nayaindia intellectual backwardness in india भारत में बौद्धिक पिछड़ेपन की नायाब मिसाल!
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भारत में बौद्धिक पिछड़ेपन की नायाब मिसाल!

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भारत का बौद्धिक वर्ग खोखला हो चुका है? माना जाता है कि जरूरी सवालों को चर्चा के केंद्र में लाना बौद्धिक वर्ग की जिम्मेदारी होती है। जब असमानता जैसे सवाल चर्चित होते हैं, तो राजनीतिक दल उन पर अपना रुख तय करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। क्या यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि भारत में अगर कभी विषमता का सवाल सुर्खियों में आता भी है, तो ऐसा फ्रांस स्थित इनइक्लिटी लैब या ऑक्सफेम जैसी संस्थाओं की रिपोर्टों से होता है। एक-दो दिन तक चर्चा में रहने के बाद ये मुद्दा फिर प़ृष्ठभूमि में चला जाता है।

गुजरे 28 और 29 अप्रैल को सऊदी अरब की राजधानी रियाद में दुनिया की बड़ी कंपनियों, सरकारों, और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के लगभग 1000 प्रतिनिधियों की एक महत्त्वपूर्ण बैठक हुई। (Overview > Special Meeting on Global Collaboration, Growth and Energy for Development. World Economic Forum (weforum.org)). इसमें विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अधिकारियों ने भी हिस्सा लिया। बैठक में मुख्य रूप से तीन मुद्दों पर चर्चा हुई, जिनमें पहला थाः

–              समावेशी विकास (inclusive growth) के लिए समझौता। इस विषय की जरूरत बताते हुए बैठक के एजेंडे में कहा गया-

–              आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में तीव्र गति से सुधार से लेकर औद्योगित नीतियों, आविष्कार के हालिया रुझानों और आर्थिक नीति, मानव विकास में लंबे समय से जरूरत से कम निवेश आदि के कारण वैश्विक गैर-बराबरी बढ़ने का खतरा पैदा हुआ है और गुजरे दशकों में गरीबी के खिलाफ संघर्ष में जो प्रगति हुई थी, वह खतरे में पड़ रही है।

बाकी दो विषय थेः ऊर्जा के क्षेत्र में पहल को गति देना, और वैश्विक सहयोग में फिर से जान फूंकना।

यह दिलचस्प है कि अब विश्व बैंक और आईएमएफ जैसी संस्थाएं उन नीतियों के गंभीर दुष्परिणामों को स्वीकार कर उनका समाधान ढूंढ रही हैं, जिन्हें पिछले चार-पांच दशकों में उन्होंने आक्रामक अंदाज में दुनिया भर में फैलाया है।

आईएमएफ की निदेशक क्रिस्टीलिना जियोर्गियेवा ऐसी नीतियों की जरूरत बताने खुद वहां गईं, जिनसे वैश्विक सहयोग बढ़े और आर्थिक गैर-बराबरी कम की जा सके। बैठक में यह स्पष्ट किया गया कि इस आयोजन का मकसद बढ़ रहे अंतरराष्ट्रीय व्यापार युद्धों को रोकना, और आय एवं धन की बढ़ रही गैर-बराबरी को घटाने के उपाय ढूंढना है।

इस सिलसिले में यह याद करना उचित होगा कि जियोर्गियेवा हाल ही में अपने दूसरे कार्यकाल के लिए आईएमएफ की प्रबंध निदेशक चुनी गई हैँ। पहला कार्यकाल खत्म होने के साथ जब उन्होंने फिर से अपनी दावेदारी पेश की, तो उसी समय उन्होंने इस कार्यकाल के लिए अपना एजेंडा घोषित किया था। इसमें उन्होंने एलान किया था कि नए कार्यकाल में दुनिया में गैर-बराबरी घटाना उनका प्रमुख मकसद होगा। इस मौके पर लिखे अपने ब्लॉग में उन्होंने कहाः

बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में वृद्धि दर घट रही है और वास्तविक जीडीपी की वृद्धि निम्न बनी हुई है। इसकी वजह धन और आय की बढ़ती गैर-बराबरी है। उन्होंने कहा- “यह जिम्मेदारी हम पर है कि पिछले 100 साल में हमने जिस सबसे बड़ी गलती को होने दिया, उसे हम सुधारें। यह गलती है ऊंची आर्थिक गैर-बराबरी को जारी रहने देना। आईएमएफ के शोध से जाहिर हो चुका है कि आय की विषमता कम रहने पर ऊंची और टिकाऊ वृद्धि दर हासिल होती है।” (How the G20 Can Build on the World Economy’s Recent Resilience (imf.org))

नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री एंगस डिटॉन अब गैर-बराबरी का अध्ययन करने के लिए मशहूर हैं। इस विषय पर उन्होंने किताबों के साथ-साथ महत्त्वपूर्ण शोध पत्र भी लिखे हैं। लेकिन डिटॉन की दिलचस्पी हमेशा से इस विषय में नहीं थी। पहले वे मुख्यधारा के अर्थशास्त्री थे- यह इस बात से भी जाहिर है कि उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला। उन्हीं डिटॉन के एक महत्त्वपूर्ण लेख को हाल में आईएमएफ ने अपने मंचों पर प्रचारित किया। इस लेख का शीर्षक हैः अपने अर्थशास्त्र पर पुनर्विचार। (Rethinking Economics or Rethinking My Economics by Angus Deaton (imf.org))

इस लेख में डिटॉन ने स्वीकार किया कि पहले उनकी सोच गलत दिशा में थी। उन्होंने कहा कि उस अर्थशास्त्र की सोच आज अफरातफरी में है। उस सोच से हुई गलतियों का उल्लेख करते हुए डिटॉन ने जो कहा कि उसका सार हैः ‘मुक्त बाजार’ की नीतियां उतनी कारगर नहीं हैं, जितना दावा किया जाता है। इनके जरिए संकटों को रोका नहीं जा सका।

डिटॉन की यह टिप्पणी महत्त्वपूर्ण हैः ‘मैं लंबे समय तक ट्रेड यूनियनों को एक खलल मानता रहा। मेरी सोच रही कि यूनियनें आर्थिक कुशलता में दखल देती हैं। इसलिए मैंने यूनियनों की धीरे-धीरे हुई मृत्यु का स्वागत किया था। लेकिन आज बड़ी कंपनियों के पास कार्य-स्थितियों और वेतन को तय करने की अत्यधिक शक्ति जमा हो गई है। वॉशिंगटन में होने वाले फैसलों को प्रभावित करने की उनके पास अत्यधिक शक्ति है, जबकि कॉरपोरेट लॉबिस्ट्स की तुलना में यूनियनों के पास लगभग नगण्य ताकत है। आज आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के बारे में जब फैसले लिए जाएं, तो उस मेज पर यूनियनों की उपस्थिति भी अवश्य होनी चाहिए।’

–              डिटॉन ने इस दावे को ठुकराया है कि भूमंडलीकरण के कारण पिछले 30 वर्षों में गरीबी घटी है।

–              उन्होंने कहा कि अगर चीन को छोड़ दिया जाए, तो बाकी दुनिया में गरीबी में कोई वास्तविक गिरावट नहीं आई है।

एक बार फिर इस बात पर ध्यान दे लें कि इस लेख को आईएमएफ ने प्रचारित-प्रसारित किया है।

आईएमएफ विभिन्न देशों पर कमखर्ची (austerity) की नीतियां थोपने के लिए कुख्यात रहा है। इन नीतियों ने गैर-बराबरी बढ़ाने में संभवतः सबसे बड़ा योगदान किया है। गैर-सरकारी संस्था ऑक्सफेम ने अपनी एक रिपोर्ट में 17 देशों में इन नीतियों के परिणाम का वर्णन किया है। उसने बताया है कि उन देशों में सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों पर जितनी रकम खर्च करने के लिए आईएमएफ ने वहां की सरकारों को प्रोत्साहित किया, राजकोषीय खर्च में उससे चार गुना ज्यादा रकम कटौती के लिए उसने दबाव डाला। यानी अगर आईएमएफ के प्रोत्साहन से किसी देश की सरकार ने सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं पर एक रुपया खर्च किया, तो उसके दबाव में उसे चार रुपये की खर्च कटौती करनी पड़ी। नतीजा, वहां आम जन की बढ़ी मुसीबतों के रूप में सामने आया। (IMF Social Spending Floors: A fig leaf for austerity? (openrepository.com))

इन नीतियों के दुष्परिणाम इतने भीषण हैं कि अब खुद आईएमएफ और उसकी सहमना संस्थाओं को यह जरूरी महसूस हुआ है कि घोर गरीबी और अभूतपूर्व गैर-बराबरी पर अब काबू पाना होगा। इन संस्थाओं में वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम भी शामिल है, जिसका हर साल दावोस में बहुचर्चित सम्मेलन होता है। हाल के वर्षों में इन सम्मेलनों में बढ़ती विषमता एक प्रमुख विषय रही है। उधर सऊदी रियाद में हुई बैठक के दौरान विश्व बैंक की तरफ से रखे गए प्रेजेंटेशन में यह स्वीकार किया गया कि कोरोना महामारी के बाद गरीब देशों के अंदर गरीबी और बढ़ी है।

इस बीच वैश्विक पूंजी के मुखपत्र माने जाने वाले द इकॉनमिस्ट, फाइनेंशियल टाइम्स, वॉल स्ट्रीट जर्नल आदि प्रकाशनों में भी इन दिनों इस समस्या पर चिंता अक्सर देखने को मिलती है। ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स के मशहूर स्तंभकार मार्टिन वूल्फ ने स्वीकार किया है कि चरम गरीबी खत्म के होने की आशा पर विराम लग गया है। उनके मुताबिक दुनिया के गरीबों की नजर देखें, तो पिछला दशक एक गंवाया गया समय मालूम पड़ सकता है। (We risk a lost decade for the world’s poor (ft.com))

तो साफ है कि गैर-बराबरी आज एक ऐसी समस्या बन गई है, जिसे तमाम देशों के आर्थिक विकास के लिए खतरा समझा जा रहा है। इस समस्या का कैसे समाधान हो, यह सवाल नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था के संचालकों की भी एक प्रमुख चिंता बन गया है।

मगर भारत में क्या हाल है? आइए, एक मिसाल से बात आगे बढ़ाते हैः

एक टीवी चैनल पर भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जेपी नड्डा का इंटरव्यू प्रसारित हुआ। उसमें एंकर ने इस ओर ध्यान दिलाया कि कांग्रेस के चुनाव घोषणापत्र में कहीं यह नहीं कहा गया है कि उसकी सरकार बनी तो हिंदुओं की संपत्ति छीन कर मुसलमानों को दी जाएगी। दरअसल, संपत्ति छीनने की बात ही कहीं नहीं कही गई है। उसमें सिर्फ यह कहा गया है कि आय एवं धन की असमानता का कांग्रेस सरकार समाधान करेगी।

इस पर नड्डा ने जवाब दियाः इसके लिए तो कानून बनाना पड़ेगा। असमानता खत्म कर समानता लाना क्या माओवादी सोच नहीं है?

तो देश की सत्ताधारी पार्टी की यह सोच है। नड्डा के पहले प्रधानमंत्री ने इस मुदद् पर कांग्रेस पर हमला बोलना शुरू किया। उनकी कही बातों का सार बताते हुए एक अंग्रेजी अखबार ने अपनी खबर का शीर्षक बनायाः मोदी की नजर में कांग्रेस का समानता का वादा एक समस्या है।

यानी भाजपा नेताओं ने ना सिर्फ इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग दिया है, बल्कि वे आय एवं धन की विषमता घटाने की सोच को ही खतरनाक बताने के अभियान में जुटे हुए हैँ। इससे मुमकिन है कि देश के मोनोपॉली कॉरपोरेट घरानों एवं अभिजात्य वर्ग का समर्थन उनकी पार्टी के लिए और मजबूत हो जाए। मगर यह सोच ना सिर्फ न्याय की धारणा के खिलाफ है, बल्कि इसमें अर्थव्यवस्था की भी घोर नासमझी झलकती है। वे जो कह रहे हैं, उसमें कम्युनिस्ट और माओवादी शब्दों के इस्तेमाल से संभव है कि मतदाताओं के एक हिस्से में भय फैलाने में वे सफल रहें, लेकिन इससे वे पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों के बारे में भी अज्ञान फैला रहे हैँ।

दरअसल, प्रगतिशील टैक्स व्यवस्था से गैर-बराबरी या गरीबी को हल करना कभी कम्युनिस्ट विमर्श का हिस्सा नहीं रहा। यह टैक्स व्यवस्था पूंजीवादी व्यवस्था का हिस्सा है, जबकि कम्युनिस्ट सोच यह है कि जब तक पूंजीवाद है, गरीबी, बेरोजगारी और गैर-बराबरी को खत्म नहीं किया जा सकता। उत्तराधिकार कर, धन कर या आय कर के जरिए विषमता को नियंत्रित करने की बात दरअसल, पूंजीवाद के कारण पैदा हुई समस्याओं के पीड़ितों पर मरहम लगाना भर है।

और सचमुच यह उन्हीं राजनीतिक दलों के एजेंडे पर रही है, जो ऐसा मरहम लगाना चाहते हैं।

नव-उदारवादी पूंजीवाद की संचालक संस्थाएं और उसके मुखपत्र प्रकाशन आज अगर आर्थिक विषमता को लेकर चिंतित हैं, तो इसलिए इसकी वजह बाजार का विस्तार रुक जाना है। कुछ हाथों में धन इकट्ठा होने से उपभोग सीमित हो जाता है, इसलिए कि धनी लोग उपभोग के चरम तक पहले ही पहुंच चुके होते हैं। जबकि अगर निम्न वर्गीय लोगों की आय बढ़ती है, तो उनमें उपभोग की आकांक्षाएं पैदा होती हैं, उससे मांग बढ़ती है और उससे बाजार का विस्तार होता है। बाजार फैलने पर नए निवेश की गुंजाइशें बनती हैं। इस तरह ग्रोथ होता है।

बढ़ती गैर-बराबरी सामाजिक अशांति की परिस्थितियां भी पैदा करती हैं, जबकि अर्थव्यवस्था चाहे जिस प्रकार की हो, आर्थिक विकास के लिए सामाजिक शांति और स्थिरता को अनिवार्य शर्त माना जाता है। यही वजह है कि विश्व पूंजीवाद के संचालक अब बढ़ती गई गैर-बराबरी पर नियंत्रण के उपाय ढूंढ रहे हैं। वे ऐसा कर पाएंगे या नहीं, यह अलग सवाल है। दरअसल, वे जिस तरह ऐसा करने की कोशिश कर रहे हैं, वह समस्याग्रस्त है। लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि उन्हें ऐसा करने की जरूरत महसूस हुई है।

दूसरी तरफ भारत में हाल यह है कि आम चुनाव के बीच इस बेहद अहम सवाल पर लोगों को गुमराह किया जा रहा है। और विपक्षी दल भी इस पर कोई ठोस एवं तार्किक बहस छेड़ने में विफल हैं। यह गौरतलब है कि जब मोदी ने हमला बोला, तो कांग्रेस के हाथ-पांव फूल गए। बजाय इस मुद्दे पर सत्ताधारी पार्टी को कठघरे में खड़ा करने के, वह तब से ये सफाई देने में जुटी रही है कि प्रगतिशील कराधान कहीं भी उसके एजेंडे में नहीं है। इस लिहाज से भारत एक विचित्र लोकतंत्र नजर आता है, जहां आम जन से जुड़े असली मुद्दों पर सभी पार्टियां मुंह चुराती नजर आती हैं। जबकि अमेरिका और यूरोपीय देशों में भी- जो पूंजीवाद का गढ़ हैं- चुनावों के वक्त और सामान्य तौर पर भी- सार्वजनिक बहसों में पिछले लगभग डेढ़ दशक से गैर-बराबरी का मुद्दा प्रमुख बना हुआ है।

इस स्थिति का कारण क्या है? क्या भारत का बौद्धिक वर्ग खोखला हो चुका है? अक्सर माना जाता है कि जरूरी सवालों को चर्चा के केंद्र में लाना बौद्धिक वर्ग की जिम्मेदारी होती है। जब ये सवाल चर्चित होते हैं, तो राजनीतिक दल उन पर अपना रुख तय करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। क्या यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि भारत में अगर कभी विषमता का सवाल सुर्खियों में आता भी है, तो ऐसा फ्रांस स्थित इनइक्लिटी लैब या ऑक्सफेम जैसी संस्थाओं की रिपोर्टों से होता है। एक-दो दिन तक चर्चा में रहने के बाद ये मुद्दा फिर प़ृष्ठभूमि में चला जाता है। और फिर शासक वर्ग के हित-रक्षक जाति-धर्म के मुद्दे राष्ट्रीय विमर्श पर हावी हो जाते हैं।

पहचान से संबंधित ऐसे मुद्दे पश्चिमी देशों में भी खूब हावी हैं। व्यवस्थागत मूलभूत प्रश्नों से लोगों का ध्यान हटाने के लिए वहां भी इन्हें सुनियोजित ढंग से प्रचारित किया गया है। लेकिन अब उसके गंभीर परिणाम वहां की पूंजीवादी व्यवस्थाओं को भी भुगतने पड़ रहे हैं। तो अब कम-से-कम इतना तो हुआ है कि इस समस्या पर बात हो रही है।

लेकिन भारत में विमर्श का पिछड़ापन ऐसा है कि सत्ताधारी पार्टी विषमता जैसे प्रश्न पर भ्रामक बातें कहकर विपक्ष को बचाव की मुद्रा में डालने में सफल हो जाती है। उधर विपक्ष भी इससे बचने की जुगत में जुटा रहता है। और बुद्धिजीवी वर्ग की तो बात ना ही करें, वही बेहतर है!

By सत्येन्द्र रंजन

वरिष्ठ पत्रकार। जनसत्ता में संपादकीय जिम्मेवारी सहित टीवी चैनल आदि का कोई साढ़े तीन दशक का अनुभव। विभिन्न विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता के शिक्षण और नया इंडिया में नियमित लेखन।

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