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दादी और नानी के बनाए स्वाद में बीमारियां नहीं थी

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हम तेज़ी से एक बीमार देश बनते जा रहे हैं। हम बीमारी को डाक्टरी इलाज से ठीक करने में लाखों रुपया गवां देते हैं लेकिन बीमारी के कारणों को समझ कर जड़ से खत्म करने की कवायद नहीं करते। जबकि सच्चाई यह है कि अगर हम अपने धर्मशास्त्रों के अनुसार अपने भोजन और दिनचर्या को संचालित करें तो आधुनिक जीवन की चकाचौंध के बीच भी हम पूरी तरह स्वस्थ रह सकते हैं।

आप भारत के किसी भी शहर या कस्बे में घूम कर देखिए तो सबसे ज़्यादा दुकानें अंग्रेज़ी दवाओं की मिलेंगी या पैथोलॉजी टेस्ट और एमआरआई आदि करने वाले सेंटर मिलेंगे या पचासों नर्सिंग होम व अस्पताल मिलेंगे। ज़ाहिर है कि हम तेज़ी से एक बीमार देश बनते जा रहे हैं। हम बीमारी को डाक्टरी इलाज से ठीक करने में लाखों रुपया गवां देते हैं लेकिन बीमारी के कारणों को समझ कर जड़ से खत्म करने की कवायद नहीं करते। जबकि सच्चाई यह है कि अगर हम अपने धर्मशास्त्रों के अनुसार अपने भोजन और दिनचर्या को संचालित करें तो आधुनिक जीवन की चकाचौंध के बीच भी हम पूरी तरह स्वस्थ रह सकते हैं।

हज़ारों सालों से ऋषि मुनियों ने अपने अनुभव और ज्ञान के आधार पर इन धर्मशास्त्रों की रचना की थी जो कलयुग के प्रारंभ में छिन्न-भिन्न हो गए। इसलिए नेमिशारण्य में शौनक ऋषि के नेतृत्व में देश भर के कोने-कोने से अट्ठासी हज़ार ऋषि वहाँ ज्ञान चर्चा के लिए एकत्र हुए और लंबे व गहरे चिंतन व संवाद के बाद उस ज्ञान को लेकर पुनः भारत के कोने-कोने में पहुँच गए। उनके द्वारा दिए गए ज्ञान का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा और ये पद्धतियाँ समाज में स्वीकृत और प्रतिष्ठित हो गई, जिनके अनुसार हम आज भी कुछ सीमा तक आचरण कर रहे हैं।

उदाहरण के लिए फागुन पूर्णिमा को होलिकोत्सव करना, मकर संक्रांति के दिन तिल और गुड़ के लड्डू खाना और दान करना। सूर्य-चंद्र ग्रहण के समय खाना-पीना नहीं या फिर गणेश जी के पूजन के लिए दूर्वा का, शंकर जी के पूजन के लिए बेलपत्र का और विष्णु पूजन के लिए तुलसी पत्र का प्रयोग करना उसी परंपरा का प्रभाव है। इसी तरह विजयदशमी को शस्त्र पूजन करना, पाटी पूजन करना या विद्वानों को दक्षिणा देना, दीपावली के पहले अपने आवास की लिपाई-पुताई करना और लक्ष्मी पूजन के बाद दीपोत्सव करना। ये सब शास्त्र शुद्ध पद्धतियों का समावेश कर, जिन ग्रंथों की रचना की गई उन्हें धर्मशास्त्र कहते हैं। धर्म वही है जिसे प्रजा धारण करे यानी उसके अनुसार आचरण करे तो समाज को स्थिरता प्राप्त होती है।

यही बात हमारे दैनिक आहार और पाक-क्रिया पर भी लागू होती है। हमारा आहार शास्त्र और पाक शास्त्र धर्मशास्त्रों का ही एक महत्वपूर्ण अंग है। जरा सोचें कि अधिकांश लोगों का भोजन, दाल-चावल, रोटी-सब्ज़ी होगा, यह किसने तय किया? दाल-सब्ज़ी को छौंकने का आविष्कार किसने किया होगा? श्राद्ध में उड़द की दाल की पकौड़ी, कचौड़ी, इमरती खाना और होली के दिनों में खजूर और ज्वार खाना और चैत्र के महीने में कड़वे नीम का रस पीना ये किसने और कब तय किया होगा?

इन परंपराओं को हम केवल अंधविश्वास से नहीं बल्कि अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने के उद्देश्य से आज भी निभाते आ रहे हैं। इसी तरह दक्षिण भारत में इडली डोसा, महाराष्ट्र में वरण और भात, राजस्थान में दाल-बाटी और सैंगरी, गुजरात में भकड़ी और सुखड़ी, पंजाब में परांठे और लस्सी, उड़ीसा में पखालभात, बंगाल में माछ-भात, ये कैसे और कब हमारी दिनचर्या में आए और आज भी हम इनका पालन

करते हैं।

इसी तरह, भोजन बनाने की विभिन्न पद्धतियां, विभिन्न मसालों का प्रयोग, शुद्ध घी या फिर सरसों, तिल या नारियल के तेल का प्रयोग, भोजन परोसने की विभिन्न पद्धतियां, उनको पकाने और खाने के लिए विभिन्न धातुओं के पात्रों का प्रयोग किसने और कब सिखाया होगा? युगों से जो हम करते आए हैं वह हमें बहुत ही सहज और स्वाभाविक लगता है। पर विचार करने पर आश्चर्य होता है कि उन ऋषियों की समग्र बुद्धि और सूक्ष्मता पर, जिन्होंने इस विज्ञान को स्थापित किया। भोजन बनाना, परोसना और उसका आस्वादन करना, यह तत्वज्ञान है, यह यज्ञ है, शास्त्र है, कौशल है, कला है, रसास्वादन है, प्राणों की पुष्टि है, इन्द्रियों और मन का सुख है और यह हमारा संस्कार है। एक साथ पोषण, तोषण, संस्कार, आनंद और आत्म दर्शन है।

अपनी संस्कृति के इन मूल तत्वों के कारण, भारत चिरंजीव बना है। इस वास्तविकता को अब पूरा विश्व स्वीकार कर रहा है। परंतु हम स्वयं ही आज इन बातों से विमुख हो गए हैं। मैकॉले की आजतक लागू शिक्षा पद्धति ने हमारी सोच को पूरी तरह बदल दिया है। अपने रीति-रिवाज़ों, परंपराओं, पद्धतियों और ख़ान-पान व पहनावे का सम्मान करने की बजाए हम उनका उपहास करना, आलोचना करना और उपेक्षा करना अपने आधुनिक होने का प्रमाण मानते हैं। हम अन्न को पवित्र मानने के स्थान पर उसे बाज़ार में बिकने वाला एक सामान्य पदार्थ मानने लगे हैं। अन्न का आरोग्य और संस्कार के साथ सीधा संबंध है, इस बात को भूल कर केवल स्वाद की संतुष्टि के लिए ही उसे ग्रहण करते हैं।

इसलिए देश में अन्न का संकट और शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का संकट बढ़ गया है। जैस कोई हीरे को पत्थर समझ कर फेंक दे, वैसे ही हमने अपने शास्त्रों को फेंक दिया है और पश्चिम की बाज़ारू संस्कृति के ग़ुलाम बन गए हैं। हमारे दैनिक जीवन में ऑनलाइन आनेवाला भोजन इसका प्रमाण है। जिसका परिणाम है आधुनिक चिकित्सा का दिन-दूना और रात-चौगुना बढ़ता कारोबार। उपरोक्त ज्ञान का आधार पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, कांकरिया, अहमदाबाद से प्रकाशित एक अत्यंत मूल्यवान ग्रंथ ‘आहारशास्त्र’ है जो आज हर घर में होना चाहिए। मात्र पाँच सौ रुपए का यह ग्रंथ पढ़कर हर महिला अपने घर को निरोगी, सुखी व संपन्न बना सकती है।

इसी क्रम में याद आया कि कई बरस पहले अमरीका के कई बड़े शहरों में अपनी व्याख्यान माला के दौरान, लॉस एंजलेस से सैनहोज़े की फ्लाइट में एक वृद्ध अमरीकी महिला, जो मेरे साथ बैठी थीं, उनसे मैंने पूछा कि वे कहाँ जा रही हैं? वे बोलीं अपनी नातिन के पास। क्योंकि वो फ़ोन पर कहती है, “नानी आपका बनाया खाना मुझे बहुत अच्छा लगता है। मम्मी जो पका-पकाया खाना बाज़ार से लाती हैं उसमें कोई स्वाद नहीं है। इसलिए मैं कुछ दिनों के लिए उसके पास जा रही हूँ।” उनकी ये बात सुनकर मुझे अपनी माँ और नानी के बनाए खाने का स्वाद मुंह में आ गया। वो स्वाद जिससे आज की युवा पीढ़ी और हमारे नाती-पोते बहुत तेज़ी से वंचित होते जा रहे हैं।

By विनीत नारायण

वरिष्ठ पत्रकार और समाजसेवी। जनसत्ता में रिपोर्टिंग अनुभव के बाद संस्थापक-संपादक, कालचक्र न्यूज। न्यूज चैनलों पूर्व वीडियों पत्रकारिता में विनीत नारायण की भ्रष्टाचार विरोधी पत्रकारिता में वह हवाला कांड उद्घाटित हुआ जिसकी संसद से सुप्रीम कोर्ट सभी तरफ चर्चा हुई। नया इंडिया में नियमित लेखन। साथ ही ब्रज फाउंडेशन से ब्रज क्षेत्र के संरक्षण-संवर्द्धन के विभिन्न समाज सेवी कार्यक्रमों को चलाते हुए। के संरक्षक करता हैं।

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