फैसला नहीं आता है तो क्या चुनाव हो सकता है?

यह यक्ष प्रश्न है और इसका उत्तर देश की सर्वोच्च न्यायापालिका को देना होगा। क्योंकि सर्वोच्च न्यायपालिका को ही संविधान के संरक्षक की भूमिका दी गई है। नागरिकों के संवैधानिक अधिकारियों की रक्षा करने का उत्तरदायित्व सर्वोच्च न्यायालय का है। पार्टियां तो अपनी जीत हार के हिसाब से फैसले करती हैं और सबको लग रहा है कि इस चुनाव में उसकी जीत हो जाएगी तो सब किसी तरह से भी चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। परंतु सर्वोच्च अदालत को देखना होगा कि विचाराधीन श्रेणी के जिन लगभग 24 लाख लोगों के नाम कट रहे हैं उनके दावों और आपत्तियों की सुनवाई ट्रिब्यूनल में हो और उसका अंतिम फैसला आने तक चुनाव नहीं हो। ध्यान रहे भारत में न्याय का यह सिद्धांत अपनाया गया है कि भले सौ दोषी छूट जाएं लेकिन किसी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए।

वही तर्क मतदाताओं के मामले भी लागू होता है। भले कुछ अपात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में रह जाएं लेकिन किसी पात्र मतदाता का नाम नहीं कटना चाहिए। यह सुनिश्चित करना सर्वोच्च न्यायालय की जिम्मेदारी है।

अब मुश्किल यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर जो ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं उन्होंने अभी तक काम करना ही शुरू नहीं किया है। ध्यान रहे ट्रिब्यूनल एक न्यायिक निकाय है इसलिए उसे न्याय के सिद्धांतों के हिसाब से ही काम करना होगा। वहां मतदाताओं को आवेदन देना होगा। अपनी आपत्ति दर्ज करानी होगी और साथ ही अपने दस्तावेज जमा कराने होंगे। ट्रिब्यूनल इस बात की जांच करेगा कि अपीलीय प्राधिकार ने किस आधार पर मतदाता का नाम काटा है। इस तरह की जांच और फैसला आने में समय लगेगा। 19 ट्रिब्यूनल में करीब 24 लाख नामों की जांच होनी है और जांच की प्रक्रिया अभी शुरू भी नहीं हुई है।

चुनाव आयोग की ओर से अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के मुताबिक पूरक मतदाता सूची का प्रकाशन शुरू हो गया है। आयोग ने कहा है कि पूरक मतदाता सूची में जिन लोगों के नाम नहीं हैं उनको 15 दिन के भीतर अपीलीय ट्रिब्यूनल के सामने अपनी आपत्ति दर्ज करानी होगी। इसमें कई तरह की मुश्किल आ रही है। पहली मुश्किल तो यह है कि चुनाव आयोग की पूरक सूची पहले की तरह हर जगह उपलब्ध नहीं कराई गई है। इसका अर्थ है कि मतदाताओं को स्वंय अपना नाम खोजना है और पता करना है कि उनका नाम कटा है या नहीं।

दूसरी मुश्किल यह है कि चुनाव आयोग ने कहा है कि ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से आपत्ति दी जा सकती है लेकिन चुनाव आयोग की वेबसाइट पर इसकी जानकारी नहीं है कि ऑनलाइन कैसे आपत्ति दर्ज कराएं। जिला चुनाव अधिकारियों का कहना है कि पूरक मतदाता सूची में जिन मतदाताओं के नाम नहीं हैं वे जिला कार्यालय में ऑफलाइन आवेदन जमा कर रहे हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि अपीलीय ट्रिब्यूनल ने अपना काम शुरू ही नहीं किया है, जहां ये आवेदन भेजे जाएं। दूसरी ओर बड़ी संख्या में लोग लगातार कार्यालयों के चक्कर लगा कर और अनेक किस्म के दस्तावेज जमा करके परेशान हो गए हैं। बहुत से लोग थक हार कर बैठ गए हें। यह एक अलग समस्या है।

परंतु मूल बात यह है कि जब तक अपीलीय ट्रिब्यूनल इन सभी मतदाताओं की आपत्तियों की जांच नहीं कर लेता है और उस पर अंतिम फैसला नहीं सुना देता है तब तक चुनाव नहीं कराया जा सकता है। चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों को इस पर ध्यान देना चाहिए लेकिन सबसे ज्यादा जिम्मेदारी सर्वोच्च न्यायालय पर है कि उसकी देख रेख में मतदाता सूची के शुद्धिकरण की जो प्रक्रिया चल रही है उसमें किसी तरह की गड़बड़ी न हो। सर्वोच्च न्यायपालिका को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम नहीं कटे। अगर इसके लिए चुनाव की तारीखें आगे बढ़नी पड़ती हैं तो उसमें भी हिचक नहीं होनी चाहिए। समय पर चुनाव जरूर होना चाहिए लेकिन मतदाताओं के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।(लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

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