वंदे मातरम सिर्फ एक गीत नहीं है, बल्कि यह 140 करोड़ भारतीयों की राष्ट्रवाद की भावनाओं को प्रतीकित करने का माध्यम है। यह भारत की नियति का एक सबसे सुंदर हिस्सा है। दुर्भाग्य से कांग्रेस पार्टी इस नियति को स्वीकार करने से भाग रही है। जिस पार्टी ने आजादी की लड़ाई का नेतृत्व किया, आजादी के 80वें वर्ष तक आते आते उसका इतना पतन हो गया कि उसने अपना ही इतिहास भुला दिया! आश्चर्य की बात यह है कि कांग्रेस इतिहास को 1937 से शुरू करना चाहती है। लेकिन वंदे मातरम का इतिहास तो 1875 से शुरू होता है, जब महान बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसकी रचना की थी। इस गीत ने कई तरह के बदलाव देखे हैं। आजादी से पहले और आजादी के बाद की स्थितियां देखी हैं। अगर कांग्रेस इसे आजादी से पहले वाली स्थिति में ही रख कर देखना चाहती है तो यह उसकी समझ है। परंतु मौजूदा समय मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना जैसे किसी नेता के दबाव में निर्णय का नहीं है।
क्या कांग्रेस भूल गई कि 1896 के बाद से यह पूरा गीत कांग्रेस के अपने इतिहास का हिस्सा रहा है? स्वंय गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में वंदे मातरम के सभी छह अंतरे गाए थे। 1896 से लेकर 1937 तक कांग्रेस के कम से कम सात राष्ट्रीय अध्यक्ष मुस्लिम थे और उन सबकी अध्यक्षता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम के सभी छह अंतरे गाए गए। किसी मुस्लिम अध्यक्ष ने इस आधार पर आपत्ति नहीं की थी कि इसमें हिंदू देवी, देवताओं का जिक्र है और इससे उनकी धार्मिक भावना आहत होती है। शुरुआत 1896 से ही होती है, जब मोहम्मद रहमतुल्ला एम सयानी कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे और तब के कलकत्ता अधिवेशन में पूरा वंदे मातरम गाया गया था। ऐसे ही 1913 में कराची अधिवेशन में नवाब सैयद मोहम्मद बहादुर कांग्रेस अध्यक्ष थे और पूरा वंदे मातरम गाया गया था। 1918 में उस समय के बॉम्बे में हुए विशेष कांग्रेस अधिवेशन में सैयद हसन इमाम कांग्रेस अध्यक्ष थे और वंदे मातरम के सभी छह अंतरे गाए गए। 1921 में हकीम अजमल खां और 1923 में मोहम्मद अली जौहर कांग्रेस अध्यक्ष थे और तब भी पूरे वंदे मातरम का गायन हुआ था। उसके बाद मौलान अबुल कलाम आजाद और मुख्तार अहमद अंसारी के समय भी वंदे मातरम को लेकर विवाद नहीं हुआ।
यह ऐतिहासिक तथ्य है कि मोहम्मद अली जिन्ना से पहले किसी मुस्लिम नेता ने धार्मिक भावना आहत होने के सवाल पर इस गीत का विरोध नहीं किया था। मुस्लिम नेताओं ने इस गीत का विरोध इसलिए नहीं किया था क्योंकि यह राष्ट्रवाद की भावना का गीत था, आजादी की लड़ाई का गीत था और साथ ही हिंदू व मुस्लिम के एक साथ मिल कर अंग्रेजों से लड़ने का गीत था। इस गीत और वंदे मातरम के नारे के साथ तो 1905 के बंग विभाजन का विरोध किया गया था और अंग्रेजों को बंगाल के बंटवारे का फैसला टालने के लिए विवश किया गया था। फिर यह कैसे सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने या किसी की भावना आहत करने वाला गीत हो सकता है?
सबसे पहले इस गीत से मोहम्मद अली जिन्ना की भावना आहत हुई थी। वैसे उनकी भावना आहत होना भी एक राजनीतिक मसला था, जो उनकी महत्वाकांक्षा से जुड़ा था। उन्होंने मुस्लिम आवाम को कांग्रेस से दूर करने के लिए यह मुद्दा उठाया और उस समय कांग्रेस नेतृत्व ने आजादी की लड़ाई के व्यापक संदर्भ को देखते हुए यह समझौता किया कि वंदे मातरम के सिर्फ दो ही अंतरे गाए जाएंगे। तभी 1937 के कलकत्ता अधिवेशन में पहली बार सिर्फ दो अंतरे गाए गए। हालांकि उसके बाद भी कांग्रेस मुस्लिम लीग को संतुष्ट नहीं कर पाई। इसका कारण यह था कि कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओं को इस गीत के दो या चार अंतरे से समस्या नहीं थी। उनको वंदे मातरम के दो शब्दों से आपत्ति थी। उन्होंने अपने धार्मिक विश्वास को राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति का माध्यम बनाया और उसके बाद देश में क्या हुआ यह सब जानते हैं।
अगर कांग्रेस के इस तर्क को मान भी लें कि 1937 में महात्मा गांधी और दूसरे महान नेताओं ने जो वंदे मातरम गाया वही कांग्रेस गाएगी तब भी यह सवाल तो है कि क्या कांग्रेस अब भी मान रही है कि देश के हालात 1937 जैसे हैं? क्या कांग्रेस मान रही है कि नागरिकों का एक समूह देश के राष्ट्रगीत का सम्मान नहीं करना चाहता है तो उसकी मांग के आगे झुक जाया जाए? यह बहुत साफ दिख रहा है कि कांग्रेस अपनी तुष्टिकरण की राजनीति के चलते न सिर्फ राष्ट्रगीत का अपमान कर रही है, बल्कि कानून और संविधान का भी उल्लंघन कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने संसद के मानसून सत्र में विधेयक पारित करके जो कानून बनाया है उसमें बहुत लचीलापन है। उसमें किसी को बाध्य नहीं किया जा रहा है कि वह पूरा वंदे मातरम गाए। राजकीय समारोहों में से पूरा बजाए जाने का प्रावधान किया गया है और नागरिकों से सिर्फ यह उम्मीद की जा रही है कि जब भी वंदे मातरम गाया या बजाया जाए तो वह उसका सम्मान करे। उससे सिर्फ यह उम्मीद की जाती है कि वह वंदे मातरम का अपमान नहीं करे, उसके गायन में बाधा नहीं उत्पन्न करे और इसे रोकने का प्रयास न करे। अगर उसे गीत याद नहीं है तब भी उससे सिर्फ सम्मान की उम्मीद की जा रही है।
असल में देश की मुस्लिम आबादी का एक बड़ा हिस्सा है अपनी संवैधानिक पहचान से ऊपर धार्मिक पहचान को रखना चाहता है। यह देश की एकता व अखंडता के लिए एक चिंताजनक विचार है। भारत का संविधान सबको धार्मिक आजादी देता है। लेकिन हर नागरिक की पहली पहचान भारतीय होने की है, जो संविधान से व्याख्यायित है। उससे ऊपर कोई पहचान नहीं हो सकती है। यह बात देश की मुख्य विपक्षी पार्टी को समझने की जरुरत है। नागरिक की संवैधानिक पहचान सबसे ऊपर है और अगर देश की संसद ने कानून बना कर वंदे मातरम का गायन अनिवार्य किया है और उसके सम्मान के कुछ नियम बनाए हैं तो उनका पालन किया जाना चाहिए।
मुश्किल यह है कि कांग्रेस चित भी मेरी और पट भी मेरी की राजनीति कर रही है। उसने संसद में वंदे मातरम के विधेयक पर चर्चा में हिस्सा नहीं लिया। उसको लग रहा था कि अगर उसने इसका समर्थन किया तो कट्टरपंथी मुस्लिम नाराज होंगे और अगर विरोध किया तो बहुसंख्यक हिंदू समाज के बीच नकारात्मक मैसेज जाएगा। इसलिए उसने रणनीतिक रूप से दूरी रखी। लेकिन बाद में कांग्रेस का असली रुप सामने आ गया। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में जो हुआ उसे पूरे देश ने देखा। जैसे ही वंदे मातरम का तीसरा अंतरा बजना शुरू हुआ सोनिया व राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे तीनों असहज हो गए। सोनिया गांधी का तो चेहरा गुस्से से तमतमाने लगा और उन्होंने सेवा दल के एक स्वंयसेवक को बुला कर नाराजगी जताई। साफ दिख रहा था कि वंदे मातरम का गायन रुकवाने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन ऐसा लग रहा है कि सेवा दल के स्वंयसेवक को कानून की जानकारी थी। इसलिए उसने पूरा गाना बजने दिया। बाद में जयराम रमेश ने कहा कि सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष के लिए कुर्सी लाने की बात कही थी।
यह कानून में से लूपहोल निकाल कर उससे बचने के प्रयास के सिवा और कुछ नहीं है। कांग्रेस नेतृत्व को पता है कि अगर राष्ट्रगीत को बीच में रोकने का प्रयास किया गया तो मुकदमा दर्ज हो सकता है। इसलिए बचने का यह रास्ता निकाला गया। लेकिन मामला इतना ही नहीं है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कांग्रेस की केरल सरकार ने राजकीय समारोह में वंदे मातरम का गायन नहीं कराया, जबकि नए कानून में इसे अनिवार्य किया गया है। स्पष्ट है कि कांग्रेस ने अपनी सहयोगी मुस्लिम लीग की चिंता में कानून का उल्लंघन किया। बाद में 19 अगस्त को कांग्रेस कार्य समिति यानी सीडब्लुसी की बैठक में यह तय किया गया कि कांग्रेस वंदे मातरम के दी अंतरे गाएगी। यह कानूनी रूप से गलत नहीं होगा क्योंकि निजी समारोह में वंदे मातरम के गायन को लेकर कई तरह की छूट दी गई है। परंतु अगर कांग्रेस और उसकी सरकारें मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के चलते राजकीय समारोहों में भी दो ही अंतरे गाती है या वंदे मातरम नहीं गाती है तो यह समस्या वाली बात होगी। इसका स्पष्ट संदेश यह होगा कि वोट और तुष्टिकरण की राजनीति में कांग्रेस किसी भी हद तक जाने को तैयार है। इसके लिए उसको संविधान की परवाह नहीं और बहुसंख्यक हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने में भी संकोच नहीं है। ध्यान रहे कांग्रेस के पास इतिहास की एक बड़ी पूंजी यह है कि उसने आजादी की लड़ाई लड़ी है। वोट की राजनीति में क्या वह उसे भी गंवाने का जोखिम ले सकती है? राष्ट्रवाद और हिंदुत्व पर भाजपा का एकाधिकार है। अब कांग्रेस वंदे मातरम का विरोध करके आजादी की लड़ाई के अपने इतिहास को गंवा रही है। वह वही गलती दोहरा रही है, जो उसने अस्सी के दशक में शाहबानो मामले में की थी। मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए किए गए उस फैसले के 40 साल गुजर गए हैं और उसके बाद से कांग्रेस कभी भी लोकसभा में बहुमत नहीं हासिल कर पाई है।
(लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)
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