राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

एक देश एक परीक्षा- फूहड़ विचार!

आज शिक्षा में शिक्षक नहीं, बल्कि बाबू, ठेकेदार, एवं पार्टीबंदी महत्वपूर्ण हैं। अच्छा शासन करना नहीं, सारे चुनाव जीतना अधिक महत्वपूर्ण है। उसी तरह, जीवन में भी सच्चाई नहीं, आडंबर महत्वपूर्ण है। पढ़ाने-लिखाने, पत्रिकाओं-पुस्तकों, गोष्ठी सेमिनारों में भी सत्य नहीं, प्रोपेगंडा महत्वपूर्ण है। हर सामाजिक क्षेत्र में उपलब्धि नहीं, उस की भंगिमा, उल्टा-सीधा आँकड़ा बनाना महत्वपूर्ण है। विद्वत-जन नहीं, आईटी-सेल महत्वपूर्ण है। (बड़े नेता ने सत्ता मिलने पर यही आईटी सेल बनाए, जानकारों की सलाहकार समिति नहीं)।

सार्वजनिक शिक्षा: गरीब की लुगाई-1

हाल में, कॉकरोच आंदोलन और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा परीक्षाओं में बार-बार पेपर लीक और गड़बड़ी को लेकर था। एक समाचार के अनुसार, गत दस वर्षों में पेपर लीक की सौ से अधिक घटनाएं हुईं। पर कोई ऐसा समाचार शायद ही आया कि उस पर कहीं व्यवस्थित, जिम्मेदार विचार हुआ। न यह समाचार आया कि उस गड़बड़ी के लिए कोई दंडित हुआ। पहली बार, उक्त आंदोलन के बाद ही कुछ अधिकारियों की छुट्टी, तबादले, पदाधिकारी में बदलाव, और अंततः शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के समाचार सुने गए।

जरा इतिहास उलट कर देखिए। योग्यता के आधार पर सरकारी नौकरी देने का आरंभ ब्रिटिश राज ने 1833 में किया था। फिर ऊँची नौकरियाँ लिखित परीक्षा और अन्य व्यक्तित्व क्षमताओं की परख करके देने का आरंभ भी 1853 में अंग्रेजों ने ही शुरु किया था। उसी लॉर्ड मैकॉले ने वह इंडियन सिविल सर्विस शुरू करवाई, जिस के आज भी भारतीय युवा दीवाने हैं, पर जिस आविष्कारक की निन्दा करना स्वतंत्र भारत के शिक्षा विमर्श की पहली और स्थायी सनक है।

पर जरा खोजिए, पहली वैसी परीक्षा आरंभ करने से लगभग सौ साल चले ब्रिटिश राज में कभी किसी पेपर लीक, गड़बड़ी, भ्रष्टाचार, तथा जानबूझकर कर किसी अयोग्य की नियुक्ति का एक भी उदाहरण मिलता है? याद रहे, तब सभी पेपर, पर्चे, उत्तर पुस्तिकाएं, कागज पर रहती थीं। उन का परीक्षण, मूल्यांकन तमाम परीक्षक अपने-अपने घरों में करते थे। जो परंपरा अनेक तरह की परीक्षाओं के लिए स्वतंत्रता के बाद भी लंबे समय तक चलती रही। पर उस में आम गड़बड़ी की बातें कभी नहीं सुनी गई।

जबकि आज तमाम कथित होशियारी, उपाय, तरह-तरह की गोपनीयता, परीक्षा केंद्र बनाकर पुस्तिकाएं जाँचने, आदि के बावजूद उत्तर पुस्तिकाओं के सही मूल्यांकन नहीं होते। भ्रष्टाचार, पेपर-लीक से‌ लेकर बाकायदा ऊपरी निर्देश से झूठे मूल्यांकन तक किए जाते हैं। फेल छात्रों को भी पास कर देने का हुक्म पहले ही ऊपर से दे दिया जाता है। केंद्रीय विद्यालयों, सीबीएसई की परीक्षाओं में भी यह आम चलन है — फेल को भी पास करना! यह सब क्यों, किसलिए, किस के हित में? इस का विचार करने वाला आज कोई नहीं! इसलिए भी बेचारी सार्वजनिक शिक्षा आज गरीब की जोरू है।

उसी क्रम में, हाल में नया चलन शुरू हुआ। अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं, दाखिलों, आदि के लिए परीक्षाओं का केंद्रीकरण। जिस में केंद्रीय विश्वविद्यालयों के विविध विभागों में दाखिले की परीक्षाएं भी शामिल हैं। यानी, दर्जनों तरह की विशिष्ट संस्थाओं के लिए भी, और लाखों-लाख छात्रों की योग्यता की परीक्षा एक एजेंसी, एक जगह से करे। यह कई तरह से अनुपयुक्त, बल्कि हानिकारक लगता है।‌

सरसरी तौर पर भी देखें तो यह बारह साल पहले किए गये वादे ‘मिनिमम गवर्नमेंट’ के भी साफ विपरीत है। यह भारतीय संविधान की संघवाद की भावना के भी विरुद्ध है, जिस में राज्यों को शिक्षा क्षेत्र में स्वतंत्र या स्वायत्त अधिकार दिए गये थे। जिसे देश के केंद्रीय सत्ताधारी धीरे-धीरे कुतरते हुए लगभग खा गये हैं। इस से विभिन्न महत्वपूर्ण शैक्षिक संस्थानों की अपनी-अपनी विशिष्टता का नाश भी हुआ है।

साथ ही, यह तमाम राजकीय शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता के विरुद्ध भी है। वे सभी अब लाचार होकर ऊपर शासकीय नेताओं, उन के अफसरों, क्लर्कों के लिए गये निर्देश के अनुसार सब कुछ करने के लिए विवश कर दिए गये हैं! इस तरह, इस केंद्रीकरण में शिक्षकों और विद्वानों की पूरी उपेक्षा भी कर दी गई है — मानो वे अपनी शिक्षा संस्थाएं चलाने, उस के लिए योग्य छात्रों के चयन और मूल्यांकन करने के भी योग्य नहीं हैं। किस की सलाह से इस तरह का केंद्रीयकरण हुआ, यह अल्लाह जानता है!

एक तरह से परीक्षाओं का केंद्रीकरण शिक्षकों, जानकारों, विद्वानों पर अविश्वास, तथा सब कुछ बाबुओं, क्लर्कों के सिर पर सब कुछ लादने, छोड़ने जैसा है। वह भी अंधाधुंध, हर‌ तरह के विषय, संस्थान, आदि के लिए प्रश्न-पत्र बनाना और उन की लाखों उत्तर पुस्तिकाओं को जाँचना  — सब कुछ ऑनलाइन — व्यवहारत: एक पूरी तरह गैर-जबावदेह व्यवस्था है। क्योंकि एक तरफ, किसी भी गड़बड़ी से हजारों या लाखों छात्र प्रभावित हो जाएंगे, जबकि जिम्मेदारी किसी की नहीं बनेगी! क्योंकि हर कहीं मशीन और ठेके के लोग शामिल हैं, जिन्हें डिसमिस कर देने से कुछ नहीं निकलता। क्योंकि व्यवस्था तो वही, मानवीय तत्व विहीन, है! अतः यह सब संकीर्ण बुद्धि लोगों की फूहड़ कल्पना और जिद लगती है। जो कुल मिलाकर शिक्षा की हानि है।

तुलना में, यहाँ ब्रिटिश राज मानवीय तत्व पर अधिक भरोसा करता था।‌ शायद इसलिए भी तब हर क्षेत्र में भारतीयों के बीच अधिक गुणवत्ता विकसित हुई थी। चाहे यह एक अनुमान है, किन्तु परखने योग्य है।‌ उस की तुलना में आज देसी राज सब पर संदेह करता है। देश से अधिक दल, दल से भी अधिक गुट, गुट में भी दो-चार लोग। यही देसी शासकों के भरोसे और विश्वास का दायरा है! ऐसा व्यापक अविश्वास बहुत कुछ चौपट कर रहा है। विशेषकर शिक्षा, संस्कृति और धर्म के क्षेत्र में। यह सब नीयत की बात नहीं,  ठोस परिणाम के पड़ताल का मामला है।

आज शिक्षा क्षेत्र की हालत यही है कि कह सकते हैं: मर्ज बढ़ता गया, ज्यों ज्यों दवा की! तनिक विस्तार से देखें तो लगता है कि हमारे शासकों के लिए शिक्षा नहीं, परीक्षा‌ और डिग्री बाँट देना महत्वपूर्ण है। बच्चों, किशोरों की बौद्धिक, शारीरिक, आध्यात्मिक आवश्यकताएं नहीं, स्कूल-कॉलेज प्रबंधन के लिए सुभीता होना अधिक महत्वपूर्ण है (सुबह सात बजे से स्कूल शुरु होना बच्चों के स्वास्थ्य और दिनचर्या के विरुद्ध है, यह केवल प्रबंधन की सुविधा के लिए है! वरना तमाम सरकारी आफिस, मंत्रालय, आदि भी क्यों नहीं सुबह सात बजे से कर दिए गये?)। सो, उसी क्रम में, शिक्षा के उद्देश्य में व्यक्तित्व नहीं, केवल खानापूरी करके धनार्जन महत्वपूर्ण है। विद्वान और जानकार नहीं,‌ केवल सत्ताधारी नेता और दलीय कार्यकर्ता महत्वपूर्ण हैं जो आज शिक्षा संस्थानों के असली निर्देशक बन गये हैं।

सो, आज शिक्षा में शिक्षक नहीं, बल्कि बाबू, ठेकेदार, एवं पार्टीबंदी महत्वपूर्ण हैं। अच्छा शासन करना नहीं, सारे चुनाव जीतना अधिक महत्वपूर्ण है। उसी तरह, जीवन में भी सच्चाई नहीं, आडंबर महत्वपूर्ण है। पढ़ाने-लिखाने, पत्रिकाओं-पुस्तकों, गोष्ठी सेमिनारों में भी सत्य नहीं, प्रोपेगंडा महत्वपूर्ण है। हर सामाजिक क्षेत्र में उपलब्धि नहीं, उस की भंगिमा, उल्टा-सीधा आँकड़ा बनाना महत्वपूर्ण है। विद्वत-जन नहीं, आईटी-सेल महत्वपूर्ण है। (बड़े नेता ने सत्ता मिलने पर यही आईटी सेल बनाए, जानकारों की सलाहकार समिति नहीं)।

सो, किसी क्षेत्र में गड़बड़ी बढ़ जाने, और हल्ला मचने पर भी, उचित भूल-सुधार नहीं, बल्कि गलत निर्णय करने वाले की कुर्सी बचाना महत्वपूर्ण है। आज तरह-तरह की गलती खुद करने वाले ही दूसरों को ‘माफ करने’ का दंभ भरते हैं! मानो, वे तो दूध के धुले संन्यासी हैं जिन से कोई पाप, अपराध, लापरवाही, गलती होने की बात असंभव है। जबकि असलियत यह है कि वे मीडिया का सामना नहीं करते। उचित सवालों का भी उत्तर नहीं देना चाहते, या देना नहीं जानते। अपने फैसलों की भी जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते।

बहरहाल, पूरे देश के विभिन्न संस्थानों में प्रवेश, विभिन्न तरह की परीक्षाओं, प्रतियोगी परीक्षाओं, आदि को एक जगह केंद्रित करने का फैसला किस समझ से किया गया, यह कौन जानता है? पर यह अविवेकपूर्ण फैसला था। इस के सभी पहलुओं पर विचार करें तो पूरा अधम्मपद बन जाएगा! भोली कल्पनाओं की पूरी श्रृंखला — जो मुख्यतः इसलिए बनी, क्यों कि स्वतंत्र भारत में शिक्षा का क्षेत्र गरीब की जोरू बना दी गई है।  उस से ठीक शिक्षक और विद्वान ही मानो निष्कासित कर दिये गये हैं।

यानी, शिक्षा के मामले में कोई भी ताकतवर, साधनवान, अहंकारी, उच्छृंखल, लोभी, मूढ़, आदि जो चाहे कुछ मजाक कर सकता है। यह लंबे समय से चल रहा है। शिक्षा संबंधी निर्णय दशकों से ऐसे लोग लेते रहे हैं जिन्हें वस्तुत: शिक्षा की सच्ची समझ तक नहीं रही है! उन निर्णयकर्ताओं में कोई शिक्षा को आगे चल कर नौकरी पाने का जरिया भर; तो कोई राजकर्मचारी बनाना भर; तो कोई रोजगारी तकनीकी प्रशिक्षण देना-पाना भर; तो कोई सिर्फ औपचारिक डिग्री-डिप्लोमा देना भर; तो कोई विदेश जा बसने का साधन भर; तो कोई पैसे बनाने का व्यापार भर; तो कोई उसे अपना राजनीतिक मतवाद, प्रमाद फैलाने का साधन भर; आदि समझते रहे हैं।

आज की यह स्थिति किसी भी आम अफसर, नेता, स्कूल प्रबंधक, या माता-पिता से भी बात कर के परखी जा सकती है। यह बात कि वे उपर्युक्त किसी न किसी चीज को ही ‘शिक्षा’ समझते हैं। यद्यपि उक्त परिणाम या उपलब्धियाँ शिक्षा संस्थानों से तैयार होकर निकलने वालों को मिलती रही हैं — पर शिक्षा वही नहीं है। वह एक वृहत,अधिक महत्वपूर्ण गतिविधि है। हर बच्चे के जीवन की एक आधारभूत गति उस की शिक्षा है। किन्तु जिस के प्रति नासमझी से ही स्वतंत्र भारत में वह गरीब की जोरू बन गई है। सो हर कोई शिक्षा संबंधी नीति, दस्तावेज तक बना सकता है! जो कोई चाहे, उस पर भाषण और फतवे देने लग सकता है। जिस किसी को शिक्षक बना दिया जा सकता है। जो चाहे, एक स्कूल या विश्वविद्यालय खोल सकता है। उन के स्तर, उद्देश्य, और परिणाम देखने वाला कोई नहीं।

उसी क्रम में, जिस किसी को कोई डिग्री दी जा सकती है! जिस किसी को कहीं भी प्रवेश दिया जा सकता है! जिस किसी को सरकारी स्कूल में किसी विषय के शिक्षक का पद दिया जा सकता है, चाहे उसे उसी विषय की परीक्षा में सौ में मात्र तीन नंबर मिले हों! यानी, किसी को कहीं पद, प्रवेश या नियुक्ति देने के लिए योग्यता का आधार उस की वास्तविक योग्यता नहीं — बल्कि कोरी कागजी

(जारी)

By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और स्तंभकार। राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। कई पुस्तकें प्रकाशित, जिन में कुछ महत्वपूर्ण हैं: 'भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहासलेखन', 'गाँधी अहिंसा और राजनीति', 'इस्लाम और कम्युनिज्म: तीन चेतावनियाँ', और 'संघ परिवार की राजनीति: एक हिन्दू आलोचना'।

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