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मैकॉले की झूठी बदनामी

Byशंकर शरण,
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भारत में मैकॉले शब्द मानो गाली की तरह चलता है। यह दोहरी लज्जा की बात है। एक तो, स्वतंत्र होने के 76 वर्ष बाद, अपने कर्मों के लिए, दो सदी पहले के विदेशी को कोसना। जिस चीज को हमारे शासक बदलना, या नया चलाना चाहते हैं, उसे एक झटके में करते रहते हैं। इसलिए दशकों से यहाँ जो भी चल रहा है, उस का संपूर्ण उत्तरदायित्व भारतीयों का है। दूसरी लज्जास्पद बात मैकॉले के बारे में भी झूठी बातें कह कर अपने को होशियार समझना है।

लॉर्ड बाबिंगटन मैकॉले (1800-1859) एक ब्रिटिश राजनीतिज्ञ, कवि और इतिहासकार थे। उन्होंने कानून की शिक्षा ली, किन्तु राजनीति में कदम रखा। पहले तो सांसद बने, किन्तु परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने पर इस्तीफा देकर ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम करना तय किया। तब 1834ई. में भारत आये और गवर्नर-जेनरल लॉर्ड बेंटिक के एक सहायक नियुक्त हुए। 1839 तक भारत में रहे। शिक्षा नीति में परिवर्तन करने, और नयी कानून संहिता, इंडियन पेनल कोड, बनाने में उन का बड़ा योगदान है। किन्तु यहाँ प्रचलित एक मिथ्या बात यह है कि मैकॉले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट में अपने भाषण ‘मिनट ऑन एजुकेशन’ (2 फरवरी 1835) में कहा था: कि “मैंने पूरे भारत का भ्रमण करके इस देश में एक भी भिखमंगा या चोर नहीं देखा। इस देश के लोग ऐसी उच्च नैतिकता रखते हैं जिसे तोड़ना असंभव है जब तक अंग्रेज इस देश की आध्यात्मिक संस्कृति और विरासत रूपी मेरूदंड को तोड़ न दें। इसलिए भारत की पारंपरिक शिक्षा को हटाकर अंग्रेजी शिक्षा जमाना जरूरी है, ताकि भारतीय विदेशी चीजों को बेहतर मानने लगें। इस से उन का आत्मसम्मान खत्म हो जाएगा, और वे वैसे ही झुके हुए शासित राष्ट्र बन जाएंगे जैसा हम चाहते हैं।”

वस्तुतः उस मिनट में ऐसा एक शब्द भी नहीं है! न मैकॉले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट में वह भाषण दिया था। उन्होंने ‘कमिटी ऑफ पब्लिक एजुकेशन’ में यहाँ प्रचलित पारंपरिक शिक्षा को सहायता बंद करने, तथा यूरोपीय शिक्षा देने का आग्रह जरूर किया था। लेकिन उन के तर्क बिलकुल उलटे थे। उन का ‘मिनट’ बिलकुल छोटा, चार पन्ने का दस्तावेज है, जो हमारे राष्ट्रीय संग्रहालय ने भी प्रकाशित किया, और इंटरनेट पर सुलभ है। उस में कुल 36 बिन्दुओं में मैकॉले ने अपनी बातें रखी थी, जिसे गवर्नरजेनरल लॉर्ड बेंटिक ने स्वीकार किया। जो 1835ई. के बाद ब्रिटिश नीति बनी। पर वह भी भारतीयों पर थोपी नहीं गई। शासन ने अपनी ओर से साहित्य प्रकाशन और शिक्षा की दिशा में बदलाव किया। पर भारतीय अपनी शिक्षा स्वयं चलाने और अपने पाठ चुनने के लिए स्वतंत्र थे, और ब्रिटिश राज के अंत तक रहे। शिक्षा अनिवार्य थी ही नहीं।

बल्कि उस कमिटी में आधे अंग्रेज पारंपरिक भारतीय शिक्षा के पक्ष में थे। वे मानते थे कि भारतीयों को सहयोगी बनाए रखने हेतु उचित है कि उन की भाषा, शिक्षा, संस्कृति का सम्मान किया जाए। इस का मैकॉले ने जोरदार विरोध किया। पर मैकॉले के तर्क मानवतावादी और भारतीयों के प्रति सहानुभूति से भरे थे!

उन का सब से पहला तर्क यह था कि ब्रिटिश यहाँ की पारंपरिक शिक्षा को अनुदान देकर सड़ी-गली चीज चला रहे हैं। संस्कृत कॉलेज में दस-बारह वर्ष पढ़कर, सर्टिफिकेट पाकर उस के स्नातक फिर सरकार से ही विनती करते हैं कि कोई नौकरी दें, क्योंकि उस शिक्षा से उन्हॆं कोई काम या सम्मान नहीं मिलता। यानी वे उस शिक्षा को अपने लिए लाभकर नहीं पाते।

इस प्रकार, मैकॉले का प्रमुख तर्क यह था कि संस्कृत और फारसी-अरबी में कोई ज्ञान नहीं, बल्कि बेकार के अंधविश्वास हैं। पर मैकॉले ने सचाई से यह भी कहा कि उन्हें संस्कृत या फारसी-अरबी नहीं आती। किन्तु कुछ अनुवाद पढ़ने तथा यूरोपीय विद्वानों से मिली जानकारी के आधार पर उन्होंने दावा किया कि तमाम संस्कृत-फारसी पुस्तकों में कुल मिलाकर उतनी भी जानकारी नहीं, जितनी इंग्लैंड के किसी प्राथमिक स्कूल की लाइब्रेरी की संक्षिप्त अंग्रेजी पुस्तकों में है। यहाँ तक कि, ‘‘भारत और अरब के संपूर्ण देसी साहित्य से अधिक मूल्यवान किसी अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय में एक अलमारी के एक खाने में रखी पुस्तकें हैं।’’

किसी बेकार हो चुके स्वास्थ्य-गृह या जहाज-घाट का उदाहरण देकर मैकॉले ने पूछा कि जिस संरचना से अब कोई काम न हो रहा हो, उसे अनुदान देने की क्या तुक है? पारंपरिक भारतीय शिक्षा वैसी ही बेकार है। इसलिए भारतीयों के बौद्धिक विकास के लिए जरूरी है कि उन्हें यूरोपीय ज्ञान और अंग्रेजी शिक्षा दी जाए। मैकॉले के अनुसार भारतीय भाषाएँ इतनी ज्ञान विहीन और कमजोर हैं, जिन्हें बाहर से समृद्ध किए बिना उस में मूल्यवान चीजें लाना आसान नहीं है। अतः जो लोग अपनी मातृभाषा में कुछ जानने-सीखने की स्थिति में ही नहीं, उन्हें अवश्य ही कोई विदेशी समृद्ध भाषा सिखानी चाहिए।

मैकॉले ने ऐतिहासिक अनुभवों का उदाहरण भी दिया। कि पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में अनेक यूरोपीय देशों की ऐसी ही हालत थी। उन्हें ग्रीक रोमन, यानी विदेशी साहित्य ने ही शिक्षित किया। तब प्लटो से लेकर सिसेरो तक महान ज्ञानियों का ज्ञान विदेशी भाषाओं में था। यदि तब यूरोपीय लोग अपनी देसी एंग्लो-सैक्सन और नॉर्मन फ्रेंच की मामूली पुस्तिकाओं तक ही सीमित रहते, तो इंग्लैंड वह नहीं बनता जो बना।

फिर, मैकॉले ने यह भी देखा कि भारतीय भी संस्कृत और फारसी-अरबी के बदले अंग्रेजी ही पढ़ना चाहते हैं। उन्होंने आँकड़ों से बताया कि कंपनी सरकार द्वारा संस्कृत, फारसी-अरबी पुस्तकें छाप कर सुलभ करने पर भी उसे लोग न खरीदते हैं, न मुफ्त बाँटने पर भी पढ़ते हैं। वह गोदामों में पड़ी बेकार होती रहती है। जबकि अंग्रेजी पुस्तकें लोग खरीद कर पढ़ रहे हैं, जिस से छापने वाली संस्था मुनाफा भी कमाती है। इस प्रकार, सरकार लोगों पर ऐसी देसी शिक्षा लाद रही है जो उन्हें पसंद नहीं, जबकि उन्हें जो पसंद है उसी को बाधित कर रही है। उदाहरण देते हुए मैकॉले ने कहा कि चावल खाने, या सर्दी में गर्म कपड़े पहनने के लिए किसी को प्रोत्साहन देने की तो जरूरत नहीं पड़ती। सो, यदि लोगों को संस्कृत और फारसी-अरबी में पढ़ना अच्छा लगता तो उन्हें इस के लिए सरकारी अनुदान देने की जरूरत न होती। मैकॉले ने दलील दी: ‘‘जहाँ सत्य के प्रचार के लिए भी रिश्वत या ईनाम नहीं देना चाहिए, वहाँ सरकार झूठी किताबें और झूठे दर्शन फैलाने में धन नष्ट कर रही है।’’ इस गलत नीति से बेकार, निकम्मे लोग बढ़ेंगे जो सरकार के लिए सिरदर्द ही बनेंगे, क्योंकि उन के पास कोई काम न होगा।

व्यवहारिक आपत्तियों का उत्तर देते हुए मैकॉले ने कहा कि चूँकि जल्द ही नई कानूनी संहिता (पेनल कोड) बनने जा रही है, इसलिए चालू हिन्दू और इस्लामी कानून व्यर्थ हो जाएंगे। अतः उस हेतु भी संस्कृत, फारसी-अरबी जानने की जरूरत खत्म हो जाएगी। जहाँ तक यहाँ पवित्र मानी जाने वाली धर्म पुस्तकों की बात है तो उस में केवल झूठी, अंधविश्वासपूर्ण बातें भरी हैं। उन झूठे इतिहास, झूठे विज्ञान, झूठे धर्म, आदि पढ़ाने में सरकार को योगदान नहीं देना चाहिए। तटस्थ रहना चाहिए, जैसे वह क्रिश्चियन मिशनरियों को भी भारत में मनचाहे धर्मांतरण कराने की इजाजत नहीं देती।

साथ ही, मैकॉले ने यह भी दावा किया कि भारतीयों को अंग्रेजी सीखने में कठिनाई नहीं है। अतः यह कहना गलत है कि एक विजातीय भाषा में वे केवल जैसे-तैसे साक्षर से अधिक कुछ न बन सकेंगे, और उन की शिक्षा बाधित होगी। मैकॉले ने लिखा कि शासन से जुड़े उच्चवर्गीय देसी लोगों की भाषा तो अंग्रेजी ही है। उन लोगों की अंग्रेजी कमजोर नहीं है, बल्कि ‘‘अनेक हिन्दुओं की अंग्रेजी इस कमिटी के सदस्यों जैसी ही अच्छी है।’’

इन सब तर्कों के बाद वह बात आती है जो सब से अधिक प्रसिद्ध हुई है। मैकॉले ने कहा कि संपूर्ण भारतीय जनता को शिक्षा देना सरकार के लिए संभव नहीं। उतने संसाधन नहीं हैं। इसलिए, ‘‘हमें ऐसा वर्ग तैयार करना चाहिए जो हमारे और शासित करोड़ों लोगों के बीच अनुवादक का काम कर सके – ऐसा वर्ग जो रक्त और रंग में तो भारतीय हो, मगर अपनी रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धि से अंग्रेज हो। उस वर्ग पर यह काम छोड़ दें कि वह पश्चिमी ज्ञान से भारतीय भाषाओं और साहित्य को समृद्ध करे, जो समय के साथ संपूर्ण भारतीय जनगण में ज्ञान का प्रसार कर सके।’’ अतः, संस्कृत और फारसी-अरबी शिक्षा पर सरकार जो खर्च कर रही है, उसे बंद कर उस राशि से भारत के बड़े शहरों में अंग्रेजी स्कूल खोले जाने चाहिए। यही मैकॉले का निर्णायक प्रस्ताव था।

अंत में मैकॉले ने यह भी जोड़ा कि यदि समिति उन की बात मानती है, तब तो वे आगे शिक्षा के लिए काम करेंगे। किन्तु यदि समिति ने भारत की देसी शिक्षा ही चलाते रहना तय किया, तो वे समिति से त्यागपत्र दे देंगे। अपनी बातों पर मैकॉले में इतनी निष्ठा थी।

अंततः गवर्नरजेनरल ने मैकॉले के तर्क ही स्वीकार किये। इस प्रकार भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार द्वारा उस अंग्रेजी शिक्षा को प्रोत्साहन आरंभ हुआ। यद्यपि उस में जल्द सुधार भी हुए। कंपनी सरकार और बाद में सीधे ब्रिटिश सरकार की नीति भी मिली-जुली रही। उस ने अंग्रेजी शिक्षा के साथ-साथ देसी भारतीय शिक्षा को भी अनुदान देने की नीति रखी। यह अन्य बात है कि अंग्रेजी शिक्षा ही प्रभावशाली होती गई। भारतीय ज्ञान, चिंतन, और साहित्य का औपचारिक शिक्षा-प्रणाली में ह्रास होता चला गया। पर इस के लिए आज भी मैकॉले को दोष देकर हमारा रोना-गाना हास्यास्पद है।‌

By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और स्तंभकार। राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। कई पुस्तकें प्रकाशित, जिन में कुछ महत्वपूर्ण हैं: 'भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहासलेखन', 'गाँधी अहिंसा और राजनीति', 'इस्लाम और कम्युनिज्म: तीन चेतावनियाँ', और 'संघ परिवार की राजनीति: एक हिन्दू आलोचना'।

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