nayaindia Loksabha Election 2024 विपक्ष जान ले अभी नहीं तो कभी नहीं!
Columnist

विपक्ष जान ले अभी नहीं तो कभी नहीं!

Share

समय बहुत कम बचा है। इसमें राहुल की यात्रा भी है। सीट शेयरिंग फाइनल और उसमें दिखे की सबकी कुर्बानी है जल्दी से जल्दी सबके सामने लाना है। विपक्ष को भाजपा को देखना चाहिए और हो सके तो थोड़ा सीखना भी चाहिए कि किस तरह ठीक लोकसभा चुनाव से पहले वह राम मंदिर का उद्घाटन कर रही है। 22जनवरी के बाद मोदी इसी मुद्दे को लेकर चुनाव में जाएंगे।लालू जी को फिर उस बात को जोर देकर दोहराना चाहिए जो उन्होंने विपक्षी एकता की मुंबई मीटिंग में कही थी कि हमारी सबकी भावना यह है कि दो सीटें चाहे कम मिल जाएं मगर इस बार मोदी को हराना है।

सांच कहें तो मारन धावै! कबीर ने तब कहा था और आज भी वैसा ही सच है। हरएक पर लागू होता है। मगर इन दिनों सब से ज्यादा विपक्ष पर। होने को तोसत्तारूढ़ भाजपा पर वह जैसा आजकल की भाषा में कहा जाता है सुपर से भी ऊपरसटीक है। मगर आज वह, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उस स्थितिमें पहुंच गए हैं कि उन पर तो किसी बात का असर होता ही नहीं है। वह खुदको हर मानवीय पैमाने से ऊपर समझने लगे हैं। तीसरी जीत को लेकर वे उसी तरहविश्वास कर रहे हैं जैसे सुबह के सूरज निकलने पर। इसलिए उनसे कुछ कहे जाने का फायदा नहीं। कबीर कहते हैं मारन धावै! वे सुनने को ही तैयारनहीं। वे खुद को अजेय समझने लगे हैं।

मगर देश में लोकतंत्र की जिसको भी चिन्ता है और जो संवैधानिक संस्थाओं पर लगातारबढ़ाए जा रहे दबाव को समझता है, देश में नफरत फैलने के कारण हर तरफ होरहे विभाजन से परेशान है,  और छद्म राष्ट्रवाद की आड़ में बेरोजगारी,महंगाई, नीजिकरण को बढ़ाए जाने के गंभीर परिणामों को समझता है वह इन दिनों विपक्ष से बात कर रहा है।

विपक्ष पिछले दस साल में बिल्कुल तोड़ दियागया, एकदम बेदम है। ऐसी कौन सी विपक्षी पार्टी है जिसके नेता पर ईडी, इनकम टैक्स यादूसरी जांच ऐजेन्सियों के छापे नहीं पड़े। दो-दो मुख्यमंत्रियों तक परजेल जाने की तलवार लटका रखी है। विपक्ष में कौन है जो खुद को सुरक्षितसमझ रहा हो? हर एक पर आतंक का साया है।

कानून का शासन जो किसी भी सरकार का मूल आधार होता है चाहे वह लोकतांत्रिकभी न हो इसको और सबको न्याय देने के सिद्धांत को कभी नहीं छोड़ती को भीपिछले दस साल में खत्म कर दिया गया है। और सरकार क्यों पहले जब मानव केविकास के क्रम में कबीले होते थे या संयुक्त परिवार ही प्रमुख सामाजिकइकाई होते थे वहां भी सब के लिए कानून जिन्हें  नियम कहा जाता था औरन्याय ही सब को बांधे रखने का मूल आधार हुआ करता था।

मगर आज उसी को तोड़ दिया गया है। ब्रजभूषण शरण सिंह के खिलाफ एफआईआर होजाती है, कोर्ट में यौन दुराचार के मामले में चालान पेश हो जाता है। मगरवह गिरफ्तार नहीं होता। पीड़ित महिला पहलवान अपने ओलम्पिक मेडल, दूसरेराष्ट्रीय पुरस्कार प्रधानमंत्री आवास के बाहर सड़क पर रख आते हैं। मगरकिसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।

उच्च शिक्षण संस्थाओं का तो जो हाल कर रखा है वह किसी से छुपा नहीं है।अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कई बार सुर्खियां बन चुकी है। जेएनयू, जामिया,एएमयू से जब मन नहीं भरा तो बीएचयू में जघन्य कांड कर दिया। यहां भीभाजपा से जुड़े लोग थे। मगर विश्वविध्यालय के कैंपस में कपड़े उतारकरछात्रा का विडियो बनाना और सामूहिक बलात्कार के बाद वे मध्य प्रदेश मेंभाजपा का चुनाव प्रचार करते रहे। सीसीटीवी से पहचान लिए जाने के बाद भीवे दो महीने बाद गिरफ्तार होते हैं। कितनी घटनाएं हैं जहां भाजपा सेजुड़े लोगों पर हीनियस ( जघन्यतम) अपराधों के आरोप लगेहैं। मगर किसी में भी कुछ नहीं हुआ।

बिलकिस बानो मामले से बड़ी शर्म कीबात तो कुछ हो नहीं सकती। गर्भवती से सामूहिक बलात्कार, मां सहित उसकेपरिवार की अन्य महिलाओं बलात्कार फिर सात से ज्यादा लोगों की हत्या,संयुक्त परिवार के इससे अधिक आज तक लापता और उनके अपराधियों को सज़ा सेमाफी। भाजपा द्वारा तिलक, फूलमालाओं से उनका स्वागत सत्कार! डेढ़ साल बाहररहने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें वापस जेल जाने का फैसला सुनाया

है। इतने पर लोग खुश हैं। चलो इतना तो हुआ। उन्हें दो हफ्ते की अभी औरमोहलत दी है जेल आने के लिए। अदालत की भाषा में इसे क्रूर से क्रूर कहाजाता है। जो अदालत में सिद्ध हो चुका है। आरोपी नहीं अपराधी हैं यह।इन्हें तत्काल पकड़कर जेल भेजे जाने की जरूरत थी। मगर इन्हें कहा गया हैकि दो हफ्ते में समर्पण करें।

यह न्याय जो डर गया है उसकी वापसी भारत के लिए जरूरी है। राहुल गांधी नेअपनी दूसरी भारत यात्रा का नाम इसलिए न्याय यात्रा रखा था। राहुल न्याय,कानून का शासन, महिला अधिकार, दलित, पिछड़ा, अल्पसंख्यक, युवा खासतौर सेबेरोजगार युवा सबके लिए समान रूप से लड़ रहे हैं। खास बात यह है कि बिनाडरे। बिना थके। बिना हताश हुए। पहली यात्रा पैदल करीब पांच महीने की पैदलनिकाली। और फिर दूसरी के लिए भी तैयार हो गए। 14 जनवरी से यह भी स्टार्टहै।

मीडिया चाहे दिखाए या नहीं। बताए या नहीं। मगर जनता में और विपक्ष में यहसाफ-साफ मैसेज है कि यह आदमी दूसरों से कुछ अलग है। पहले जैसे सिद्धांतों केलिए लड़ने और अड़ जाने वाले नेता हुआ करते थे कुछ उस मेटल का। मगर अबसिर्फ समझने से काम नहीं चलेगा। सबको एकजुट होकर लड़ना पड़ेगा।

राहुल ने एक धुरी बना दी है। जिसके चारों तरफ विपक्ष इकट्ठा हो सकता है।और वह धुरी कोई राहुल को नेता स्वीकार करने की नहीं है। बल्कि सब विपक्षके नेताओं के खुद को बचाने की है। एक साथ आओ, लड़ो मुकाबला हो सकता है।अलग अलग, दो सीटें मुझे ज्यादा, उसे कम से कुछ नहीं होगा। लालू जी को फिरउस बात को जोर देकर दोहराना चाहिए जो उन्होंने विपक्षी एकता की मुंबईमीटिंग में कही थी कि हमारी सबकी भावना यह है कि दो सीटें चाहे कम मिलजाएं मगर इस बार मोदी को हराना है।

जो हमने शुरू में कहा कि सांच कहें तो मारन धावे! वह इसी बात को लेकर हैकि जब सीट शेयरिंग पर थोड़ा एडजस्टमेंट करने पर कोई कहता है तो विपक्ष केदल उसे अपना विरोधी समझ लेते हैं। सत्ता पक्ष से लड़ने के बदले उसी सेलड़ने लगते हैं। हर दल ज्यादा से ज्यादा सीटें चाहता है। यह सामान्यमानवीय प्रवृति है। मगर इससे आगे की यह बात है कि दो और चार सीटें ज्यादामिलने से कुछ नहीं होगा और लोकसभा जीतोगे नहीं। मीडिया रोज सीट शेयरिंगफंसी जैसी खबरें चलाकर जनता में निराशा पैदा कर रहा है। मजबूत स्वर में सब विपक्षी नेताओं को संयुक्त बयान देना चाहिए कि सीट शेयरिंग कोई मुद्दानहीं है। सब दो चार सीटें कम लेने की बात कर रहे हैं। मुद्दा है मोदी कोहराना। और साथ में यह भी कि क्यों? इसलिए कि बेरोजगारों को नौकरी दी जासके। महंगाई कम की जा सके। निजीकरण पर रोक लग सके। समाज में गैर-बराबरीखत्म हो। सबको न्याय मिले। कानून का शासन फिर स्थापित हो।

समय बहुत कम बचा है। इसमें राहुल की यात्रा भी है। सीट शेयरिंग फाइनल औरउसमें दिखे की सबकी कुर्बानी है जल्दी से जल्दी सबके सामने लाना है।विपक्ष को भाजपा को देखना चाहिए और हो सके तो थोड़ा सीखना भी चाहिए कि किस तरह ठीक लोकसभा चुनाव से पहले वह राम मंदिर का उद्घाटन कर रही है। 22 जनवरी के बाद मोदी इसी मुद्दे को लेकर चुनाव में जाएंगे।

विपक्ष को सिर्फ एक बात समझना है कि अभी नहीं तो कभी नहीं। सीट कोई महारानी लक्ष्मीबाई की झांसी नहीं है जो स्टेंड हो कि मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी! यह समयके हिसाब से खराब स्थिति में चली गई मां का खाना है जिसे पूरे परिवार कोथोड़ा थोड़ा खिलाना है। सब का पेट नहीं भरेगा मगर संतुष्ट सबको करना हैकि बस दिन बदलने वाले हैं। एक बार मेहनत करके तुम सब यह गरीबी दूर कर दोफिर जिसको अपनी प्लेट में जो चाहिए सब मिलेगा।

By शकील अख़्तर

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स के पूर्व राजनीतिक संपादक और ब्यूरो चीफ। कोई 45 वर्षों का पत्रकारिता अनुभव। सन् 1990 से 2000 के कश्मीर के मुश्किल भरे दस वर्षों में कश्मीर के रहते हुए घाटी को कवर किया।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

और पढ़ें

Naya India स्क्रॉल करें