आज संयुक्त राष्ट्र 1 जून को वैश्विक अभिभावक दिवस के रूप में मनाता है। इसका उद्देश्य परिवारों के विघटन, वृद्धों के अकेलेपन, बढ़ते वृद्धाश्रमों और उपभोक्तावादी जीवनशैली के दुष्प्रभावों की ओर ध्यान आकर्षित करना है। पश्चिमी समाज जहाँ अधिकारों की बात अधिक करता है, वहीं भारतीय संस्कृति कर्तव्य और ऋण की भावना को महत्व देती है।
1 जून -वैश्विक अभिभावक दिवस
हर वर्ष 1 जून को मनाया जाने वाला वैश्विक अभिभावक दिवस केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह उस सनातन भारतीय सोच की याद दिलाता है, जिसमें माता-पिता को जीवन का आधार और प्रत्यक्ष देवता माना गया है। आधुनिक पश्चिमी समाज में संबंध अक्सर अधिकारों और कर्तव्यों तक सीमित रह जाते हैं, जबकि भारतीय परंपरा में माता-पिता का स्थान अत्यंत ऊँचा है। उन्हें केवल जन्म देने वाला नहीं, बल्कि संस्कार देने वाला और ईश्वर का प्रत्यक्ष स्वरूप माना गया है। वैदिक साहित्य में जिस चेतना को प्रकृति के कण-कण में देखा गया है, उसका सबसे निकट रूप माता-पिता हैं। वेदों में आकाश को पिता और पृथ्वी को माता कहा गया है। इसी दृष्टि से पूरे संसार को एक परिवार, अर्थात् वसुधैव कुटुम्बकम् माना गया है।
ऋग्वेद में मातृत्व और पितृत्व के संबंध में अनेक उल्लेख मिलते हैं। ऋग्वेद के प्रथम मंडल में कहा गया है—
द्यौर्मे पिता जनिता नाभिरत्र बन्धुर्मे माता पृथिवी महीयम्।
— ऋग्वेद 1/164/33
अर्थात् आकाश मेरे जन्मदाता पिता हैं और यह विशाल पृथ्वी मेरी माता है।
वैदिक ऋषि इस रूपक के माध्यम से बताते हैं कि जैसे आकाश सबको आश्रय और विस्तार देता है, वैसे ही पिता अपनी संतान को सुरक्षा और अवसर देता है। जैसे पृथ्वी अपने गर्भ में बीजों को धारण कर उनका पालन-पोषण करती है, उसी प्रकार माता वात्सल्य और संरक्षण का स्वरूप है। अथर्ववेद का संमनस्य सूक्त परिवार में प्रेम, एकता और समरसता का अद्भुत संदेश देता है। वैश्विक अभिभावक दिवस की भावना इस सूक्त के बिना अधूरी है—
अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः।
— अथर्ववेद 3/30/2
अर्थात् पुत्र पिता के सद्गुणों और आदर्शों का अनुसरण करे तथा माता के साथ मन और विचारों की एकता रखे। यहाँ संमनाः शब्द केवल आज्ञा मानने का संकेत नहीं है, बल्कि माता और संतान के बीच गहरे भावनात्मक और वैचारिक जुड़ाव का प्रतीक है।
उपनिषदों के समय तक भारतीय चिंतन कर्मकांड से आगे बढ़कर आत्मज्ञान की ओर अग्रसर हो चुका था। फिर भी माता-पिता का महत्व कम नहीं हुआ। ऋषियों को भली-भांति ज्ञात था कि मजबूत परिवार के बिना ऊँचे आध्यात्मिक आदर्शों तक पहुँचना कठिन है।
वैदिक शिक्षा पूरी होने पर जब गुरु अपने शिष्य को जीवन के लिए अंतिम उपदेश देते थे, तब उनका पहला संदेश ही परिवार और समाज के प्रति कर्तव्य का होता था। तैत्तिरीयोपनिषद में कहा गया है—
मातृदेवो भव। पितृदेवो भव।
— तैत्तिरीयोपनिषद 1/11/1
अर्थात् माता को देवता समझो, पिता को देवता समझो।
यह केवल आदेश नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि है। उपनिषद का संदेश है कि ईश्वर भले दिखाई न दे, लेकिन माता-पिता प्रत्यक्ष देवता हैं। उनकी उपेक्षा करके की गई कोई भी पूजा पूर्ण नहीं मानी जा सकती।
बृहदारण्यक उपनिषद और गृह्यसूत्रों में यह विचार मिलता है कि माता-पिता केवल शरीर नहीं देते, बल्कि पीढ़ियों से संचित ज्ञान, अनुभव और संस्कार भी अपनी संतान को सौंपते हैं। इसलिए माता को सृजनकर्ता और पिता को रक्षक कहा गया है।
पुराणों ने वेदों के गूढ़ विचारों को कथाओं के माध्यम से आम लोगों तक पहुँचाया। माता-पिता के महत्व को समझाने के लिए अनेक प्रेरक प्रसंग दिए गए। शिवपुराण और गणेशपुराण में वर्णित एक प्रसिद्ध कथा इसका सुंदर उदाहरण है।
जब कार्तिकेय और गणेश के बीच पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा करने की प्रतियोगिता हुई, तब कार्तिकेय अपने मयूर पर बैठकर संसार की यात्रा पर निकल पड़े। दूसरी ओर गणेशजी ने माता पार्वती और भगवान शिव को एक स्थान पर बैठाया और उनकी सात बार परिक्रमा कर ली।
जब उनसे इसका कारण पूछा गया, तो उन्होंने कहा—
मातापितृमयी पूजा सर्वपूजातिरिच्यते। पृथिव्याः प्रदक्षिणायास्तु फलं भवति निश्चितम्।।
अर्थात् माता-पिता की पूजा सभी पूजाओं से श्रेष्ठ है। उनके चरणों में ही पूरा संसार समाया हुआ है।
इस कथा का संदेश स्पष्ट है कि यदि कोई व्यक्ति दुनिया भर की उपलब्धियाँ प्राप्त कर ले, लेकिन अपने माता-पिता के प्रति सम्मान और सेवा का भाव न रखे, तो उसकी सफलता अधूरी है।
वाल्मीकि रामायण में श्रीराम का जीवन भी माता-पिता के प्रति कर्तव्य का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत करता है। अयोध्याकाण्ड में श्रीराम कहते हैं—
नास्ति धर्मो महत्तरः पितृशुश्रूषणात् परः। तस्मात् पितरमाज्ञाप्य वनं गन्तुं मतिर्मम।।
अर्थात् माता-पिता की सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं है। इसलिए मैं पिता की आज्ञा का पालन करते हुए वन जाने का निर्णय करता हूँ।
श्रीराम ने राज्य का त्याग केवल पिता के वचन की रक्षा के लिए नहीं किया, बल्कि यह दिखाने के लिए भी किया कि माता-पिता के प्रति कर्तव्य भौतिक सुख-संपत्ति से कहीं अधिक मूल्यवान है।
भारतीय धर्मशास्त्रों और स्मृतियों ने भी माता-पिता के प्रति कर्तव्य को विशेष महत्व दिया है। मनुस्मृति में महर्षि मनु लिखते हैं—
यं मातापितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम्।
न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि।।
— मनुस्मृति 2/227
अर्थात् माता-पिता संतान के पालन-पोषण में जो कष्ट सहते हैं, उसका ऋण सौ वर्षों तक सेवा करने पर भी नहीं चुकाया जा सकता।
मनु आगे कहते हैं—
तेषामेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते।
— मनुस्मृति 2/229
अर्थात् माता, पिता और आचार्य के प्रसन्न होने पर मनुष्य के सभी तप और व्रत सफल हो जाते हैं।
महाभारत के वनपर्व में यक्ष और युधिष्ठिर के संवाद में भी माता-पिता की महिमा का वर्णन मिलता है। युधिष्ठिर कहते हैं—
माता गुरुतरा भूमेः खात् पितोच्चतरस्तथा।
— महाभारत, वनपर्व 313/60
अर्थात् माता पृथ्वी से भी अधिक महान हैं और पिता आकाश से भी अधिक ऊँचे हैं।
यह तुलना बताती है कि माता का प्रेम पृथ्वी की तरह धैर्यवान और जीवनदायी है, जबकि पिता का संरक्षण आकाश की तरह व्यापक और असीम है।
आज संयुक्त राष्ट्र 1 जून को वैश्विक अभिभावक दिवस के रूप में मनाता है। इसका उद्देश्य परिवारों के विघटन, वृद्धों के अकेलेपन, बढ़ते वृद्धाश्रमों और उपभोक्तावादी जीवनशैली के दुष्प्रभावों की ओर ध्यान आकर्षित करना है। पश्चिमी समाज जहाँ अधिकारों की बात अधिक करता है, वहीं भारतीय संस्कृति कर्तव्य और ऋण की भावना को महत्व देती है।
आज की भौतिकवादी दौड़ में अनेक युवा अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। करियर और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर वृद्ध माता-पिता को अकेला छोड़ देने की प्रवृत्ति दुनिया भर में बढ़ रही है। ऐसे समय में कौटिल्य के अर्थशास्त्र की वह व्यवस्था याद आती है, जिसमें वृद्ध माता-पिता का पालन-पोषण न करने वाले को दंड का पात्र माना गया था।
श्रीमद्भागवत महापुराण में भी कहा गया है—
जीवन्मृतोऽसौ पुरुषो यः पुष्ट्या बिभर्ति न।
अर्थात् जो व्यक्ति समर्थ होते हुए भी अपने वृद्ध माता-पिता, पत्नी और बच्चों का पालन-पोषण नहीं करता, वह जीवित होकर भी मृतक के समान है।
वैश्विक अभिभावक दिवस का महत्व केवल शुभकामना संदेश भेजने या सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करने में नहीं है। इसकी वास्तविक सार्थकता उस भारतीय दृष्टि को अपनाने में है, जो माता-पिता की प्रसन्नता में ही ईश्वर की प्रसन्नता देखती है।
महाकवि कालिदास ने रघुवंश के मंगलाचरण में लिखा है—
वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ।।
अर्थात् जैसे शब्द और अर्थ एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते, वैसे ही माता और पिता जीवन के आधार हैं।
वैश्विक अभिभावक दिवस के अवसर पर संसार को भारत की इस सनातन सीख को समझना चाहिए कि माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा तीर्थ है, उनका संतोष ही सबसे बड़ा सुख है और उनके आशीर्वाद से ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का वास्तविक उत्थान संभव होता है।


