अभी पश्चिम बंगाल में जो घटनाक्रम चल रहा है उसे देख कर कह सकते हैं कि ममता बनर्जी अपनी ही बनाई दवाई के प्रयोग झेल रही हैं। उन्होंने पूरी जिंदगी जिस तरह की राजनीति की उसी का प्रतिफल उनको मिल रहा है। वे जिस पार्टी में रहीं और अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाया उसी कांग्रेस पार्टी को तोड़ कर अपनी अलग पार्टी बनाई। कांग्रेस के नेताओं को साथ लेकर कांग्रेस को समाप्त करने की साजिश रची।
पश्चिम बंगाल की 15 साल तक मुख्यमंत्री रहीं ममता बनर्जी और उनकी पार्टी को किसकी नजर लगी है? पश्चिम बंगाल के तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने तो पहले ही कह दिया था, ‘आपको भगवान राम का श्राप लग गया है’। भाजपा नेताओं का कहना है कि जनवरी 2024 में जिस दिन अयोध्या में भव्य श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का उद्घाटन होना था उस दिन ममता बनर्जी ने कोलकाता में इसके विरोध में जुलूस निकाला था। उसके बाद से ही उनके बुरे दिन की शुरुआत हो गई थी। राजनीति में ऐसी प्रतीकात्मक चीजों का अपना महत्व है। परंतु यह वास्तविकता है कि चार मई को आए चुनाव नतीजों में ममता बनर्जी की पार्टी बुरी तरह से पराजित हुई। उसके बाद पार्टी के टूटने और बिखरने का सिलसिला शुरू हुआ। इसके साथ ही कानून का शिकंजा भी कसने लगा। पहले उनकी पार्टी के 60 विधायक अलग हुए। उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में अलग गुट बना लिया, जिसे विधानसभा स्पीकर ने मान्यता भी दे दी। उसके बाद 20 सांसद अलग होकर त्रिपुरा की नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल में हो गए।
पार्टी के सांसदों और विधायकों का टूटना एक शुरुआत थी। उसके बाद कानूनी मुश्किलों का दौर शुरू हुआ। उनकी पार्टी हाथ से निकली तो पार्टी के सैकड़ों करोड़ रुपए वाले खातों पर भी पाबंदी लगी और कार्यालय भी हाथ से निकला। उसके बाद असली झटका ममता बनर्जी को अब लगा है, जब चुनाव आयोग ने उनसे उनकी पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह छीन लिया है। पिछले एक चौथाई सदी से ज्यादा समय से ममता बनर्जी जिस तृणमूल कांग्रेस और दो पत्तियों के चुनाव चिन्ह पर राजनीति कर रही थीं, उसकी जगह अब उनको ममता टीएमसी का नाम और फुटबॉल खिलाड़ी का चुनाव चिन्ह मिला है। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के लोग कह सकते हैं कि यह कानूनी और तकनीकी मामला है, जिसमें चुनाव आयोग ने पक्षपात किया है। यह भी कह सकते हैं कि वे सुप्रीम कोर्ट जाएंगे और पार्टी का नाम व चुनाव चिन्ह हासिल करने का प्रयास करेंगे।
हो सकता है कि यह कानूनी और तकनीकी पहलू हो लेकिन ममता बनर्जी उपचुनाव में जिसे उम्मीदवार बनाएं वह चुनाव मैदान से हट जाए, इसे क्या कहेंगे? यह काम तो चुनाव आयोग नहीं करा रहा है! यह तो स्पष्ट रूप से राजनीतिक शक्ति समाप्त होने या बहुत कम हो जाने का संकेत है। पता नहीं ममता बनर्जी, उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी और दूसरे समर्थक इस सचाई को क्यों नहीं देख पा रहे हैं? यह चार महीने में दूसरा मौका है, जब उनका उम्मीदवार मैदान छोड़ कर हटा है। चार मई को चुनाव नतीजे आने के बाद पहली घटना फालता सीट पर हुई थी, जहां 21 मई को चुनाव हुआ। वहां से ममता की पार्टी का उम्मीदवार जहांगीर खान मैदान छोड़ कर हट गया था। और अब नंदीग्राम की सीट पर उपचुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने मैदान से हटने की घोषणा की है।
यह किसी भी राजनीतिक दल के लिए आत्ममंथन की बात है कि लोग उस दल के नाम और चुनाव चिन्ह पर लड़ना नहीं चाहते हैं। पश्चिम बंगाल जैसे राजनीतिक रूप से जागरूक प्रदेश में, जहां विधानसभा चुनाव की टिकट हासिल करने के लिए लोग क्या क्या जतन करते हैं, वहां अगर ममता बनर्जी की पार्टी की टिकट लोग छोड़ रहे हैं तो इसका अर्थ है कि पार्टी का जमीनी आधार बहुत कमजोर हो गया है। उनको ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के साथ अपना भविष्य नहीं दिख रहा है। यह किसी को नहीं भूलना चाहिए कि नेताओं से बेहतर राजनीतिक हवा का रुख कोई नहीं भांप सकता है और नेता हमेशा अपना भविष्य देख कर ही निर्णय करते हैं। असल में ममता बनर्जी की पार्टी की चमक दमक पूरी तरह से समाप्त हो गई है। राजनीतिक आधार सिमट गया है और नेताओं को उनमें अपना भविष्य नहीं दिख रहा है।
इसका मुख्य कारण यह नहीं है कि इस बार उनकी पार्टी चुनाव हार गई। पार्टियां चुनाव हारती और जीतती रहती हैं। मुख्य कारण यह है कि ममता बनर्जी ने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को अपना उत्तराधिकारी बनाया है और ऐसे खराब नतीजे के बाद भी वे इस फैसले पर पुनर्विचार नहीं कर रही हैं। चार मई के नतीजों के बाद भी उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को अभिषेक के सम्मान में खड़ा करके ताली बजवाई थी। इससे भी नेता आहत हुए थे और माना जाता है कि उसी समय बहुत से नेताओं ने पार्टी छोड़ने का मन बना लिया था। पहले भी अभिषेक बनर्जी की वजह से तृणमूल कांग्रेस के बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़ी थी। खुद सुवेंदु अधिकारी उनकी वजह से पार्टी छोड़ गए थे। मुकुल रॉय ने भी अभिषेक के कारण पार्टी छोड़ी थी। परंतु ममता बनर्जी ने इस मामले में आंखों पर पट्टी बांध रखी है।
बहरहाल, अभी पश्चिम बंगाल में जो घटनाक्रम चल रहा है उसे देख कर कह सकते हैं कि ममता बनर्जी अपनी ही बनाई दवाई के प्रयोग झेल रही हैं। उन्होंने पूरी जिंदगी जिस तरह की राजनीति की उसी का प्रतिफल उनको मिल रहा है। वे जिस पार्टी में रहीं और अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाया उसी कांग्रेस पार्टी को तोड़ कर अपनी अलग पार्टी बनाई। कांग्रेस के नेताओं को साथ लेकर कांग्रेस को समाप्त करने की साजिश रची। बाद में जब जरुरत हुई तब कभी भाजपा के साथ तो कभी कांग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़ा और अपनी सुविधा के हिसाब से उनको छोड़ दिया। केंद्र में भाजपा की सरकार में भी मंत्री रहीं और कांग्रेस की सरकार में भी। इसका अर्थ है कि उन्होंने पूरे राजनीतिक जीवन में कभी भी न तो वैचारिक प्रतिबद्धता दिखाई और न निजी निष्ठा व विश्वसनीयता का ध्यान रखा। पार्टियों और व्यक्तियों दोनों के साथ उनका व्यवहार हमेशा अविश्वसनीय और इस्तेमाल करके छोड़ने वाला रहा। ध्यान रहे ममता बनर्जी का राजनीतिक पुनर्जन्म अटल बिहारी वाजपेयी की शरण में जाने से हुआ था। लेकिन उनकी पार्टी भाजपा को भी ममता ने मुस्लिम तुष्टिकरण के कारण नहीं बख्शा।
यह भी वास्तविकता है कि उनकी पार्टी का गठन चिटफंड की दो कंपनियों रोज वैली और शारदा की मदद से हुआ था। लेकिन जब वे सत्ता में आ गईं तो उसके बाद रोज वैली के प्रमोटर गौतम कुंडू और शारदा चिटफंड के सुदीप्तो सेन दोनों जेल गए और अभी तक जेल में बंद हैं। उपयोगिता समाप्त होते ही अपने नजदीकी लोगों से मुंह फेर लेने का जैसा रिकॉर्ड ममता बनर्जी का है वैसा ही शायद ही किसी और नेता का होगा। एकाध अपवाद छोड़ दें तो वे शायद ही किसी नेता के साथ संकट में खड़ी हुईं। किसी नेता के साथ तभी तक खड़ी हुईं, जब तक उस नेता का राजनीतिक महत्व था या उपयोगिता थी। अब उनकी पार्टी के नेता उनके साथ भी ऐसा ही बरताव कर रहे हैं। उनको लग रहा है कि उनके लिए ममता बनर्जी या उनकी पार्टी की कोई उपयोगिता नहीं है।
तृणमूल कांग्रेस के नेताओं, विधायकों, सांसदों आदि के मन में क्या चल रहा है, इस बारे में कोई व्यक्ति सबसे प्रामाणिक तरीके से जानकारी रख रहा था वह मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी हैं। इसका कारण यह है कि तृणमूल के नेता उनके साथ ज्यादा सहज और आत्मीय रिश्ता रखते थे। सुवेंदु अधिकारी जब भाजपा में शामिल हो गए उसके बाद भी उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के साथ अपना संबंध विच्छेद नहीं किया। महुआ मोइत्रा जैसे कई नेताओं ने बाद में कहा कि जब भी जरुरत पड़ी तो उनके साथ सुवेंदु अधिकारी खड़े रहे। तभी उनको अनुमान था कि तृणमूल कांग्रेस के अंदर क्या चल रहा है। उनको यह भी अनुमान था कि एक बार ममता बनर्जी चुनाव हारीं तो सारे नेता उनका साथ छोड़ेंगे। क्योंकि नेता उनके संपर्क में थे और उनको अपनी व्यथा सुनाते थे।
सुवेंदु अधिकारी एक तरफ भारतीय जनता पार्टी को शक्तिशाली बनाने और चुनाव जीतने के उपाय कर रहे थे तो दूसरी ओर ममता बनर्जी की पार्टी को कमजोर करने का रास्ता भी बना रहे थे। उनके नेतृत्व में भाजपा ने 207 सीटों का प्रचंड बहुमत हासिल किया। परंतु वे इतने पर नहीं रूके। उन्होंने ममता बनर्जी की पार्टी के विधायकों व सांसदों की नाराजगी और परेशानी को भाजपा की राजनीतिक पूंजी में बदला। यह उनका राजनीतिक कौशल है कि आज पश्चिम बंगाल में मुख्य विपक्षी पार्टी भी उनका समर्थन करने वाला है और केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार को 20 सांसदों का अतिरिक्त समर्थन मिला है। भाजपा को इतना शक्तिशाली बनाने के बाद भी वे दो सीटों के उपचुनाव को लेकर जैसा रणनीतिक तानाबाना बुन रहे हैं उससे स्पष्ट दिख रहा है कि वे एक जीत से आश्वस्त होकर बैठ जाने और सत्ता के आनंद में डूब जाने वाले नेता नहीं हैं। वे विजय की निरंतरता को बनाए रखने वाले नेता हैं। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)
Leave a comment
You must be logged in to post a comment.



