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सबको शिक्षा से ही समानता संभव

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वैदिक मत के अनुसार मनुष्य एक मनुष्य होने के नाते समान अधिकार और कर्तव्य का उत्तरदायी है। वेद मनुष्यों को पारस्परिक व्यवहार और सम्बन्ध समानता के आधार पर स्थापित करने का उपदेश देता है। वैदिक मत में सभी मनुष्यों को शिक्षा का अधिकार दिया गया है तथा समानता से कर्तव्य पालन करने की भी प्रेरणा की गई है। आचार्य शिष्य को अपने समान बनाने की इच्छा रखता है, पति-पत्नी परस्पर एक दूसरे को समान मानने की प्रतिज्ञा करते हैं।

दैनन्दिन जीवन में मनुष्य का पाला जड़ और चेतन दोनों ही वस्तुओं से पड़ता है। जड़ वस्तुओं से व्यवहार करते समय मनुष्य उसे जैसा चाहता है, वैसा व्यवहार कर सकता है। वह उसे तोड़ना, जोड़ना, फेंकना, पास रखना चाहता है, तो उसे क्रमशः तोड़, जोड़, फेंक, पास रख सकता है। जड़ वस्तुओं को इसमें कोई आपति  नहीं होती, क्योंकि वह अपने स्वभाव में किसी भी तरह का बदलाव स्वयं नही कर सकती हैं। इसलिए जड़ वस्तुओं के साथ मनुष्य का व्यवहार उसकी इच्छानुसार होता है, मनुष्य की अपनी मर्जी से होता है। जड़ वस्तु की इसमें कोई मर्जी कार्य नहीं करती, लेकिन चेतन वस्तुओं के साथ ऐसी बात नहीं होती। चेतन पदार्थों से मनुष्य सर्वथा अपनी इच्छानुकूल व्यवहार नहीं कर सकता। चेतन में पशु- पक्षी आदि प्राणियों के साथ मनुष्य अपना व्यवहार बलपूर्वक करता है। अपनी इच्छानुसार करता है। यद्यपि प्राणियों में चेतन पदार्थों में इच्छा होती है, उन्हें अच्छा -बुरा लगता है, तथापि मनुष्य अपनी इच्छा उन पर थोपता है। उन्हें अपनाता, दूर करता, प्रेम करता, हिंसा करता है। इन कार्यों में अपनी इच्छा को ही ऊपर रखता है। दूसरे प्राणी प्रतिकार करते हैं, प्रतिक्रिया करते हैं, परन्तु अपने सामर्थ्य के अनुकूल ही इसमें वे सफल हो सकते हैं।

अधिकांशतया मनुष्य ही अपने बल से उनको अपने वश में करने का प्रयास करता है, और इसमें वह सफल भी रहता है। लेकिन मनुष्य का दूसरे मनुष्य के साथ इस प्रकार व्यवहार करना संभव नहीं होता। वह इसमें सफल भी हो सकता है, और सफल नहीं भी हो सकता है। मनुष्य अज्ञानी, दुर्बल, निर्धन भी हो सकता है, इसके विपरीत ज्ञानवान, सबल और साधन सम्पन्न भी हो सकता है। इस कारण मनुष्यों का एक दूसरे के साथ परस्पर व्यवहार किसी एक प्रकार अथवा एक नियम से संचालित होने वाला नहीं होता। दुर्बल अथवा निर्धन व्यक्ति को सबल और साधन सम्पन्न व्यक्ति अपने साधनों से अपने अनुकूल करने का प्रयास करता है, परन्तु जो समझदार, ज्ञानवान व्यक्तियों को वश में करने के लिए ऐसे उपाय निरर्थक हो जाते हैं। ज्ञान से युक्त ज्ञानवान व्यक्ति को अपने अनुकूल बनाने के लिए मनुष्य को अन्य उपाय काम में लाना पड़ता है। मनुष्य किसी को अपने हित के लिए उपयोग करना चाहता है, अपने स्वार्थ साधन हेतु उन्हें काम में लेना चाहता है, तो वह उनको बहकाता है, भडक़ाता है और अपना स्वार्थ सिद्ध करता है। लेकिन बुद्धिशील मनुष्य अपनी बुद्धि और अपने ज्ञान से दूसरे को जन कल्याणार्थ अपने साथ चलने के लिए सहमत कर लेने की नीति अपनाता है। वह दूसरे मनुष्यों को समझाकर, प्रेरित कर अपने अनुकूल बनाता है।

यह परिस्थिति मनुष्य की सबसे ऊँची स्थिति होती है, जब वह अपनी बुद्धि और अपने ज्ञान से दूसरे को अपने साथ चलने के लिए सहमत कर लेता है। इसमें किसी का स्वार्थ नहीं होता। इसमें सबका हित सबका लाभ मुख्य उद्देश्य होता है। यह उपाय सर्वोत्तम माना जाता है, लेकिन इसका मार्ग सर्वाधिक कठिन भी है। जड़ वस्तु मनुष्य की इच्छा के विरुद्ध नहीं चल सकती। पशु-पक्षी मनुष्य के बल से उसके बन्धन में पड़े रह सकते हैं, परन्तु मनुष्य ज्ञानवान अथवा साधन – सम्पन्न होकर दूसरे मनुष्य के विरुद्ध चला जाता है। इसलिए वह एक कम बुद्धि और कम सामर्थ्यवान व्यक्ति को अपने अधीन रखने का प्रयास करता है। और अपने अधीन कर वह हमेशा इस पर ध्यान रखता है कि उसके अधीन कार्यरत व्यक्ति उससे आगे न बढ़ जाय। इसके लिए वह यह प्रयास भी करता रहता है कि उसके अपने अधीन कार्यरत व्यक्ति उससे कमतर ही बना रहे। मनुष्य की इसी भावना ने समाज में कुछ वर्गों को कमजोर बनाकर रखा है। वर्तमान काल में कुछ समाज में स्त्री और निम्न समझे जाने वाले कुछ वर्गों की वर्तमान स्थिति भी इसी भावना का परिणाम है। जो लोग सबको ज्ञान का अधिकारी नहीं मानते, वे दूसरे पक्ष के ज्ञानवान होने से डरते हैं। क्योंकि शिक्षित, समर्थ और स्वावालम्बी मनुष्य को अधीन बनाकर रखना संभव नहीं है।

इसलिए वर्तमान में समाज के समर्थ लोगों ने वैदिक मत के विरुद्ध स्त्री और शूद्र कहकर कमजोर लोगों को कमजोर बनाये रखने की व्यवस्था की। और अपनी इच्छा को धर्म, समाज और शासन का नाम देकर कमजोर वर्ग को मानने, स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। पर्दा प्रथा, अशिक्षा, स्वतन्त्रता का अभाव आदि आज जितने भी एक तरफा बन्धन है, अथवा उन पर लादे गये हैं, यह सब दूसरे पक्ष की अज्ञानता और दुर्बलता के कारण ही संभव है। यह नृशंसता धर्म, सिद्धान्त और समाजिक व्यवस्था के नाम पर की गई और आज भी जारी है। आज भी विश्व के कई देशों में रहने वाले कुछ मजहबी लोग महिलाओं को शिक्षा से वंचित कर बुर्के में रहने के लिए बाध्य कर रहे हैं। कोई अंग वस्त्र से बाहर दिखने पर उसे काट देने की सजा खुलेआम जारी है। यह नृशंसता, यह अमानुषिक कर्म धर्म, सिद्धान्त और समाजिक व्यवस्था के नाम पर अनवरत जारी है,जो दूसरे पक्ष की अज्ञानता और दुर्बलता के कारण संभव है।

वैदिक मत के अनुसार मनुष्य एक मनुष्य होने के नाते समान अधिकार और कर्तव्य का उत्तरदायी है। वेद मनुष्यों को पारस्परिक व्यवहार और सम्बन्ध समानता के आधार पर स्थापित करने का उपदेश देता है। वैदिक मत में सभी मनुष्यों को शिक्षा का अधिकार दिया गया है तथा समानता से कर्तव्य पालन करने की भी प्रेरणा की गई है। आचार्य शिष्य को अपने समान बनाने की इच्छा रखता है, पति-पत्नी परस्पर एक दूसरे को समान मानने की प्रतिज्ञा करते हैं। विवाह संस्कार में वर-वधू एक-दूसरे के हृदय पर हाथ रखकर प्रतिज्ञा करते हैं- हम परस्पर एक दूसरे के व्रतों, कार्यों कर्तव्यों का बोध करेंगे। उनके पालन में सहयोगी बनेंगे। ऐसा करने के लिए परस्पर संवाद बनाकर रखेंगे। एक दूसरे की बात को ध्यान से सुनेंगे, गम्भीरता से लेंगे। इसके पालन में ईश्वर से सहायता की याचना करेंगे। उपनयन व वेदारम्भ संस्कार में आचार्य शिष्य से कमोबेश इन्हीं शब्दों में संकल्प लेने को कहते हैं। वैवाहिक सप्तपदी में भी स्त्री व पुरुष दोनों ही यह कामना करते हैं कि हम गृहस्थ जीवन में सखा अर्थात मित्र बनकर रहेंगे। किसी को भी अपने बड़े होने का भान कराना नहीं पड़ेगा। अर्थात पति- पत्नी दोनों ही एक दूसरे को अपने से बड़ा मानने की पहल करेंगे। ऐसा दोनों के शिक्षित और समझदार होने पर ही संभव है। इस वैदिक उपदेश में किसी को बलपूर्वक अपनी बात मनवाने का प्रयास नहीं है, अपितु बात के औचित्य को समझकर उस बात को स्वीकार करने और सहमत होने का प्रयास है। इसके लिए दोनों पक्षों को समझदार और शिष्ट होना आवश्यक है। समानता के अधिकार को वेदों में सर्वत्र सराहा गया है।

वैदिक मत में शिक्षा के अवसर की समानता का उपदेश दिया गया है, ताकि समाज के सभी वर्ग के सभी स्त्री- पुरुष समान शिक्षा के द्वारा अपनी स्थिति सुधार सकें। अर्थात शूद्र के रूप में जन्म लेकर शिक्षा और ज्ञान के बल पर द्विजत्व में ब्राह्मणत्व, क्षत्रियत्व, वैश्यत्व अथवा शूद्रत्व को प्राप्त कर सकें। कई विद्वानों के राय के अनुसार समाज में सबको शिक्षा देने की व्यवस्था स्वरूप प्राचीन भारत में पाँच लाख से अधिक ग्रामों में गुरुकुल संचालित थे, जिसमें सभी वर्ग के बालक- बालिकाओं को समस्त विद्याओं की शिक्षा दी जाती थी। परन्तु कालांतर में इस व्यवस्था में व्यवधान आया और मुगल काल में इस पर अनेकविध रूप से बाधा उत्पन्न करने की कोशिश की गई।

ब्रिटिश काल में तो इस वैदिक शिक्षा पद्धति को कानूनन रूप से जड़ से ही समाप्त कर आंग्ल शिक्षा नीति का मैकाले स्वरूप लागू कर दिया गया। जिसके कारण वेद विरोधी विधर्मी, विदेशी तत्वों को शिक्षा के अवसर से लोगों को वंचित करने का मौका मिला। और आज यह स्थिति है कि कई देशों के कुछ समाजों में पर्दा, अशिक्षा, स्वतन्त्रता का अभाव दिखाई देता है, जो धर्म, सिद्धान्त और समाजिक व्यवस्था के नाम पर विगत कुछ सदियों से निरंतर जारी है। यह दूसरे पक्ष की अज्ञानता और दुर्बलता के कारण ही संभव हो रहा है, जिसका समाधान सबको समान शिक्षा का अवसर प्रदान कर ही किया जा सकता है।

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By अशोक 'प्रवृद्ध'

सनातन धर्मं और वैद-पुराण ग्रंथों के गंभीर अध्ययनकर्ता और लेखक। धर्मं-कर्म, तीज-त्यौहार, लोकपरंपराओं पर लिखने की धुन में नया इंडिया में लगातार बहुत लेखन।

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