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जब ओटीटी का दर्शक थिएटर पहुंचा: ‘मिर्ज़ापुर: द मूवी’

मिर्ज़ापुर: द मूवी’  देखकर आप यह कह सकते है कि वाह, क्या बिल्कुल नई कहानी है! बल्कि यह ऐसी फ़िल्म है जिसे देखने के लिए दर्शक पहले से कहानी जानता है, किरदारों को पहचानता है, उनके रिश्तों का इतिहास जानता है और कई संवाद तो फ़िल्म के पर्दे पर आने से पहले ही उसके भीतर चलने लगते हैं। यही इसकी ताक़त है। और यही इसकी सीमा भी। फ़िल्म ने रिलीज़ के पहले ही सप्ताह में लगभग डेढ़ सौ करोड़ का भारत में नेट कलेक्शन पार कर लिया है। यह बहुत महत्वपूर्ण संकेत है।

सिने-सोहबत

सिनेमा में एक बात हमेशा से दिलचस्प रही है कि दर्शक आख़िर देखने क्या आता है? कहानी? स्टार? हीरो-हीरोइन? या फिर वह दुनिया जिससे वह पहले ही प्यार कर चुका है?

‘मिर्ज़ापुर: द मूवी’ ने इस सवाल को एक नया जवाब दिया है। कभी-कभी दर्शक कहानी देखने नहीं, अपनी दुनिया से दोबारा मिलने थिएटर जाता है। और शायद यही इस फ़िल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि है। चार सितंबर को रिलीज़ हुई ‘मिर्ज़ापुर: द मूवी’ कोई ऐसी फ़िल्म नहीं है, जिसे देखकर आप यह कहें कि वाह, क्या बिल्कुल नई कहानी है! बल्कि यह ऐसी फ़िल्म है जिसे देखने के लिए दर्शक पहले से कहानी जानता है, किरदारों को पहचानता है, उनके रिश्तों का इतिहास जानता है और कई संवाद तो फ़िल्म के पर्दे पर आने से पहले ही उसके भीतर चलने लगते हैं। यही इसकी ताक़त है। और यही इसकी सीमा भी।

फ़िल्म ने रिलीज़ के पहले ही सप्ताह में लगभग डेढ़ सौ करोड़ का भारत में नेट कलेक्शन पार करने के क़रीब पहुंचते हुए दुनिया भर में दो सौ करोड़ से अधिक का कारोबार कर लिया है। यानी बात अब सिर्फ़ एक लोकप्रिय ओटीटी शो के प्रशंसकों की नहीं रह गई है। यह एक संकेत है। एक बहुत महत्वपूर्ण संकेत।

कुछ साल पहले तक हम मानकर चलते थे कि फ़िल्म थिएटर में चलती है और वेब सीरीज़ घर में। फ़िल्म के लिए टिकट ख़रीदनी पड़ती है और वेब सीरीज़ के लिए सब्सक्रिप्शन। फ़िल्म के लिए शुक्रवार का इंतज़ार होता है और वेब सीरीज़ के लिए वीकेंड बिंज। लेकिन ओटीटी ने इस समीकरण को धीरे-धीरे उलट दिया।

‘मिर्ज़ापुर’, ‘सेक्रेड गेम्स’, ‘पाताल लोक’, ‘द फ़ैमिली मैन’, ‘पंचायत’, ‘स्कैम 1992’, ‘स्पेशल ऑप्स’ जैसी सीरीज़ ने सिर्फ़ कहानियां नहीं सुनाईं। उन्होंने अपने-अपने दर्शक समुदाय बनाए। और समुदाय बन जाना किसी भी एंटरटेनमेंट प्रॉपर्टी की सबसे बड़ी पूंजी है।

‘मिर्ज़ापुर’ के साथ यह बात शायद सबसे साफ़ दिखाई देती है। दर्शक ने इस दुनिया के साथ लगभग आठ साल बिताए हैं। उसने कालीन भैया को सिर्फ़ एक किरदार की तरह नहीं देखा। उसने उसकी भाषा सुनी, उसकी चाल पहचानी, उसकी चुप्पी का मतलब समझा। उसने गुड्डू, गोलू, मुन्ना, बीना, त्यागी परिवार और बाक़ी किरदारों के साथ एक लम्बा भावनात्मक रिश्ता बनाया। इसलिए जब वही लोग बड़े पर्दे पर लौटते हैं तो दर्शक के लिए यह कोई नई फ़िल्म नहीं रह जाती। यह घर वापसी जैसी हो जाती है। और यहीं ‘मिर्ज़ापुर: द मूवी’ का असली खेल शुरू होता है।

अगर इसे एक स्वतंत्र फ़िल्म की तरह देखा जाए तो इसकी कई कमियां साफ़ दिखाई देती हैं। कहानी को आगे बढ़ाने की बजाय फ़िल्म कई जगह अपने पुराने फ़ैन-बेस को संतुष्ट करने में अधिक दिलचस्पी दिखाती है। कई दृश्य ऐसे हैं, जिनका पूरा मज़ा तभी आता है जब आपको पिछले सीज़न्स की पूरी याद हो। फ़िल्म की लम्बाई भी कई जगह महसूस होती है।

लेकिन क्या यह कमी है? हां।

क्या इससे फ़िल्म का बॉक्स ऑफ़िस कम हो गया? बिल्कुल नहीं। क्योंकि ‘मिर्ज़ापुर’ का असली टिकट ख़रीदार कोई अनजान दर्शक नहीं है। वह समर्पित दर्शक है। वह वही दर्शक है जो कहता है, “भाई, जो है वही चाहिए। बस बड़े पर्दे पर चाहिए”। और इसलिए कालीन भैया की वापसी इतनी महत्वपूर्ण है। पंकज त्रिपाठी का किरदार इस यूनिवर्स का भावनात्मक और नाटकीय आधार बना हुआ है। आलोचनाओं में भी यह बात सामने आई है कि फ़िल्म को सबसे ज़्यादा ऊर्जा पुराने किरदारों की वापसी से मिलती है।

फिर अली फ़ज़ल का गुड्डू है। रवि किशन का बब्बन बबुआ है। और मुन्ना भैया का लौटना तो अपने आप में इस फ़्रेंचाइज़ी की फ़ैन-सर्विस वाली मानसिकता को बयान करता है। दर्शक जानता है कि कौन मर चुका है। लेकिन उसे यह भी पता है कि मुन्ना भैया को देखे बिना ‘मिर्ज़ापुर’ अधूरा लगता है। सिनेमा कभी-कभी तर्क से ज़्यादा स्मृति पर चलता है।

हॉलीवुड ने बहुत पहले ही ‘परिचय’ की ताक़त को पहचान लिया था। मार्वल हो, ‘स्टार वॉर्स’ हो, ‘हैरी पॉटर’ हो या ‘फ़ास्ट एंड फ़्यूरियस’, दर्शक सिर्फ़ नई कहानी के लिए टिकट नहीं ख़रीदता। वह उस दुनिया में लौटने के लिए टिकट ख़रीदता है जिसे वह अपना मान चुका है। भारत में लंब समय तक हमारी फ़िल्मों का फ़्रेंचाइज़ी मॉडल मुख्यतः स्टार-आधारित रहा। सलमान की फ़िल्म है तो सलमान के लिए टिकट। अक्षय की फ़िल्म है तो अक्षय के लिए। शाहरुख़ हैं तो शाहरुख़।

लेकिन ओटीटी ने एक नया मॉडल पैदा किया है और वो है किरदार-आधारित स्टारडम। अब स्टार सिर्फ़ अभिनेता नहीं है। कभी-कभी स्टार उसका किरदार है।

कालीन भैया एक ब्रैंड हैं। मुन्ना भैया एक ब्रैंड हैं। हाथीराम चौधरी एक ब्रैंड हैं।

श्रीकांत तिवारी एक ब्रैंड हैं। प्रह्लाद चा एक ब्रैंड हैं। जितेंद्र कुमार का अभिषेक त्रिपाठी एक ब्रैंड है। यह बहुत बड़ा बदलाव है।

क्योंकि एक सफल वेब सीरीज़ अपने दर्शक को सिर्फ़ कहानी नहीं देती, उसे परिचय देती है। और परिचय बहुत लत लगाने वाली चीज़ है। हम उसी मोहल्ले में वापस जाना चाहते हैं। उन्हीं लोगों से मिलना चाहते हैं। उनकी अगली मुसीबत देखना चाहते हैं। यहां तक कि हमें पता होता है कि आगे क्या होने वाला है, फिर भी हम देखना चाहते हैं कि इस बार वह कैसे होगा। तो अब कौन थिएटर जा सकता है? यही सबसे बड़ा सवाल है।

अगर ‘मिर्ज़ापुर’ ओटीटी से थिएटर का रास्ता बना सकता है, तो अगली बारी किनकी हो सकती है? मेरी सूची काफ़ी लंबी है। ‘द फ़ैमिली मैन’ सबसे स्पष्ट उम्मीदवार है। श्रीकांत तिवारी को बड़े पर्दे पर देखना अपने आप में एक सिनेमाई प्रस्ताव है। मनोज बाजपेयी का किरदार, उसका परिवार, उसका ख़ुफ़िया एजेंसी वाला दूसरा जीवन, इस यूनिवर्स में कॉमेडी, भावनाएं, ऐक्शन और जियो पॉलिटिक्स सब कुछ है।

फिर है ‘पाताल लोक’। हाथीराम चौधरी को एक फ़ीचर फ़िल्म में किसी बड़े जांच-पड़ताल के मामले में भेजना अपने आप में एक मज़बूत सिनेमाई विचार हो सकता है। ख़ासकर इसलिए कि ‘पाताल लोक’ का यूनिवर्स केवल अपराध नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक परतों को भी तलाशता है।

‘पंचायत’ शायद सबसे दिलचस्प संभावना है।क्योंकि यहां गोली नहीं चलेगी। गाड़ी नहीं उड़ेगी। कोई गद्दी नहीं छीनी जाएगी। फिर भी लोग टिकट ख़रीद सकते हैं। क्योंकि फुलेरा अब सिर्फ़ एक काल्पनिक गांव नहीं रहा। वह दर्शकों के लिए एक परिचित जगह बन चुका है। अभिषेक, प्रधान जी, मंजू देवी, बनराकस, प्रह्लाद चा, ये सभी लोग अब हमारे परिचित हैं। एक ‘पंचायत: द मूवी’ शायद इस बात की परीक्षा होगी कि क्या अपनापन भी सिनेमाई आयोजन बन सकता है? मुझे लगता है- बिल्कुल।

फिर ‘स्पेशल ऑप्स’ है। ‘सेक्रेड गेम्स’ का यूनिवर्स तो अपने आप में सिनेमाई संभावनाओं से भरा पड़ा है, हालांकि वहां कहानी को किस रूप में आगे ले जाया जाए, यह रचनात्मक चुनौती होगी। ‘स्कैम 1992’ को भी एक अलग तरह की सिनेमाई दुनिया में सोचा जा सकता है। हालांकि वह काल्पनिक फ़्रेंचाइज़ी से ज़्यादा ऐतिहासिक कहानी है। ‘गुल्लक’ एक और दिलचस्प संभावना है। और फिर ‘एस्पिरेंट्स’, ‘कोटा फ़ैक्ट्री’, ‘क्रिमिनल जस्टिस’, ‘मेड इन हेवन’, ‘दिल्ली क्राइम’ जैसे यूनिवर्स हैं, जिनके दर्शक अपने-अपने तरीक़े से बेहद प्रतिबद्ध हैं।

ऐसी सूची पर चर्चा अब वास्तव में शुरू हो चुकी है; ‘मिर्ज़ापुर’ की सिनेमाई सफलता के बाद कई व्यापारिक और मनोरंजन विश्लेषकों ने ‘द फ़ैमिली मैन’, ‘पाताल लोक’, ‘सेक्रेड गेम्स’, ‘स्पेशल ऑप्स’, ‘गुल्लक’, ‘स्कैम 1992’ और दूसरे ओटीटी फ्रेंचाइज़ी के बड़े पर्दे पर आने की संभावनाओं पर सवाल उठाए हैं।

लेकिन असली अवसर कहां है? असली अवसर सिर्फ़ निर्माताओं के लिए नहीं है।

सभी के लिए है। अभिनेताओं के लिए। लेखकों के लिए। निर्देशकों के लिए। ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स के लिए। थिएटर्स के लिए। और सबसे महत्वपूर्ण, दर्शकों के लिए। क्योंकि अब एक लेखक को यह सोचने की ज़रूरत नहीं कि उसकी कहानी सिर्फ़ दो घंटे की फ़िल्म है या आठ घंटे की सीरीज़। वह एक दुनिया बना सकता है। उस दुनिया का पहला सीज़न हो सकता है। दूसरा सीज़न हो सकता है। फिर स्पिन-ऑफ़ हो सकता है। फिर सिनेमाई फ़िल्म। फिर वापस सीरीज़।

‘मिर्ज़ापुर’ ने यह संभावना बहुत स्पष्ट कर दी है। और इसका आर्थिक महत्व भी कम नहीं है। अगर एक स्ट्रीमिंग फ़्रेंचाइज़ी का वफ़ादार दर्शक लाखों लोगों को थिएटर तक खींच सकता है तो निर्माताओं के लिए यह एक नया कारोबारी मॉडल है। ओटीटी दर्शक को थिएटर दर्शक में बदलना कठिन है। लेकिन असंभव नहीं।

शर्त सिर्फ़ इतनी है कि दर्शक को कुछ ऐसा दिया जाए, जिसके लिए वह घर से बाहर निकले। लेकिन यहां एक सावधानी भी ज़रूरी है। मिर्ज़ापुर की सफलता का मतलब यह नहीं कि हर लोकप्रिय वेब सीरीज़ को फ़िल्म बना दिया जाए। नहीं। किसी सीरीज़ के पास सिर्फ़ लोकप्रिय किरदार होना पर्याप्त नहीं है। उसके पास सिनेमाई वजह भी होनी चाहिए। थिएटर में जाने का अनुभव घर पर एपिसोड देखने से अलग होना चाहिए। बड़े पर्दे पर विस्तार हो। भावना हो। आयोजन हो। कुछ ऐसा हो कि दर्शक कहे- “यह मैं घर पर बाद में नहीं देखूंगा। इसे अभी दोस्तों के साथ थिएटर में देखना है”।

‘मिर्ज़ापुर’ में हिंसा, एक्शन, हास्य और परिचित किरदारों ने यह तात्कालिकता पैदा की है। दूसरी तरफ़ ‘पंचायत’ को शायद अपनी सिनेमाई भाषा अलग बनानी होगी। ‘द फ़ैमिली मैन’ को विस्तार बढ़ाना होगा। ‘पाताल लोक’ को रहस्य और सामाजिक नाटक को बड़े कैनवस पर रूपांतरित करना होगा।

यानी एक सफल वेब सीरीज़ और एक सफल सिनेमाई फ़िल्म के बीच रूपांतरण नहीं, कायापलट होना चाहिए। और यही इस समय की सबसे अच्छी ख़बर है। कई वर्षों तक हम सुनते रहे कि ओटीटी सिनेमा को ख़त्म कर देगा। अब शायद कहानी कुछ और है। ओटीटी ने सिनेमा को ख़त्म नहीं किया। उसने सिनेमा के लिए नए दर्शक और नए किरदार पैदा किए। और ‘मिर्ज़ापुर: द मूवी’ ने उस दर्शक को पहली बार बड़े पैमाने पर टिकट खिड़की तक पहुंचाकर दिखाया है।

यह सिर्फ़ ‘मिर्ज़ापुर’ की जीत नहीं है। यह उस दर्शक की जीत है, जिसने पिछले कुछ वर्षों में अपना मनोरंजन-स्वाद ख़ुद बनाया है। वह दर्शक अब सिर्फ़ “कौन हीरो है”? नहीं पूछता। वह पूछता है- “कहानी कहां की है?” “इस दुनिया में कौन-कौन है?” “अगला क्या होगा?” और सबसे महत्वपूर्ण- “क्या मैं फिर से वहां जा सकता हूं?” अगर जवाब हां है, तो दर्शक लौटेगा।

कभी ओटीटी पर। कभी थिएटर में। कभी दोनों जगह।

और शायद आने वाले वर्षों का हिंदी मनोरंजन इसी नए रिश्ते पर खड़ा होगा, दर्शक और स्टार के बीच नहीं, दर्शक और यूनिवर्स के बीच।

‘मिर्ज़ापुर: द मूवी’ की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है कि उसने एक वेब सीरीज़ को फ़िल्म में नहीं बदला। उसने एक फ़ैन कम्युनिटी को सिनेमाई दर्शक में बदलकर दिखाया है। और इस प्रयोग की सफलता के बाद निर्माताओं के सामने अब एक बहुत बड़ा सवाल नहीं, बल्कि बहुत बड़ी संभावना है।

बहरहाल, ‘मिर्ज़ापुर: द मूवी’ आपके नज़दीकी सिनेमाघरों में है। देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़”के होस्ट हैं।)

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