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अब तो ‘धर्म की राजनीति’ ही ‘राजनीति का धर्म…!

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भोपाल। आज से करीब पचहत्तर साल पहले छब्बीस जनवरी से लागू आजाद भारत का संविधान अब तक सवा सौ से भी अधिक संशोधन के तीर झेल चुका है और इसीलिए आज वह द्वापर में हुए महाभारत युद्ध के बाद के भीष्म की ‘शर शैय्या’ का परिदृष्य उपस्थित कर रहा है या यदि यह कहा जाए कि हमारे संविधान को आज के शीर्ष राजनेताओं ने रामायण-महाभारत जैसे पवित्र धर्मग्रंथों की तरह ही लाल कपड़े में लम्बी डोरी से बांध कर रख दिया है और अपने खुद की मनमर्जी के संविधान से सरकार चला रहे है तो कतई गलत नहीं होगा।

आज मुझे यह इसलिए लिखना पड़ रहा है क्योंकि देश में दिनों दिन सत्ताधीशों की स्वेच्छाचारिता बढ़ती ही जा रही है और अब वे जनसेवा के लिए नहीं बल्कि स्वयं की राजनीति व सत्ता को ‘दीर्घायु’ बनाने के प्रयासों में जुटे है, इसलिए अब उन्हें न देश की चिंता है न देशवासियों या देश के संविधान की, उनकी स्वेच्छाचारिता दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है, जिसका फिलहाल कोई अंत नजर नहीं आ रहा है, अब आज देश में राजनीति के लिए ‘सत्ता’ ही अहम् हो गई है, देश, देशवासी या संविधान नहीं, इस तरह आज ‘सत्ता की पिपासा’ का दौर है, जिसका न कोई ओर है और न ही छोर है।

आज यह लिखने को इसलिए मजबूर हुआ हूं, क्योंकि हमारे संविधान में स्पष्ट उल्लेख है कि ‘राजनीति को धर्म से बिल्कुल अलग रखा जाए, दोनों के संविलियन के प्रयास हमारे देश के हित में नहीं होंगे’। लेकिन देखिये, आज क्या हो रहा है, चौबीस की जंग भगवान राम के नाम पर लड़ने की पूरी तैयारी की जा चुकी है और राम की अयोध्या में बन रहे भव्य राम मंदिर का लोकार्पण उसकी अधूरी निर्माण अवस्था में होने जा रहा है, चूंकि इस भव्य मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण होने तक चौबीस के चुनावों की घोषणा हो जाएगी तथा चुनावी आचार संहिता लागू हो जाएगी, जिसका राजनीतिक लाभ सत्तारूढ़ दल को नहीं मिल पाएगा, इसी कारण अधूरे निर्मित मंदिर का लोकार्पण किया जा रहा है, जिसके लिए बाईस जनवरी की तारीख तय की गई है और अनुष्ठान प्रारंभ हो चुके है, जिसके मुख्य पात्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी है। जिसका प्रचार-प्रसार सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है।

आज भारत की राजनीति में यह अवसरवादी विसंगति किसी दल विशेष तक सीमित नहीं है, जो भी दल सत्ता में होता है वह अपनी सत्ता की ‘दीर्घायु’ के लिए ऐसे ही प्रयास करता है, चाहे वे प्रयास संवैधानिक दायरे के अंदर हो या बाहर, इसकी कोई सत्ताधारी दल चिंता नहीं करता, आजादी के बाद सत्ता में रहने तक कांग्रेस ने भी यही किया और आज सत्तारूढ़ भाजपा भी वही सब कर रही है, सत्ता की यह भूख ऐसी है कि इससे कभी किसी का पेट ही नहीं भरता, शांत करने का प्रयास करो तो भूख बढ़ती ही जाती है, इसी सत्ता की भूख ने देश से राष्ट्रीय भावना व जनसेवा को विलोपित कर दिया है और देशवासियों को अपने हाल पर छोड़ दिया है।

सत्ता की यही भूख हमारे कानून, नियम-कायदों और संविधान को भी खा गई और खाने वाले हाजमें की गोली खाने को मजबूर है, आज देश के बुद्धिजीवियों व राष्ट्रभक्तों के सामने यही एकमात्र बड़ी चिंता है, ऐसी स्थिति में देश व देशवासियों का क्या हश्र होगा, आज यही सबसे अहम् सवाल है, जिसका जवाब आज किसी के भी पास नहीं है, फिर यह भी अहम् चिंता की बात है कि संविधान व कानून कायदे हीन देश की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर क्या स्थिति होगी, पूरा विश्व इस देश को, जिसे कभी हर दृष्टि से ‘सोने की चिड़िया’ माना जाता रहा, अब किस निगाह से देखेगा? क्या इस प्रश्न का जवाब किसी के भी पास है? और सबसे बड़ी बात यह कि ऐसी ही स्थिति चलती रही, हर सरकार अपनी मनमर्जी के संविधान से चलती रही तो देश का भविष्य क्या होगा और हमारी नई पीढ़ी हमें कितनी बद-दुुआऐं देगी?

खैर, छोड़िये मेरे इन प्रश्नों पर विचार कर उत्तर देने का समय आज ‘आपाधापी’ के इस युग में किसी के भी पास नही है, इसलिए मेरे जैसे चिंतक के लिए अपने ‘सिर घुनने’ के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

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