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पश्चिम में न दम, न शर्म!

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इजराइल जिद पर अड़ा हुआ है और बैंजामिन नेतन्याहू की बेरहमी कायम है। इजराइल की सेना के हाथों अब करीब 30,000 फिलिस्तीनी अपनी जान गंवा चुके हैं। समुद्र से घिरे गाजा इलाके में मरने वालों में से दो-तिहाई से अधिक महिलाएं और बच्चे हैं। हजारों अन्य मलबे में दफन हैं। इजराइल-हमास युद्ध शुरू होने के बाद से 88 पत्रकारों की मौत हो चुकी है। गाजा के कत्लेआम का सीधा प्रसारण टेलिविजनों और मोबाईलों पर हो रहा है बावजूद इसके दुनिया के सारे नेता बेबस हैं। पश्चिमी देश – जो अपने आप को वैश्विक मूल्यों के हिमायती बताते हैं और कायदे-कानून के मुताबिक शासन चलाने की वकालत करते हैं  –  गाजा युद्ध को रूकवाने में नाकाम रहे हैं। नेतन्याहू को रोक पाने में उनकी नाकामयाबी से साफ़ है कि पश्चिम और उसके नेताओं का दबदबा और ताकत घटती हुई है।

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विदेशी मामलों और सुरक्षा नीति के यूरोपीय संघ के प्रतिनिधि जोसेफ बोरेल ने कुछ महीने पहले माना था कि गाजा का हाल का घटनाक्रम “अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नैतिक और राजनीतिक असफलता का नतीजा है”।उन्होंने कहा था कि कई दशकों से करीब-करीब पूरी दुनिया दो देश बनाकर इस समस्या का हल निकलने की बात करती आ रही है। लेकिन सिर्फ बातें हुईं। समस्या को हल करने के लिए कोई कोशिश नहीं की गयी।

बोरेल और कई अन्यों के मुताबिक इस स्थिति के लिए अमेरिका काफी हद तक जिम्मेदार है। लम्बे समय तक अमरीका के राष्ट्रपतियों की नीति रही है “नरमी से बात करो और हाथ में एक मोटा डंडा रखो”।इसके उलट, इस बार जो बाईडन ने बात सख्ती से की लेकिन उनके हाथों में डंडा नहीं था। अमेरिका एक अस्थायी युद्धविराम चाहता है जिसके दौरान इजराइली बंधकों की रिहाई हो और गाजा तक पर्याप्त सहायता सामग्री पहुँच जाए। लेकिन यह बाईडन प्रशासन की नाकाबिलियत या शायद कायरता है कि वह नेतन्याहू और उनके अति-दक्षिणपंथी सहयोगियों की रजामंदी में नाकाम है। पिछले हफ्ते बैंजामिन नेतन्याहू ने काहिरा में युद्धविराम और बंधकों की रिहाई के सम्बन्ध में समझौता वार्ताओं से अपने प्रतिनिधिमंडल को वापस बुलवा लिया। इससे देश में बंधकों के परिवारों में गुस्सा बढ़ा और और इजराइल के दोस्त देशों की चिंता बढ़ी। खबरों के मुताबिक नेतन्याहू अपने मंत्रिमंडल के अतिवादी सदस्यों की इस धमकी के आगे झुक गए है कि यदि उन्होंने उतावलेपन में हमास के साथ कोई समझौता किया तो उन्हें अपने पद से हाथ धोना पड़ेगा।

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इजराइल के केबिनेट में बेजलेल सिमोट्रिक और इतमार बेन-गिविर साम्प्रदायिक उग्रपंथी हैं और ये कब्जे वाले पश्चिमी किनारे में बनी अवैध बस्तियों में रहते हैं। वे जो चाहे बोलते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उनका कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। वे अपने मतदाताओं के बीच लोकप्रिय हैं।लगता है ये दोनों भी (पुतिन की तरह) डोनाल्ड ट्रंप के दुबारा सत्ता में आने का इंतजार कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके लिए भी ट्रम्प शायद बेहतर राष्ट्रपति होंगे? या शायद वे ट्रंप की मदद से गाजा में दुबारा बसने की उम्मीद कर रहे हैं। उनके दिमाग में क्या चल रहा है, यह कोई नहीं जानता।

लेकिन एक बात पक्की है – इजराइल और पश्चिम को कत्लेआम का कोई नतीजा नहीं भुगतना पड़ रहा है। इजराइल की अंदरूनी राजनीति और अमेरिका व अन्य पश्चिमी देशों के ढीले-ढाले रवैये को देखते हुए ऐसा लगता है कि युद्ध विराम नहीं हो सकेगा। लड़ाई जारी रहेगी।

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सवाल है क्या व्लादिमीर पुतिन, बेंजामिन नेतन्याहू और जो बाईडन में ज़रा सा भी फर्क है?

दरअसल पश्चिमी देशों में चारों तरफ पाखंड का बोलबाला है। पश्चिम इजराइल से कड़क कर बात नहीं कर रहा है। शर्मनाक है जो पश्चिम कह रहा हैं कि इजराइल जो कर रहा है, वह, दरअसल आत्मरक्षा है। यह भी कि हमास के 7 अक्टूबर के भयावह हमले का यह नतीजा होना ही था। कौन कहता है कि इजराइल को अपने नागरिकों की जान लेने वालों से बदला लेना का हक़ नहीं है? बिलकुल है। मगर लगातार, बिना रुके, निर्दोष नागरिकों, औरतों और बच्चों को मारते जाना भला कैसे सही ठहराया जा सकता है? इजराइल और उसके अत्याचारों पर चुप्पी साधे पश्चिम को देखकर शायद बड़े से बड़ा पाखंडी भी शर्मसार होगा। (कॉपी: अमरीश हरदेनिया)

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By श्रुति व्यास

संवाददाता/स्तंभकार/ संपादक नया इंडिया में संवाददता और स्तंभकार। प्रबंध संपादक- www.nayaindia.com राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समसामयिक विषयों पर रिपोर्टिंग और कॉलम लेखन। स्कॉटलेंड की सेंट एंड्रियूज विश्वविधालय में इंटरनेशनल रिलेशन व मेनेजमेंट के अध्ययन के साथ बीबीसी, दिल्ली आदि में वर्क अनुभव ले पत्रकारिता और भारत की राजनीति की राजनीति में दिलचस्पी से समसामयिक विषयों पर लिखना शुरू किया। लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों की ग्राउंड रिपोर्टिंग, यूट्यूब तथा सोशल मीडिया के साथ अंग्रेजी वेबसाइट दिप्रिंट, रिडिफ आदि में लेखन योगदान। लिखने का पसंदीदा विषय लोकसभा-विधानसभा चुनावों को कवर करते हुए लोगों के मूड़, उनमें चरचे-चरखे और जमीनी हकीकत को समझना-बूझना।

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