nayaindia Russia Ukraine War क्या नाटो विश्व युद्ध का जोखिम उठाएगा?
Columnist

क्या नाटो विश्व युद्ध का जोखिम उठाएगा?

Share

पिछले दो हफ्तों में मैक्रों ने अनेक बार कहा है कि वे फ्रांस की सेना को यूक्रेन भेजना चाहते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक अगर मैक्रों ऐसी घोषणा करते हैं, तो उसके बाद पोलैंड, चेक रिपब्लिक और कुछ अन्य देश भी अपनी फौज यूक्रेन भेज सकते हैं। इसका अर्थ रूस के साथ इन देशों का सीधा युद्ध शुरू होने में सामने आएगा और तब परिस्थितियां विश्व युद्ध की तरफ भी जा सकती हैं।

क्या फ्रांस यूक्रेन युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से शामिल होने की तैयारी में है? पिछले दो हफ्तों में मैक्रों ने अनेक बार कहा है कि वे फ्रांस की सेना को यूक्रेन भेजना चाहते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक अगर मैक्रों ऐसी घोषणा करते हैं, तो उसके बाद पोलैंड, चेक रिपब्लिक और कुछ अन्य देश भी अपनी फौज यूक्रेन भेज सकते हैं। इसका अर्थ रूस के साथ इन देशों का सीधा युद्ध शुरू होने में सामने आएगा और तब परिस्थितियां विश्व युद्ध की तरफ भी जा सकती हैं।

इसके पहले गुजरे एक मार्च को रूस के सरकारी मीडिया ने एक ऑनलाइन कॉल की रिकॉर्डिंग जारी की, जिससे यह जाहिर हुआ कि जर्मनी की सेना गुपचुप तरीके से पहले से यूक्रेन में सक्रिय है। लीक ऑडियो टेप में जर्मन वायु सेना के चार वरिष्ठ अधिकारी यूक्रेन युद्ध से जुड़े संभावित परिदृश्यों पर चर्चा करते सुने गए। उन्हें क्राइमिया में एक पुल को उड़ाने की योजना पर विचार करते भी सुना गया। तब से जर्मनी गहरे दबाव में है।

अपनी परिस्थितियों के कारण जर्मनी के चांसलर ओलोफ शोल्ज फिलहाल रूस के खिलाफ प्रत्यक्ष युद्ध में शामिल होने को तैयार नहीं हैं। इस मुद्दे पर उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति से अपनी असहमति सार्वजनिक रूप से जताई है। इस कारण इस सवाल पर यूरोपीय यूनियन में गहरे मतभेदों की खबरें भी चर्चा में बनी हुई हैँ। (France and Germany on the rocks as Ukraine crisis deepens | Responsible Statecraft)

वैसे यह साफ हो चुका है कि यूक्रेनी सेना की मदद के लिए अमेरिकी सहित अन्य पश्चिमी सैन्य विशेषज्ञ यूक्रेन में काफी समय से मौजूद हैं। उन्होंने आधुनिक उपकरणों के संचालन में यूक्रेनी सेना की मदद की है। इसके बावजूद यूक्रेन हार के कगार पर पहुंच चुका है। इससे बनी स्थिति का जिक्र करते हुए फ्रेंच पत्रिका मारियान ने लिखा है कि पश्चिमी देश अब सतर्कता से हटते हुए घबराहट के माहौल में पहुंच गए हैँ। (Guerre en Ukraine : de la prudence à l’affolement… Ce que cache le virage de Macron (marianne।net)) यही घबराहट उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) में शामिल देशों में दिख रहा है।

नाटो नेताओं का उतावलापन देखें, तो उससे यही संकेत मिलता है कि दुनिया पर अपने घटते प्रभाव से उत्पन्न बेचैनी में इन देशों के नेता ऐसे खतरनाक खेल खेल रहे हैं, जिनका परिणाम तीसरे विश्व युद्ध के रूप में सामने आ सकता है। इन देशों के बीच खासकर जी-7 के सदस्यों की बेसब्री खास गौरतलब है।

(नाटो में कुल 32 देश शामिल हैं, जिनमें 30 यूरोपीय देश हैं। उनके अलावा अमेरिका और कनाडा भी इसके सदस्य हैं। वास्तव में इस समूह का नेतृत्व इसके गठन के समय से अमेरिका के हाथ में रहा है। जी-7 दुनिया के सबसे विकसित सात पूंजीवादी देशों- अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, फ्रांस, कनाडा और जापान- का समूह है। मुख्य रूप से यह समूह ही नाटो की संचालक भूमिका में रहा है।)

जी-7 देशों की बेसब्री समझी जा सकती है। दुनिया का पिछले तकरीबन 400 साल का इतिहास इन देशों के वर्चस्व की कहानी है। इस दौर में खासकर यूरोपीय देशों ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में अपने उपनिवेश बनाए। कई जगहों पर तो उन्होंने स्थानीय आबादी का पूरी तरह सफाया कर वहां अपने वंशजों को बसा दिया।

जहां वे ऐसा नहीं कर पाए, वहां की अर्थव्यवस्था और समाज को उन्होंने हिंसक ढंग से क्षतिग्रस्त किया। यूरोपीय देशों की समृद्धि और सैनिक दबदबे का यह प्रमुख कारण रहा है। जिन जगहों के मूलवासी निवासियों को उन्होंने सफाया किया, उनमें आज का संयुक्त राज्य अमेरिका भी है।

अमेरिका का उत्थान 19वीं सदी के आखिरी दशकों में शुरू हुआ और बीसवीं सदी के मध्य में यह अपने चरम पर पहुंचा। अमेरिका को दुनिया की सर्वोपरि महाशक्ति बनाने में प्रथम (1914-18) और द्वितीय (1939-45) महायुद्धों का बड़ा योगदान रहा। ये दोनों लड़ाइयां प्रमुख रूप से यूरोप में लड़ी गईं, जिनमें यूरोपीय देश तबाह हुए।

उधर अमेरिका युद्ध की मार से अछूता बना रहा। दूसरे महायुद्ध की समाप्ति के समय उसकी हैसियत ऐसी बन गई कि नए यूरोप का स्वरूप उसने अपने मास्टरप्लान से ढाला। तब उसने सैनिक और वित्तीय संस्थाएं इस रूप में बनाईं, जिनमें उसका दबदबा बना रहे। नाटो भी उन्हीं में से एक संगठन है।

घोषित तौर पर नाटो की स्थापना कथित कम्युनिस्ट खतरे से बचाव के लिए की गई थी। जब ये सैनिक संगठन बना, तब पूर्वी यूरोप में सोवियत खेमा अभी कुछ समय पूर्व ही अस्तित्व में आया था।

तब शीत युद्ध अपने आरंभिक दौर में था। बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि शीत युद्ध की असल शुरुआत इसी संगठन की स्थापना के साथ ही हुई। इसके ही जवाब में तत्कालीन सोवियत संघ ने वॉरसा संधि नाम से अपने सैनिक संगठन की स्थापना की थी। शीत युद्ध के पूरे काल में नाटो और वॉरसा संधि एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बने रहे।

मिखाइल गोर्बाचेव के दौर में जब सोवियत संघ ने पश्चिमी देशों के साथ रिश्ते बनाने की शुरुआत की, तो उसी कड़ी में एक प्रमुख कदम 1989 में वॉरसा संधि को भंग किया जाना था। यानी सोवियत संघ का विघटन होने के लगभग दो वर्ष पहले ही वॉरसा संधि भंग कर दी गई थी।

अब वो ठोस दस्तावेज सार्वजनिक दायरे में हैं, जिनसे यह साबित होता है कि तब अमेरिका ने गोर्बाचेव को दो टूक आश्वासन दिया था कि वॉरसा संधि खत्म होने के बाद नाटो पूरब की तरफ (यानी सोवियत संघ की दिशा में) अपना एक इंच भी विस्तार नहीं करेगा।

दरअसल, 1991 में जब कम्युनिस्ट खेमा खत्म हो गया, तो उसकी तार्किक परिणति यह होनी चाहिए थी कि नाटो को भी भंग कर दिया जाता। आखिर कथित कम्युनिस्ट खतरे का साया अब पश्चिमी देशों के सिर से हट गया था। चीन ने भी तब अपना रास्ता बदलने के संकेत दिए थे, जिसको लेकर पश्चिम ने पूंजीवाद की निर्णायक जीत का एलान कर दिया था। तब सारी दुनिया ने भूममंडलीकरण के दौर में प्रवेश किया, जिसकी धुरी अमेरिका था।

इसके बावजूद अमेरिका और उसके साथी देशों ने नाटो का विस्तार ना करने का वादा नहीं निभाया। तब से क्रमिक वादाखिलाफी करते हुए उन्होंने कई चरणों में नाटो का विस्तार किया है। धीरे-धीरे वॉरसा संधि में शामिल रहे ज्यादातर पूर्वी यूरोप के देश इसका हिस्सा बन चुके हैं।

रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन खुद यह बता चुके हैं कि कैसे उन्होंने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के सामने रूस को नाटो में शामिल करने का प्रस्ताव रखा था। पुतिन ने बताया कि क्लिंटन ने पहले इसे एक दिलचस्प प्रस्ताव बताया, लेकिन अपनी टीम से सोच-विचार के बाद उनसे कह दिया कि यह संभव नहीं है।

जाहिर है, अमेरिकी विशेषज्ञ नाटो में एक ऐसे देश को शामिल करने के लिए तैयार नहीं हुए जो सैनिक शक्ति में अमेरिका को टक्कर देने की स्थिति में हो। अगर ऐसा होता, तो नाटो को अपने मन-माफिक चलाना अमेरिका के लिए कठिन हो जाता। तब उसे हर निर्णय के लिए नाटो के अंदर रूस से सहमति तैयार करने की जहमत उठानी पड़ती।

जबकि बाद में ऐसे दस्तावेज सामने आए, जिनसे जाहिर हुआ कि अमेरिका का मकसद रूस को इतना कमजोर कर देना रहा है, जिससे वह भविष्य में फिर कभी अमेरिकी वर्चस्व वाली विश्व व्यवस्था को चुनौती ना दे सके। एक प्रस्ताव में तो रूस को चार भागों में विखंडित करने की योजना का उल्लेख भी हुआ था।

पूर्व सोवियत संघ की बहुचर्चित खुफिया एजेंसी केजीबी के अधिकारी के तौर पर अपना करियर शुरू करने वाले व्लादीमीर पुतिन इन पश्चिमी मकसदों से भलिभांति परिचित थे। इसीलिए जब नाटो ने जॉर्जिया और यूक्रेन को खुद में शामिल करने का इरादा जताया, तब उन्होंने अपनी लक्ष्मण रेखा पश्चिम को दो टूक लहजे में बता दी।

इस लिहाज से 2007 में म्यूनिख सिक्युरिटी कांफ्रेंस में दिए गए उनके भाषण (Speech and the Following Discussion at the Munich Conference on Security Policy • President of Russia (kremlin।ru)) को महत्त्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन उससे नाटो के इरादों पर कोई फर्क नहीं पड़ा।

यूक्रेन की 2014 की घटनाओं के बाद पुतिन ने एकतरफा कदम की नीति अपनाई। उसी वर्ष उन्होंने क्राइमिया को रूस में शामिल कर लिया। उसके बाद का इतिहास उस लड़ाई की पृष्ठभूमि बनने का है, जो 24 फरवरी 2022 को यूक्रेन में रूस की विशेष सैनिक कार्रवाई के साथ शुरु हुई। गुजरे दो वर्षों में इस लड़ाई ने दुनिया के शक्ति-संतुलन को बदल दिया है।

इसी बीच पिछले सात अक्टूबर को फिलस्तीनी संगठन हमास ने इजराइल पर अभूतपूर्व हमला किया। समझा जाता है कि इस कार्रवाई के लिए हमास को प्रोत्साहित करने वाले जो कारण रहे, उनमें एक यूक्रेन युद्ध के कारण बदली विश्व परिस्थितियां भी हैं।

इन युद्धों के साये में दुनिया आज किस मुकाम पर है, भू-राजनीतिक विशेषज्ञ- अमेरिकी प्रोफेसर माइकल ब्रेनर की एक टिप्पणी उसका सटीक वर्णन कर देती है। ब्रेनर ने इसी महीने अपने एक विश्लेषण में लिखा- “पश्चिमी नेता दो चौंकाने वाली घटनाओं के रू-ब-बरू हैः यूक्रेन में हार और फिलस्तीन में नरसंहार।

पहली घटना अपमानजनक है और दूसरी शर्मनाक। इसके बावजूद उन्हें ना तो अपमान महसूस होता है, और ना ही शर्म। उनके कदमों से जाहिर होता है कि ये नेता इन भावनाओं से परे हैं- उनमें गहरी बैठी अंध-आस्था, अहंकार और असुरक्षा की भावना के कारण ये भावनाएं उनके मन को नहीं छू पातीं। इसका कारण व्यक्तिगत भी है और राजनीतिक भी।

और यही एक पहेली है। लेकिन अगर परिणाम पर ध्यान दें, तो कहा जाएगा कि पश्चिम सामूहिक आत्म-हत्या की राह पर चल पड़ा है। वह गजा में नैतिक आत्म-हत्या कर रहा है। साथ ही साथ वह कूटनीतिक आत्म-हत्या भी कर रहा है, जिसकी बुनियाद यूरोप से लेकर मध्य पूर्व और पूरे यूरेशिया तक फैली हुई है।

इसके साथ वह आर्थिक आत्म-हत्या कर रहा है- डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय सिस्टम के लिए जोखिम पैदा हो गए हैं, यूरोप के उद्योग-धंधे खत्म (deindustrializing) हो रहे हैं। यह कोई अच्छी तस्वीर नहीं है। यह आत्म-विनाश है, जो बिना किसी बाहरी या आंतरिक सदमे के हो रहा है।” (Michael Brenner: The West’s Reckoning? – ScheerPost)

ब्रेनर ने पूरे परिदृश्य को समग्र रूप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने उन तीनों पहलुओं का जिक्र किया है, जिनकी वजह से दुनिया पर पश्चिम का वर्चस्व टूटने की परिघटना तेज हो गई हैः

-यूक्रेन युद्ध ने पश्चिम की साझा सैन्य शक्ति की सीमाओं को स्पष्ट कर दिया है। यह रूस- यानी उस शक्ति के सामने हुआ है, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति पद के पूर्व उम्मीदवार जॉन मैकेन ने एक ऐसा ‘पेट्रोल पंप कहा था, जिसके पास परमाणु हथियार भी हैं।’ यानी उस देश के सामने, जिसे पश्चिम एक बड़ी शक्ति मानने को तैयार ही नहीं था।

अमेरिकी सैनिक शक्ति की सीमाओं का इजहार यमन के अंसारुल्लाह (हूती) गुट के सामने भी हुआ है, जिसने पिछले दो महीनों से हर व्यावहारिक रूप में लाल सागर में परिवहन रोक रखा है। अमेरिकी गठबंधन उस मार्ग को खुलवाने में एक ऐसी ताकत के आगे विफल बना हुआ है, जिसे रेगुलर सेना भी नहीं माना जाता।

-खुद अमेरिका में यह पहलू चर्चा में है कि क्या इन हालात के बीच वह चीन का मुकाबला करने की स्थिति में होगा, जिसने हाइपरसोनिक तकनीक में महारत हासिल कर ली है। (China Leads the US, Russia in Hypersonics, Pentagon Analyst Says – Bloomberg)

-गजा में अमेरिकी संरक्षण में जारी इजराइली नरसंहार ने दुनिया में पश्चिम की नैतिक साख को जिस हद तक ध्वस्त किया है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ था। इस घटनाक्रम ने यह भी दिखाया है कि दुनिया का नैटेरिटव सेट करने की पश्चिमी ताकत अब चूक गई है। न सिर्फ पश्चिमी के बाहर, बल्कि खुद अमेरिका और यूरोप की जनता के भी बहुत बड़े हिस्से ने गजा में नरसंहार को उस रूप में नहीं देखा है, जैसा बताने की कोशिश पश्चिमी शासक वर्ग एवं मेनस्ट्रीम मीडिया ने की है।

-ब्रेनर ने तीसरे पहलू के रूप में डॉलर के चूकते वर्चस्व और यूरोप के deindustrialization की चर्चा की है। यह दरअसल, एक ऐसा घटनाक्रम है, जो खासकर अमेरिकी वर्चस्व की जड़ें खोद रहा है। बेशक, ये घटनाक्रम दो साल पहले रूस के पश्चिमी बैंकों में रखे 300 बिलियन डॉलर को जब्त करने, रूस को डॉलर में भुगतान के सिस्टम स्विफ्ट से मनमाने ढंग से बाहर करने, और उस पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण आगे बढ़ा है, लेकिन इसकी वजहें खुद पश्चिमी अर्थव्यवस्था के अति-वित्तीयकृत (over finacialized) ढांचे में भी हैं।

इन घटनाक्रमों ने आम राय बना दी है कि दुनिया अब शक्ति संतुलन और समीकरणों नए मुहाने पर पहुंच गई है। इसे बहु-ध्रुवीय विश्व-व्यवस्था का प्रार्दुभाव कहा जा रहा है। इस नई हकीकत को पश्चिम सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहा है। इस दिशा को पलटना उसके वश में नहीं है। तो ऐसे में आखिरी दांव के तौर पर वह सिर्फ यही कर सकता है कि सारी दुनिया को युद्ध में उलझा दे। लेकिन यह बेहद जोखिम-भरा दांव है, जिसमें बाकी दुनिया सहित खुद पश्चिम का अस्तिव भी खतरे में पड़ जाएगा।

By सत्येन्द्र रंजन

वरिष्ठ पत्रकार। जनसत्ता में संपादकीय जिम्मेवारी सहित टीवी चैनल आदि का कोई साढ़े तीन दशक का अनुभव। विभिन्न विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता के शिक्षण और नया इंडिया में नियमित लेखन।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

और पढ़ें

Naya India स्क्रॉल करें