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रसोई से निकला लीजेंड: ‘टोनी’

टोनी’ आइकोनिक शेफ़ एंथनी बॉर्डेन की ही लिखी किताब ‘किचन कॉन्फिडेंशियल’ के शुरुआती हिस्सों से प्रेरित है, लेकिन यह दस्तावेजी पुनर्निर्माण नहीं है। जॉनसन और उनके सह-लेखकों ने बॉर्डेन के कई अनुभवों को गर्मी के एक ही मौसम में समेट दिया है। कुछ पात्र और घटनाएं वास्तविकता से प्रेरित हैं, लेकिन फ़िल्म ने उन्हें नाटकीय ज़रुरत के मुताबिक बदला है।

किसी लीजेंड पर फ़िल्म बनाना आसान नहीं होता। ख़ासकर तब, जब वह सिर्फ़ अपने पेशे में सफल न हो, बल्कि अपने समय का सांस्कृतिक आइकन बन चुका हो। उसके चेहरे, आवाज़, अंदाज़ और विचारों से पूरी दुनिया परिचित हो। ऐसे में सबसे बड़ा खतरा होता है कि फ़िल्म जीवनी से आगे बढ़कर स्मारक बन जाए।

हॉलीवुड के जाने माने निर्देशक मैट जॉनसन की ‘टोनी’ इस खतरे से बड़ी खूबसूरती से बचती है। आज के सिने-सोहबत में आइकोनिक शेफ़ एंथनी बॉर्डेन की ज़िन्दगी पर बनी इसी फ़िल्म पर चर्चा करते हैं।

यह एंथनी बॉर्डेन की पूरी ज़िंदगी नहीं है। न मशहूर शेफ़, न दुनिया घूमता टेलीविजन होस्ट, न वह लेखक जिसने ‘किचन कॉन्फिडेंशियल’ से रेस्तरां की चमकदार दुनिया के पीछे छिपी अराजकता को सामने रख दिया था। फ़िल्म उससे बहुत पहले लौटती है। 1975 में। उन्नीस साल के उस लड़के के पास, जो लेखक बनना चाहता है लेकिन लिखने से ज़्यादा अपने लेखक होने की कल्पना करता है। जिसे अपनी प्रतिभा पर ज़रुरत से ज़्यादा भरोसा है, मगर ज़िंदगी की दिशा का कोई अंदाज़ा नहीं। जो प्रेम में है, नशे और रोमांच की तरफ खिंचा हुआ है और अपने ही अहंकार में फंसा हुआ है। उसका नाम अभी दुनिया के लिए एंथनी बॉर्डेन नहीं है। वह सिर्फ टोनी है और फ़िल्म की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि वह उसे महान बनने से पहले पकड़ लेती है।

कहानी प्रोविन्सटाउन, केप कॉड की है। टोनी अपनी एक पुरानी क्रश नैन्सी के पीछे वहां पहुंचता है। उसके पास पैसे नहीं हैं, कोई ठोस योजना नहीं है और साहित्यिक महत्वाकांक्षा के अलावा जीवन में फिलहाल कुछ भी हासिल नहीं हुआ है। आखिरकार उसे एक समुद्री भोजन वाले रेस्तरां में डिशवॉशर की नौकरी मिलती है। और यहीं से कहानी शुरू होती है।

‘टोनी’ आइकोनिक शेफ़ एंथनी बॉर्डेन की ही लिखी किताब ‘किचन कॉन्फिडेंशियल’ के शुरुआती हिस्सों से प्रेरित है, लेकिन यह दस्तावेजी पुनर्निर्माण नहीं है। जॉनसन और उनके सह-लेखकों ने बॉर्डेन के कई अनुभवों को गर्मी के एक ही मौसम में समेट दिया है। कुछ पात्र और घटनाएं वास्तविकता से प्रेरित हैं, लेकिन फ़िल्म ने उन्हें नाटकीय ज़रुरत के मुताबिक बदला है। रेस्तरां का शेफ़ भी किसी एक वास्तविक व्यक्ति की हूबहू तस्वीर नहीं, बल्कि बॉर्डेन के शुरुआती रसोई अनुभवों से निर्मित एक सम्मिश्र चरित्र है।

यानी फ़िल्म का सवाल यह नहीं कि उस गर्मी में हर दिन वास्तव में क्या हुआ था। सवाल यह है कि उस गर्मी ने टोनी के भीतर क्या बदल दिया।

टोनी के रूप में डॉमिनिक सेसा का असाधारण परफॉर्मेंस फ़िल्म की सबसे बड़ी ताकत है। वह एंथनी बॉर्डेन की नकल नहीं करते। उनकी आवाज़, चाल या बाद के टेलीविज़न पर्सोना की कॉपी नहीं करते। वह उस लड़के को खोजते हैं, जिसके भीतर अभी वह आदमी बनना बाकी है।

यह टोनी कई बार परेशान करता है। वह झूठ बोलता है। दिखावा करता है। खुद को दूसरों से ज्यादा ज़रुरी समझता है। कई बार बेहद स्वार्थी और मूर्खतापूर्ण व्यवहार करता है। लेकिन उसके भीतर एक बेचैन जिज्ञासा भी है। सेसा इसी विरोधाभास को पकड़ते हैं। उनका टोनी इतना आत्मविश्वासी है कि अपनी कमियां देख नहीं पाता और इतना असुरक्षित कि उन्हें छिपाने के लिए लगातार प्रदर्शन करता रहता है।

यही वजह है कि दर्शक उससे चिढ़ते हुए भी उसके साथ बने रहते हैं। सेसा का कमाल यह नहीं कि वह हमें भविष्य के एंथनी बॉर्डेन की झलक दिखाते हैं। कमाल यह है कि वह हमें एक ऐसे नौजवान पर यकीन करा देते हैं, जिसे खुद नहीं मालूम कि वह आगे क्या बनने वाला है।

इस फ़िल्म में रसोई ही पहला स्कूल है। एंटोनियो बैंडेरस का शेफ टोनी की जिंदगी का पहला कठोर शिक्षक है। वह उसे प्रेरक भाषण नहीं देता। उसे कोई महान दर्शन नहीं सुनाता। वह बस काम करवाता है। समय पर आने को कहता है। बर्तन साफ करने को कहता है। गलती पर डांटता है। रसोई में उसकी जगह तय करता है।

टोनी के लिए यह एक बिल्कुल नई दुनिया है। अब उसकी साहित्यिक भाषा की कोई कीमत नहीं। उसकी महत्वाकांक्षा की कोई कीमत नहीं। यहां सिर्फ काम मायने रखता है। एक प्लेट गलत गई तो वह गलत गई। रसोई में कोई इस बात से प्रभावित नहीं कि आप खुद को कितना प्रतिभाशाली मानते हैं।

यहीं फ़िल्म अपने सबसे अच्छे विचार तक पहुंचती है कि व्यक्ति अपने बारे में जो कहता है, उससे कम और जो करता है, उससे ज्यादा बनता है।

‘टोनी’ मूलतः शेफ़ बनने की कहानी नहीं है।

यह काम सीखने की कहानी है।

और काम करते-करते खुद को पहचानने की।

रसोई में गर्मी है, शोर है, थकान है, गाली-गलौज है, नशा है, प्रतिस्पर्धा है और लगातार दबाव है। लेकिन इसी अराजकता में एक अनुशासन भी है।

हर व्यक्ति की जगह है।

हर गलती की कीमत है।

और हर दिन फिर से साबित करना पड़ता है कि आप यहां रहने लायक हैं।

टोनी पहली बार ऐसी दुनिया में है जहां व्यक्तित्व से ज्यादा प्रदर्शन मायने रखता है।

एक और दिलचस्प किरदार है लियो वुडाल का साल जो कि टोनी के लिए की दूसरी संभावित राह है। अगर शेफ़ अनुशासन है, तो साल अराजकता। उसके लिए रसोई काम से ज्यादा जीवनशैली है, जिसमे रंगीन रातें, शराब, सेक्स, नशा, दोस्ती और जोखिम सब शामिल हैं।

टोनी स्वाभाविक रूप से उसकी तरफ खिंचता है, क्योंकि उन्नीस साल की उम्र में स्वतंत्रता और आत्मविनाश के बीच की दूरी अक्सर बहुत कम होती है। वुडाल साल को सिर्फ बदमाश नहीं बनाते। उसमें एक सम्मोहक आकर्षण है। वह उस जीवन का प्रतिनिधि है जिसे टोनी देखना चाहता है, मगर अंततः पूरी तरह अपनाना नहीं चाहता। धीरे-धीरे उसे समझ आता है कि रसोई का असली रोमांच उसके अराजक माहौल में नहीं, उस काम में है जिसे वह पहले मामूली समझता था। बर्तन धोते-धोते हाथ काम सीखने लगते हैं। और हाथों के साथ आदमी भी।

एमिलिया जोन्स का किरदार नैन्सी फ़िल्म की भावनात्मक धुरी ज़रूर है, लेकिन उसकी मंज़िल नहीं। टोनी प्रोविन्सटाउन उसके पीछे आता है। उसे लगता है कि वह प्रेम की तलाश में है।

लेकिन कहानी आगे बढ़ते-बढ़ते स्पष्ट करती है कि नैन्सी सिर्फ़ एक बहाना थी। असल यात्रा उसकी अपनी थी। यह प्रेम कहानी जान बूझकर बहुत बड़ी नहीं बनाई गई है। क्योंकि ‘टोनी’ का असली प्रेम किसी व्यक्ति से ज्यादा उस खोज से है, जिसमें एक दिशाहीन नौजवान पहली बार किसी काम, किसी दुनिया और किसी हुनर से जुड़ता है।

फ़िल्म का एक बड़ा सितारा खुद प्रोविन्सटाउन है। समुद्र, धूप, गलियां, छोटे रेस्तरां, बार और 1970 के दशक का वह खुला, थोड़ा जंगली माहौल, सब मिलकर ‘टोनी’ की बेचैनी को बाहरी रूप देते हैं। फ़िल्म का बड़ा हिस्सा वास्तविक प्रोविन्सटाउन और डेनिस में शूट हुआ है। स्पिरिटस पिज़्ज़ा, लॉब्स्टर पॉट, ओल्ड कॉलोनी टैप और फ्लैगशिप जैसे वास्तविक स्थान फ़िल्म में दिखाई देते हैं। स्पिरिटस पिज़्ज़ा वही जगह है जहां वास्तविक नैन्सी ने काम किया था। इस लोकेशन का असर महत्वपूर्ण है।

फ़िल्म सत्तर के दशक को फिर से बनाने की कोशिश करती हुई नहीं लगती। वह जैसे उस समय में सांस लेती है।

माइकल बाउमन का कैमरा फ़िल्म की दृश्यात्मक आत्मा है। बाहर की खुली धूप और भीतर की बंद, गर्म रसोई के बीच का अंतर टोनी की मानसिक स्थिति का भी रूपक बन जाता है। बाहर समुद्र है। अंदर भाप। बाहर आजादी। अंदर अनुशासन। टोनी इन दोनों के बीच खड़ा है।

जे मैकैरोल का संगीत इस अनुभव को एक हल्की उदासी देता है। संगीत और एडिटिंग मिलकर फ़िल्म को किसी पारंपरिक बायोपिक की गंभीरता से बचाते हैं। यह कहानी भविष्य की महानता की घोषणा नहीं करती; यह वर्तमान की बेचैनी में रहती है।

बाद का एंथनी बॉर्डेन भोजन को सिर्फ़ स्वाद की चीज़ नहीं मानता था। उसके लिए खाना किसी जगह और उसके लोगों तक पहुंचने का रास्ता था। यात्रा उसके लिए पर्यटन नहीं थी। वह दूसरे मनुष्य को उसके अपने संसार में समझने का तरीका थी। इसीलिए उसकी कहानियों में महंगे रेस्तरां, जितने महत्वपूर्ण थे, उतने ही छोटे ढाबे, स्ट्रीट फूड वाले, टैक्सी ड्राइवर, स्थानीय रसोइए और वे लोग भी थे जिनके बारे में मुख्यधारा की ट्रेवल स्टोरीज़ बहुत कम कहती थीं।

‘टोनी’ में इस सोच का पूरा वृक्ष अभी नहीं है। सिर्फ़ बीज है। उन्नीस साल का टोनी अभी यह नहीं जानता कि भोजन एक दिन उसे दुनिया समझने की भाषा देगा। वह सिर्फ़ इतना सीख रहा है कि किसी काम को ठीक से करना क्या होता है। और यही फिल्म को दिलचस्प बनाता है। मैट जॉनसन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने बॉर्डेन को श्रद्धांजलि देने के बजाय उससे थोड़ी दूरी बनाई है।

फ़िल्म बार-बार यह याद नहीं दिलाती कि यह वही आदमी है जो आगे चलकर दुनिया भर में मशहूर होगा। भविष्य को वर्तमान पर हावी नहीं होने दिया गया है। हमें पता है कि टोनी कौन बनने वाला है। टोनी को नहीं पता। यही फ़िल्म का सबसे सुंदर नाटकीय तनाव है।

एक पारंपरिक बायोपिक में हम उपलब्धियों की तरफ बढ़ते नायक को देखते हैं।

‘टोनी’ में हम उस आदमी को देखते हैं जो अभी अपनी कहानी का नायक भी नहीं बना है।

यही वजह है कि फ़िल्म तथ्य से ज्यादा भावनात्मक सत्य में दिलचस्पी लेती है। खुद फ़िल्मकारों ने बॉर्डेन के जीवन की कई अलग-अलग घटनाओं को एक कालखंड में समेटने की रचनात्मक स्वतंत्रता ली है। और शायद यही सही फैसला था क्योंकि किसी इंसान को समझने के लिए हमेशा यह जानना जरूरी नहीं कि उसने क्या-क्या हासिल किया। कभी-कभी यह देखना ज्यादा जरूरी होता है कि वह असफल कैसे हुआ।

एंथनी बॉर्डेन की सबसे बड़ी खूबी शायद उनकी जिज्ञासा थी। दुनिया को जानने की भूख लोगों को सुनने की इच्छा। अलग जगहों पर जाकर अपने पूर्वाग्रहों को चुनौती देने की आदत। ‘टोनी’ उस भूख की पहली झलक है। लेकिन वह इसे किसी महान प्रेरक कहानी की तरह नहीं दिखाती। इसके लिए कोई एक निर्णायक क्षण नहीं है। न कोई चमत्कार। न अचानक महान प्रतिभा का विस्फोट।

बस एक गर्मी।

एक नौकरी।

कुछ गलतियां।

एक कठोर शिक्षक।

कुछ दोस्त।

एक अधूरा प्रेम।

और धीरे-धीरे बदलता हुआ एक लड़का।

शायद ज़िंदगी भी ऐसे ही आदमी बनाती है।

हम अक्सर सोचते हैं कि महान लोग किसी एक बड़े फैसले से महान बनते हैं।

असल में वे छोटे-छोटे कामों में अपने भीतर कुछ बदलते रहते हैं।

टोनी के लिए वह बदलाव एक रसोई में शुरू हुआ।

बर्तनों के ढेर के बीच।

जहां किसी को उसकी महत्वाकांक्षा से कोई फर्क नहीं पड़ता था।

जहां उसे सिर्फ़ काम करना था।

और शायद वहीं पहली बार उसे यह समझ आया कि दुनिया देखने से पहले दुनिया को देखना सीखना पड़ता है।

‘टोनी’ की खूबसूरती यही है कि वह महान एंथनी बॉर्डेन की कहानी नएहीं सुनाती।

वह हमें उस लड़के से मिलाती है जो अभी महान नहीं है।

और शायद सिनेमा के लिए इससे ज्यादा दिलचस्प विषय कोई नहीं कि कहानी एक इंसान के महान बनने की नहीं, बल्कि धीरे-धीरे उसके भीतर छिपे उस आदमी तक पहुंचने की हो, जिसे लीजेंड बनने की अभी उसे ख़बर नहीं।  नज़दीकी सिनेमाघरों में है। देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़”के होस्ट हैं।)

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