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… कस्मै देवाय हविषा विधेम?

Byशंकर शरण,
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कवियित्री महादेवी वर्मा ने दशकों पहले पाया था कि हमारे बीच जाति-भेद से भी अधिक घातक पार्टी-बाजी भेद है। सो यदि हमारे नेता मंदिरों को दलीय लाभ-हानि के मंसूबे से जोड़ेंगे तो सभ्यतागत शत्रु ताक में बैठे हैं। यहाँ जो जिहादी ध्वंस 1921, 1947, 1990 आदि में बड़े पैमाने पर, और छोटे पैमाने पर अनवरत होता रहा है, वह करने वाले हिन्दुओं के अज्ञान, अहंकार, और भेदभाव से और उद्धत बनते हैं।आज हिन्दू समाज में दलबंदी की सनक से ही अज्ञान और दुराव बढ़ रहा है।‌

कविगुरु टैगोर ने देखा था कि हमारे क्रियाकलापों में मुख्य को उपेक्षित कर गौण को महत्व देने की प्रथा है। उन के शब्दों में, ‘देवता से अधिक पंडे की पूजा’ होती है। उस अवलोकन के सौ बरस बाद हम एक सीढ़ी और नीचे आ गये हैं। अब पंडे भी पीछे भगाए जा रहे हैं! मंदिरों, चढ़ावों पर राजकीय कब्जा है (जो अंग्रेजों ने भी नहीं किया था)। आसन पर राजदलीय लोग ही कर्ता-धर्ता, पुरोहित-यजमान सब खुद बन बैठे हैं। उन के ऊपरी नेता परमपूज्य, परमाचार्य हो गये हैं। शेष समाज, उन के चरणों में दरस-परस पाकर अपने को धन्य समझे तो ठीक। वरना गालियाँ सुनने को तैयार रहे!

अभी अनेक सोशल मीडिया पोस्टरों में ‘श्रीराम’ शब्द पार्टी-प्रचार करने हेतु सजावट की चीज बना दिया गया है। उस में एक दल का नाम मोटे-मोटे अक्षरों में केंद्र में है। उस के चारों तरफ फ्रेम की तरह श्रीराम श्रीराम लिखा हुआ है। इसे किसी का निजी उत्साह समझना क्षणिक संतोष है। स्वतंत्र भारत में हमारे नेताओं, दलों ने क्रमशः जो ‘सेक्यूलर’, ‘प्रगतिशील’ शिक्षा दी है, यह उसी का सामान्य परिणाम है। हमारे महान ज्ञान-ग्रंथ, और देवी-देवता या तो अंधविश्वास, मिथ्या, या फिर पार्टीबंदी के उपयोग के निमित्त मात्र हैं।

स्वतंत्रता के छिहत्तर सालों में यही हमारी प्रगति है! हमारे बड़े-बड़े नेता जो करते हैं, उस की जिम्मेदारी लेने का भी कलेजा नहीं रखते! किसी न किसी कंधे या झूठ के पीछे अपनी करनी छिपाते हैं। इसी को उन के लाखों अनुयायी होशियारी और सही मानते हैं।

इस से आज हिन्दू धर्म समाज की स्थिति समझें। अनेक नैतिक कुरीतियों की तरह इस का आरंभ भी गाँधीजी से, उन्हें ‘जीसस’ और ‘बुद्ध’ बताकर, आडंबरी प्रेम-अहिंसा के मतवाद में खुद झूमने से हुआ था। गाँधी के खलीफत-प्रेम और उसी फलक्रम से देश-विभाजन में लाखों निरीह लोगों की तबाही के बाद भी किसी को महापुरुष मान, सब कुछ उस पर छोड़, राम-राम करते जीने की विवशता यथावत है। अधिकांश दल वही मॉडल चला रहे हैं। तब आगे क्या होगा?

वही, जो स्मृतिकार ने नोट किया था: “यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत्पुत्रेषु नप्तृषु। न त्वेव तु कृतोऽधर्मः कर्तुर्भवति निष्फलः।’ (मनुस्मृति,४.१७३)। पाप कभी निष्फल नहीं होता। यदि कर्ता के जीवन काल में नहीं तो उस के पुत्रों, या नातियों-पोतों को अवश्य फलता है। सामाजिक क्षेत्र में इस का आशय सामूहिक कर्मफल है। अच्छा भी, बुरा भी। उद्योग, चिकित्सा, आदि में उचित कर्म का फल आज समाज में बढ़ी हुई औसत आयु है। पर राजनीति में आडंबरी त्याग, अहिंसा का अनर्थ, अनुत्तरदायी महानता, आदि कुनीतियों का फल भी समाज को लगातार भोगना पड़ा। चाहे, पहले गाँधीजी और उन का दल भी खूब फलते-फैलते दिखे थे। वहीं यह भी लिखा है: ‘अधर्मेणैधते तावत् ततो भद्राणि पश्यति। ततः सपत्नान् जयति समूलस्तु विनश्यति। (४.१७४)। अधर्मी पहले बढ़ता हुआ एवं शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता दिखता है परन्तु, अंततः समूल नष्ट हो जाता है।

इसीलिए उपनिषदों से लेकर महाभारत तक सभी ज्ञान-ग्रंथों में धर्म रक्षा और पालन का आदेश दृढ़ता से दिया गया है।‌ महाभारत और मनुस्मृति, दोनों में कठोर चेतावनी है: ‘धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्।’ (वनपर्व, ३१३.१२८)। अर्थात् मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश, और रक्षित किया हुआ धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन कभी न करो, ताकि मारा हुआ धर्म हमें न मार डाले।

वस्तुत: गत हजार वर्षों में हिन्दू भारत के निरंतर पतन को समझने की कुंजी इसी चेतावनी में है। सदियों से यहाँ धर्म के नाम पर अधर्म तथा कोरा अनुष्ठान बढ़ता गया। वर्ण-कर्म को जड़-व्यवस्था में बदल कर समाज को अलग-अलग बाँट लिया गया। जिस हिन्दू ज्ञान ने ‘तत्वम् असि’ का महामंत्र खोजा, तथा ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की शिक्षा दी थी, वह आपसी अहंकार, दुराव के आचरण को धर्म समझने लगा! सदियों से छुआ-छूत, ऊँच-नीच (जिस में अब पार्टीबंदी की ऊँच-नीच भी जुड़ गई) – इस का सब से लज्जास्पद दृश्य है।

उसी से विधर्मियों को अवसर मिला। जैसे घाव में मक्खी को मिलता है। क्षत्रियों का शौर्य धर्म-शत्रुओं की कुटिलता, निर्भीक कटिबद्धता का प्रतिकार करने में अपर्याप्त रहा। नये प्रकार के शत्रुओं के मतवाद, उद्देश्य तथा तरीकों, आयुधों के प्रति नासमझी, और आपसी भेद-भाव हमारे अज्ञान के ही विविध पहलू थे।

हिन्दू समाज रामायण और महाभारत की महान‌ शिक्षाओं से दूर होता गया। जिन में हर पन्ने पर धर्म और न्याय के लिए अड़ने, लड़ने, और उस के लिए प्राण देने को तैयार रहने की सीख है। यही कारण है कि मुलतान, लाहौर से सोमनाथ तक, सैकड़ों भव्य मंदिरों में स्थापित देवता, अनुष्ठान, आदि हमारे समाज की रक्षा नहीं कर सके। वे कर ही नहीं सकते थे! क्योंकि धर्म की हमारी समझ विकृत हो चुकी थी।

कवि अज्ञेय ने लिखा है: ‘मंदिरों में कहाँ कुछ होता है!’ भक्त को पूजा-अराधना उतनी ही फलती है जितना वे ज्ञान, भक्ति सहित समुचित कर्म का अर्घ्य देते हैं। सिंध, पंजाब, कश्मीर, बंगाल के हिन्दू-सिख इस के वर्तमान उदाहरण हैं। सौ साल पहले उन के हजारों भव्य, सुंदर मंदिरों में विधिवत् पूजा, अर्चना, कथा, पाठ, आदि तो चल ही रहे थे। किन्तु निर्भीक, कटिबद्ध, कुटिल जिहादियों से वे सज्जन लोग अपनी रक्षा नहीं कर सके। क्योंकि समाज झूठे मतवादों से भ्रमित होकर वाल्मीकि और व्यास की ओजस्वी शिक्षा से कब का दूर हो चुका था! वह भूल गया कि राम, कृष्ण जैसे दैवी अवतारों को भी कदम-कदम पर राक्षसों, आततायियों से सीधे लड़ना पड़ा था। पर अपनी ही नीतियों के दायित्व से भागने वाले आडंबरी नेता यह सत्य झुठलाते रहे कि अधर्म से लड़ने, अधर्मियों को मिटाने, और समाज रक्षा की सशस्त्र व्यवस्था करना-रखना, और उस के लिए राजनेताओं द्वारा समुचित निर्भीक कर्म करना अनिवार्य है।

इसीलिए, आधुनिक मनीषियों ने भी मंदिर को धर्म की प्रथम सीढ़ी मात्र कहा है। स्वामी विवेकानन्द ने तो मंदिर को धर्म की ‘निकृष्टतम’ पहली सीढ़ी कहा। मंदिर में देव-प्रतिमा स्थापना भी उसी निम्नतम श्रेणी में है। असल बात उस के बाद आरंभ होती है – आचरण, धर्म प्रसार, अधर्म के नाश, और प्रजा-रक्षा के लिए सदैव प्रस्तुत रहना! यही संपूर्ण रामायण और महाभारत की एक मूल शिक्षा है।

अतः वे सावधान रहें जो एक मंदिर बिल्डिंग बनाने, और पार्टी-बंदी से अन्य हिन्दुओं को ही नीचा दिखाने में उत्साहित हैं। कवियित्री महादेवी वर्मा ने दशकों पहले पाया था कि हमारे बीच जाति-भेद से भी अधिक घातक पार्टी-बाजी भेद है। सो यदि हमारे नेता मंदिरों को दलीय लाभ-हानि के मंसूबे से जोड़ेंगे तो सभ्यतागत शत्रु ताक में बैठे हैं। यहाँ जो जिहादी ध्वंस 1921, 1947, 1990 आदि में बड़े पैमाने पर, और छोटे पैमाने पर अनवरत होता रहा है, वह करने वाले हिन्दुओं के अज्ञान, अहंकार, और भेदभाव से और उद्धत बनते हैं।

आज हिन्दू समाज में दलबंदी की सनक से ही अज्ञान और दुराव बढ़ रहा है।‌ तरह-तरह के अल्पसंख्यक, पिछड़ा, विशिष्ट, आदि समूह बनाकर ईर्ष्या-द्वेष और पार्टी-बंदी बढ़ाई जा रही है‌। विविध नारेबाजियों को शिक्षा-पाठ बनाकर बच्चों, युवाओं को चौपट किया जा रहा है। हिन्दू मंदिरों और शिक्षा पर राजकीय अधिकार है। जबकि गैर-हिन्दू संस्थान राजकीय हस्तक्षेप से स्वतंत्र हैं! ऐसा अधर्म, अन्याय और इस से बढ़ती दुर्बलता झेलते हिन्दू समाज को दलबंदी की अफीम से मस्त रखा जा रहा है। इस की भरपाई कथित विकास, या तीर्थों में भीड़ नहीं कर सकती। वह भीड़ भेड़-बकरियों के झुंड से अधिक कुछ नहीं। इसे हिन्दू धर्म के शत्रु बेहतर समझते हैं।

पर अधिकांश नेताओं, बौद्धिकों के लिए पार्टी-प्रचार ही आदि-अंत बन गया है। यह सब ‘अधर्मेण समूलस्तु विनश्यते’ की दिशा है, अथवा ऊपरी बाढ़ के नीचे कोई नई भूमि भी? इस का सही साबित होने वाला उत्तर पाना असंभव है।

By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और स्तंभकार। राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। कई पुस्तकें प्रकाशित, जिन में कुछ महत्वपूर्ण हैं: 'भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहासलेखन', 'गाँधी अहिंसा और राजनीति', 'इस्लाम और कम्युनिज्म: तीन चेतावनियाँ', और 'संघ परिवार की राजनीति: एक हिन्दू आलोचना'।

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