nayaindia chandigarh mayor election न्यायपालिका ही प्रजातंत्र की सही संरक्षक...!
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न्यायपालिका ही प्रजातंत्र की सही संरक्षक…!

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भोपाल। भारतीय प्रजातंत्र की हम सतहत्तरवीं वर्ष ग्रंथी मना रहे है, इस लम्बी अवधि के दौरान वैसे तो प्रजातंत्र के चारों स्तंभों न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और खबरपालिका की अपनी-अपनी भूमिकाएं रही, किंतु चूंकि खबरपालिका इन भूमिकाओं की विश्लेषक भी रही, इसलिए शेष तीन अंग कार्यपालिका, विधायिका व न्यायपालिका इसे अपना अंग मानने को आज भी सहमत नहीं है, इसलिए प्रजातंत्र के मूल्यांकन के वक्त खबरपालिका को छोड़ शेष तीनों अंगों का ही महत्व प्रतिपादित किया जाता है।

अब यह एक काफी लम्बे विवाद का विषय है कि आजादी के बाद से अब तक के कार्यकाल में प्रजातंत्र की मजबूती में कौन से अंग की भूमिका सबसे अधिक प्रभावी व महत्वपूर्ण रही, इस बात का अब तक कई स्तरों पर मूल्यांकन हुआ और हर मूल्यांकन में न्यायपालिका ने ही बाजी मारी, क्योंकि बाकी दो अंगों कार्यपालिका व विधायिका के बारे में माना गया कि इनमें समय के अनुसार बदलाव आते गए और इनमें भ्रष्टाचार की दीमक ने प्रवेश कर लिया, जो दिनों-दिन प्रजातंत्र के दोनों महत्वपूर्ण अंगों कार्यपालिका व विधायिका को खोखली करती जा रही है और आज स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि इन दोनों अंगों का अपना कोई नियम-कानून या सिद्धांत ही शेष नहीं बचा, इसीलिए आज हर कहीं लूटमार का नजारा देखने को मिल रहा है।

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जहां तक तीसरें अंग न्यायपालिका का सवाल है, इसने अपनी अस्मिता अभी भी कायम रखी है और देश ही नहीं यह पूरे राष्ट्र व जनता के हितों का संरक्षण करने लगी है, इसीलिए मौजूदा हालातों में इसी अंग को प्रजातंत्र के सही संरक्षक की नजरों से देखा जाता रहा है और अब तो यही सिद्ध भी करने में जुटी है, जिसका ताजा उदाहरण चंडीगढ़ में महापौर के चुनाव का ताजा घटनाक्रम है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के सीधा हस्तक्षेप कर महापौर चुनाव के पक्षपाती फैसले को बदल कर एक नई मिसाल पेश की।

चंडीगढ़ का यह चुनाव वैसे तो शुद्ध रूप से स्थानीय स्तर का चुनाव था, किंतु इसके घोषित परिणाम को रद्द कर जो सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला दिया, वह अपने आपमें अब तक की बड़ी मिसाल है, इस चुनाव का पीठासीन अधिकारी स्वयं भाजपा का एक वरिष्ठ पदाधिकारी था, इसलिए उसने मतपत्रों के निरस्तीकरण और उनमें हेराफैरी करके भाजपा प्रत्याशी को विजयी घोषित कर दिया था, जबकि पीठासीन अधिकारी द्वारा निरस्त किए गए मत निरस्ती योग्य नही थे।

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तब सुप्रीम कोर्ट ने अपनी दबंगई कानूनों का प्रयोग करते हुए इसमें सीधा हस्तक्षेप किया और स्वयं ने वोटों की फिर से गिनती करवाकर सही रूप से विजयी आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी को महापौर के रूप में घोषणा की, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव के नियमों का हवाला देते हुए उसमें की गई अनियमितताओं का भी उल्लेख किया और पीठासीन अधिकारी द्वारा अमान्य आठ मतों को मान्य कर संशोधित परिणाम घोषित कर दिया सर्वोच्च न्यायालय का यह कदम अब तक के भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण कदम बन गया, जो इसके इतिहास में दर्ज हो गया।

चंडीगढ़ की इस छोटी सी घटना ने देश के प्रजातंत्री इतिहास में सर्वोच्च न्यायालय की अहम् भूमिका पुनः एक बार दर्ज करा दी। इस तरह पुनः एक बार देश को यह विश्वास हो गया कि इस देश में प्रजातंत्र की मुख्य संरक्षक न्यायपालिका ही है, जो हर अंग को अपने सही रास्ते पर लाने में सक्षम है।

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