रामचरितमानस में प्रयुक्त चौपाई, दोहा, सोरठा और हरिगीतिका छन्दों का क्रम केवल काव्यात्मक नहीं, अपितु मनोवैज्ञानिक है। प्रत्येक काण्ड का प्रारम्भ संस्कृत श्लोकों (मंगलाचरण) से होता है, जो ग्रन्थ की शास्त्रीय गम्भीरता को अक्षुण्ण रखता है। विनय पत्रिका के पद राग-रागिनियों, जैसे राग बिलावल, राग केदारा, राग भैरवी में निबद्ध हैं, जो तुलसी के गन्धर्व विद्या के अगाध ज्ञान को प्रमाणित करते हैं।
9 अगस्त -गोस्वामी तुलसीदास जयंती
भारतीय वांग्मय के दैदीप्यमान नक्षत्र, जनमानस के शाश्वत मार्गदर्शक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के संवाहक गोस्वामी तुलसीदास की जयंती मात्र एक तिथि का स्मरण नहीं, अपितु लोक चेतना के चरमोत्कर्ष का उत्सव है। मध्यकालीन भारत में जब राजनीतिक पराधीनता, सांस्कृतिक विघटन और सामाजिक संकीर्णता चरम पर थीं, तब तुलसीदास का प्राकट्य एक ऐतिहासिक अनिवार्यता के रूप में हुआ। उन्होंने वैदिक वांग्मय के गूढ़ दार्शनिक सत्यों को लोकभाषा की सरिता में प्रवाहित कर जन-जन तक पहुंचाया। रामकथा का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना कि स्वयं भारतवर्ष की संस्कृति। आधुनिक इतिहासकार जहां इसे मिथक सिद्ध करने का कुप्रयास करते हैं, वहीं सनातन ग्रन्थ और ऐतिहासिक साक्ष्य इसकी अकाट्य ऐतिहासिकता को पुष्ट करते हैं।
वैदिक विद्वानों के अनुसार वेद में किसी व्यक्ति, स्थान व किसी अन्य वस्तु का इतिहास नहीं है, लेकिन कतिपय विद्वानों के अनुसार रामकथा के सूत्र ऋग्वेद में भी अंतर्निहित हैं। ऐसे विद्वानों के अनुसार ऋग्वेद के दशम मण्डल में राम नाम का उल्लेख एक प्रतापी शासक के रूप में मिलता है। शतपथ ब्राह्मण और ऐतरेय ब्राह्मण जैसे प्राचीन ग्रन्थों में इक्ष्वाकु वंश और उनके राजाओं की वंशावली का विवरण प्राप्त होता है। रामतापिन्युपनिषद और रामोपनिषद में श्रीराम के ब्रह्मत्व और उनके ऐतिहासिक स्वरूप का दार्शनिक विवेचन है। यह प्रमाणित करता है कि वाल्मीकि रामायण से पूर्व भी रामकथा की वैचारिक पृष्ठभूमि विद्यमान थी। महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण रामकथा का मूलाधार और प्रथम ऐतिहासिक ग्रन्थ है। वाल्मीकि श्रीराम के समकालीन थे, अतः उनका विवरण एक प्रत्यक्षदर्शी का विवरण है। वाल्मीकि रामायण में वर्णित ग्रह-नक्षत्रों की स्थितियां, जैसे श्रीराम के जन्म के समय पांच ग्रहों का उच्च स्थान पर होना, आधुनिक प्लेनेटेरियम सॉफ्टवेयर द्वारा गणना करने पर 7000 वर्ष ईसा पूर्व की सटीक तिथियों को दर्शाती हैं। अयोध्या से लेकर लंका तक महर्षि वाल्मीकि द्वारा वर्णित नदियां, पर्वत और वनों के नाम आज भी भूवैज्ञानिक रूप से अक्षुण्ण हैं। यह किसी काल्पनिक आख्यान में संभव नहीं है।
गोस्वामी तुलसीदास के अवतरण काल (सोलहवीं शताब्दी) को समझे बिना उनकी महत्ता का आकलन असंभव है। उस युग में भारत विदेशी आक्रांताओं के दमन, मन्दिरों के ध्वंस और सांस्कृतिक हीनता ग्रंथि से ग्रस्त था। राजनीतिक पराधीनता, सांस्कृतिक दमन, सामाजिक विघटन, जाति-भेद, संकीर्णता का शिकार था। तुलसी के पूर्व कबीर और अन्य निर्गुण संतों ने बाह्याडंबरों पर प्रहार तो किया, किन्तु वे साधारण जनता को एक सुदृढ़ दार्शनिक आलम्बन देने में पूर्णतः सफल नहीं रहे। समाज सगुण-निर्गुण, शैव-वैष्णव और ज्ञान-भक्ति के विवादों में उलझा हुआ था। गोस्वामी जी ने देखा कि शुष्क ज्ञानमार्गी दर्शन जनसाधारण के हृदय को तृप्त नहीं कर पा रहा था। जनता को एक ऐसे आदर्श नायक की आवश्यकता थी, जो मर्यादा पुरुषोत्तम हो, जिसका चरित्र अनुकरणीय हो और जो धर्म की पुनर्स्थापना कर सके। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना करते समय केवल वाल्मीकि रामायण को ही आधार नहीं बनाया, अपितु उन्होंने स्वयं लिखा है- नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
इसका तात्पर्य है कि मानस विभिन्न पुराणों, वेदों, आगमों और पूर्ववर्ती रामकथाओं का नवनीत है।
वाल्मीकि के राम मुख्यतः मर्यादा पुरुषोत्तम मानव हैं, जो अपने कर्मों से देवत्व को प्राप्त होते हैं। इसके विपरीत तुलसी के राम अखिलेश हैं, साक्षात परब्रह्म हैं, जो लीला के लिए मानव रूप धारण करते हैं। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में सीता के निर्वासन की कथा है, जो अत्यंत कारुणिक और विवादास्पद रही है। गोस्वामी तुलसीदास ने लोक कल्याणकारी दृष्टिकोण अपनाते हुए मानस में अग्नि परीक्षा के समय ही वास्तविक सीता को अग्नि में अंतर्धान कर दिया और छाया सीता को लोक के सामने रखा, जिससे मर्यादा की रक्षा हो सके। तुलसीदास के दर्शन पर अध्यात्म रामायण का सर्वाधिक प्रभाव परिलक्षित होता है। अध्यात्म रामायण की भांति तुलसी ने भी अद्वैत वेदांत और विशिष्टाद्वैत का सुंदर समन्वय किया। ज्ञान और भक्ति को परस्पर विरोधी न मानकर, उन्होंने “भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा” कहकर दोनों में तादात्म्य स्थापित किया।
विश्व में तीन सौ से अधिक रामायण प्रचलित हैं। कम्ब रामायण (तमिल), कृत्तिवास रामायण (बंगाली), और भावार्थ रामायण (मराठी) अपने-अपने भाषाई क्षेत्रों में समादृत हैं। किन्तु तुलसीदास की विशेषता यह है कि उन्होंने उत्तर भारत की सम्पूर्ण सांस्कृतिक विविधता को अवधी और ब्रजभाषा के माध्यम से एक सूत्र में पिरो दिया। गोस्वामी जी केवल एक भक्त कवि नहीं थे, वे अपने युग के प्रखर दृष्टा और समाजशास्त्री भी थे। उनकी रचनाएं तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों का ऐतिहासिक साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं। कवितावली के उत्तरकाण्ड में तुलसीदास ने अपने समय के भीषण अकाल, दरिद्रता और बेरोजगारी का जो सजीव चित्र खींचा है, वह किसी भी समकालीन इतिहास ग्रन्थ, जैसे अबुल फजल की आईन-ए-अकबरी से अधिक प्रामाणिक प्रतीत होता है-
किसबी, किसानकुल, बनिक, भिखारी, भाट, चाकर, चपल नट, चोर, चार, चेटकी।
पेट को पढ़त, गुन गढ़त, चढ़त गिरि, अटत गहन-गन अहन अखेटकी।।
यह पंक्तियां स्पष्ट करती हैं कि समाज का प्रत्येक वर्ग उदर पूर्ति के लिए संघर्षरत था। इस आर्थिक और सामाजिक अवसाद से मुक्ति के लिए उन्होंने रामराज्य की परिकल्पना प्रस्तुत की।
तुलसीदास पर अक्सर संकीर्णतावादी होने का मिथ्या आरोप लगाया जाता है। किन्तु अनुसंधानात्मक दृष्टि से देखें तो वे सामाजिक समरसता के महानतम प्रयोक्ता थे। शबरी और केवट प्रसंग में श्रीराम द्वारा केवट को गले लगाना और शबरी के जूठे बेरों का सहर्ष भक्षण करना, तत्कालीन समाज में व्याप्त जातिवाद और अस्पृश्यता पर सबसे बड़ा प्रहार था। कोल-किरात मिलन प्रसंग में वनगमन के समय वनवासी जातियों (कोल, भील, किरात) के साथ श्रीराम का आत्मीय संबंध यह सिद्ध करता है कि तुलसीदास एक समतामूलक समाज के पक्षधर थे।
गोस्वामी जी का भाषा पर असाधारण अधिकार था। उन्होंने संस्कृत की तत्सम शब्दावली को लोकभाषा के विन्यास में इस प्रकार ढाला कि वह जनसाधारण के कण्ठ का हार बन गई। अवधी में लिखे रामचरितमानस, जानकी मंगल में लोकभाषा अवधि की लोकग्राह्यता झलकती है, तो ब्रज भाषा में विनय पत्रिका व कवितावली में काव्य सौंन्दर्य। दोनों ही अद्वितीय, अनुपम हैं। रामचरितमानस में प्रयुक्त चौपाई, दोहा, सोरठा और हरिगीतिका छन्दों का क्रम केवल काव्यात्मक नहीं, अपितु मनोवैज्ञानिक है। प्रत्येक काण्ड का प्रारम्भ संस्कृत श्लोकों (मंगलाचरण) से होता है, जो ग्रन्थ की शास्त्रीय गम्भीरता को अक्षुण्ण रखता है। विनय पत्रिका के पद राग-रागिनियों, जैसे राग बिलावल, राग केदारा, राग भैरवी में निबद्ध हैं, जो तुलसी के गन्धर्व विद्या के अगाध ज्ञान को प्रमाणित करते हैं।
तुलसीदास द्वारा प्रतिपादित रामराज्य की अवधारणा कोई काल्पनिक यूटोपिया नहीं है, बल्कि वह सुशासन का एक सार्वभौमिक मॉडल है। तुलसीदास के अनुसार रामराज्य के मूल स्तम्भ हैं-
दैहिक, दैविक, भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।
अर्थात- नागरिकों को शारीरिक, मानसिक और पर्यावरणीय व्याधियों से मुक्ति। यह आधुनिक लोक कल्याणकारी राज्य का मूल उद्देश्य है।
तुलसी कहते हैं-
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ बारा। नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना।
उनके अनुसार रामराज्य का अर्थ है- आर्थिक संपन्नता और सुदृढ़ स्वास्थ्य अवसंरचना का होना।
एक अन्य स्थान पर कहते हैं-
सब नर करहिं परस्पर प्रीति। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति।।
नागरिकों में परस्पर सौहार्द और अपने कर्तव्यों (कर्तव्य बोध) के प्रति निष्ठा।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जहां समाज नैतिक पतन, युद्धपरक विभीषिकाओं और मानसिक अवसाद से जूझ रहा है, वहां तुलसी का दर्शन एक संजीवनी के समान है। तुलसी केवल अतीत के कवि नहीं, अपितु भविष्य के दृष्टा हैं। उन्होंने रामकथा के ऐतिहासिक सत्य को दार्शनिक गरिमा प्रदान की और उसे लोक जीवन का स्पंदन बना दिया। उनके ग्रन्थों का संदेश है कि रूढ़ियों का त्याग कर, शाश्वत जीवन मूल्यों को अपनाकर ही एक सुदृढ़ और समरस राष्ट्र का निर्माण संभव है। तुलसी का वाङ्मय सत्य, शिव और सुन्दरम का ऐसा त्रिवेणी संगम है, जो मानवता को अनंत काल तक आलोकित करता रहेगा।
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