राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

‘जब खुली किताब’: रिश्तों के अनकहे पन्ने

पंकज कपूर का किरदार इस कहानी का भावनात्मक केंद्र है। उनका चरित्र एक ऐसे व्यक्ति का है, जो जीवन भर अपने भीतर बहुत कुछ दबा कर जीता रहा है। उसके व्यक्तित्व में एक गहरी चुप्पी है।.. डिंपल कपाड़िया का किरदार इस कहानी में स्मृतियों और भावनाओं की एक महत्वपूर्ण धुरी बनकर उभरता है।  उनके और पंकज कपूर के बीच जो संवाद और मौन के क्षण हैं, वही इस फ़िल्म की आत्मा बन जाते हैं।

सिने-सोहबत

मौजूदा दौर में जब अधिकांश हिंदी फिल्में तेज़ रफ्तार मनोरंजन, एक्शन और सतही रोमांस के ईर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती हैं, ऐसे में कुछ फ़िल्में ऐसी भी आती हैं, जो दर्शकों को ठहर कर सोचने पर मजबूर करती हैं। लेखक-निर्देशक सौरभ शुक्ला की फ़िल्म “जब खुली किताब” ऐसी ही एक संवेदनशील और आत्ममंथन कराने वाली फिल्म है। यह फ़िल्म किसी बड़े नाटकीय घटनाक्रम या बाहरी शोर-शराबे पर निर्भर नहीं करती, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाले संवादों, रिश्तों के अनकहे दर्द और समय की परतों में दबे सच को धीरे-धीरे खोलती है, बिलकुल एक पुरानी किताब की तरह, जो वर्षों बाद खुलने पर अपनी महक और स्मृतियों से हमें भर देती है।

फ़िल्म का शीर्षक ही अपने आप में एक रूपक है, किताब, जो खुलने पर सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि जीवन के छिपे अध्याय सामने ले आती है। सौरभ शुक्ला ने इस विचार को बेहद सूक्ष्म और संवेदनशील तरीके से पर्दे पर उतारा है।

फ़िल्म की कहानी मूलतः कुछ ऐसे लोगों के ईर्द-गिर्द घूमती है, जिनके जीवन में कई अनकहे सच और अधूरे संवाद छिपे हुए हैं। उम्र के एक ऐसे पड़ाव पर पहुंचकर, जब इंसान पीछे मुड़ कर अपने जीवन को देखने लगता है, तब उन्हें अहसास होता है कि कई बातें कहे बिना रह गईं, कई रिश्ते समझे बिना ही टूट गए और कई फैसलों की वजहें कभी खुलकर सामने नहीं आईं।

पंकज कपूर का किरदार इस कहानी का भावनात्मक केंद्र है। उनका चरित्र एक ऐसे व्यक्ति का है, जो जीवन भर अपने भीतर बहुत कुछ दबा कर जीता रहा है। उसके व्यक्तित्व में एक गहरी चुप्पी है। एक ऐसी चुप्पी, जो केवल शब्दों की कमी नहीं, बल्कि भावनाओं का बोझ है। समय के साथ जब परिस्थितियां बदलती हैं और लोग आमने-सामने बैठ कर अपने जीवन के पन्ने पलटते हैं, तब यह चुप्पी धीरे-धीरे खुलने लगती है।

डिंपल कपाड़िया का किरदार इस कहानी में स्मृतियों और भावनाओं की एक महत्वपूर्ण धुरी बनकर उभरता है। उनके चेहरे पर समय की परिपक्वता और जीवन के अनुभवों की झलक दिखाई देती है। उनके और पंकज कपूर के बीच जो संवाद और मौन के क्षण हैं, वही इस फ़िल्म की आत्मा बन जाते हैं।

फ़िल्म में अपारशक्ति खुराना और समीर सोनी जैसे कलाकार भी हैं, जो नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच संवाद की खाई को दर्शाते हैं। यह पीढ़ियों के बीच का वह अंतर है जहां एक तरफ अनुभवों की विरासत है और दूसरी तरफ बदलते समय की बेचैनी।

सौरभ शुक्ला के निर्देशन में सादगी में गहराई साफ़ दिखती है। सौरभ हिंदी सिनेमा में एक ऐसे कलाकार हैं, जिनकी पहचान बहुआयामी है। वे अभिनेता भी हैं, लेखक भी और निर्देशक भी। ‘जब खुली किताब’ में उनका लेखक और निर्देशक दोनों रूप बेहद परिपक्व दिखाई देता है। उन्होंने इस फ़िल्म को किसी बड़े सिनेमाई तमाशे की तरह नहीं रचा, बल्कि एक अंतरंग नाटक की तरह गढ़ा है। फ़िल्म का ट्रीटमेंट बेहद संयमित है। संवादों में शोर नहीं है, बल्कि एक गहरी संवेदना है। कई जगहों पर सौरभ शुक्ला संवादों की बजाय मौन का इस्तेमाल करते हैं और यही मौन दर्शक को पात्रों के मन के भीतर झांकने का मौका देता है।

दरअसल, पहले ‘जब खुली किताब’ एक नाटक के रूप में बनाया गया गया था, जिसमे मुख्य भूमिका में भी सौरभ ने ख़ुद ही काम किया था। यह फ़िल्म हमें याद दिलाती है कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को समझने का भी एक जरिया हो सकता है।

इस फ़िल्म की एक बड़ी ताकत इसके कलाकार हैं। पंकज कपूर हिंदी सिनेमा और रंगमंच के उन दुर्लभ अभिनेताओं में से हैं, जो  चरित्र को जीवित कर देते हैं। इस फ़िल्म में उनका अभिनय अत्यंत सूक्ष्म और प्रभावशाली है। वे अपने चेहरे के भाव, आंखों की नमी और आवाज़ के उतार-चढ़ाव से एक ऐसे व्यक्ति की मन:स्थिति को दर्शाते हैं, जो वर्षों से अपने भीतर बहुत कुछ दबा कर जी रहा है। डिंपल कपाड़िया का अभिनय भी बेहद प्रभावशाली है। उन्होंने अपने किरदार में गरिमा और संवेदनशीलता का सुंदर संतुलन बनाया है। उनके संवादों में एक गहराई है और कई बार उनका मौन ही सबसे अधिक बोलता है।

अपारशक्ति खुराना इस फ़िल्म में एक अलग रंग लेकर आते हैं। वे आज की पीढ़ी की बेचैनी, सवाल और व्यावहारिकता को बखूबी प्रस्तुत करते हैं। उनके अभिनय में सहजता है और वे फिल्म के भावनात्मक प्रवाह को संतुलित करते हैं। समीर सोनी भी अपने सीमित लेकिन महत्वपूर्ण किरदार में प्रभाव छोड़ते हैं। उनका अभिनय कहानी के कई भावनात्मक आयामों को उजागर करता है।

फ़िल्म  के संवाद में कसावट है। सौरभ शुक्ला ने संवादों को साहित्यिक होने के बावजूद बेहद स्वाभाविक रखा है। कई संवाद ऐसे हैं, जो सीधे दर्शकों के दिल तक पहुंचते हैं। उदाहरण के तौर पर फिल्म यह सवाल उठाती है कि क्या हम सच में अपने प्रियजनों को समझ पाते हैं, या हम केवल उनके बारे में अपनी धारणाएं बना कर जीते रहते हैं?

फ़िल्म बार-बार यह अहसास कराती है कि जीवन में सबसे कठिन काम सच बोलना नहीं, बल्कि सच स्वीकार करना होता है। संगीत और बैकग्राउंड स्कोर कहानी के भावनात्मक स्वर को मजबूत करता है। संगीत कहीं भी कहानी पर हावी नहीं होता, बल्कि एक हल्की-सी धुन की तरह साथ चलता है।

सिनेमैटोग्राफी भी बेहद सादगीपूर्ण लेकिन प्रभावी है। कैमरा कई बार पात्रों के चेहरे पर ठहर जाता है, जैसे वह उनकी आत्मा को पढ़ने की कोशिश कर रहा हो। फ़िल्म का संपादन भी संतुलित है। कहानी धीरे-धीरे आगे बढ़ती है, लेकिन कहीं भी बोझिल नहीं लगती।

‘जब खुली किताब’ केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि यह रिश्तों पर एक दार्शनिक टिप्पणी भी है। फ़िल्म यह सवाल उठाती है कि क्या हम अपने जीवन को सचमुच समझ पाते हैं? क्या हमारे रिश्ते उतने ही सरल होते हैं जितना हम उन्हें मान लेते हैं?

कई बार हम अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण लोगों को सबसे कम समझते हैं। हम उनके बारे में जो कहानी अपने मन में बना लेते हैं, वही हमारे लिए सच बन जाती है। लेकिन जब किसी दिन वह “किताब” सचमुच खुलती है, तब हमें अहसास होता है कि हम कितनी गलतफहमी में जी रहे थे।

आज के दौर में जब रिश्ते अक्सर त्वरित संदेशों, सोशल मीडिया और व्यस्त जीवनशैली के बीच कहीं खो जाते हैं, ऐसी फ़िल्में हमें यह याद दिलाती हैं कि संवाद और संवेदना कितने जरूरी हैं। यह फ़िल्म बख़ूबी बताती है कि हर व्यक्ति अपने भीतर एक किताब लिए घूमता है। एक ऐसी किताब, जिसमें उसके डर, प्रेम, पछतावे और उम्मीदें दर्ज होती हैं लेकिन अक्सर वह किताब बंद ही रह जाती है।

‘जब खुली किताब’ कोई पारंपरिक व्यावसायिक फ़िल्म नहीं है। यह एक धीमी, विचारशील और संवेदनशील फिल्म है, जो दर्शकों से धैर्य और भावनात्मक जुड़ाव की मांग करती है। लेकिन जो दर्शक इस यात्रा में शामिल होते हैं, उन्हें यह फ़िल्म लंबे समय तक याद रहती है।

सौरभ शुक्ला ने इस फिल्म के माध्यम से यह साबित किया है कि सिनेमा अभी भी मानवीय संवेदनाओं का सबसे प्रभावी माध्यम हो सकता है। यह फ़िल्म हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे अपने जीवन में कितनी ऐसी किताबें हैं जो अभी तक खुलनी बाकी हैं। यह दर्शक को केवल कहानी नहीं सुनाती, बल्कि उसे अपने जीवन के पन्ने पलटने के लिए प्रेरित करती है।

ज़ी 5 पर है। देख लीजिएगा।  (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

19 + 1 =