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रिश्तों का अनकहा जायका: ‘द इनवाइट’

हिंदी सिनेमा में रिश्तों पर एक नई लहर आने की ज़रूरत है। ऐसी फ़िल्में जो उपदेश न दें, फैसला न सुनाएं, बल्कि सवाल पूछें। जो दर्शक को सोचने का मौका दें। द इनवाइटयही करती है। इस फ़िल्म का सबसे बड़ा सबक यही है कि रिश्ते किसी एक बड़े झगड़े से नहीं टूटते। वे धीरे-धीरे चुप्पियों में कमज़ोर होते हैं। जब लोग एक-दूसरे से बातें करना छोड़ देते हैं, तब दूरी शुरू होती है।

सिने -सोहबत

कई बार एक फ़िल्म आपको हंसाती है। कई बार सोचने पर मजबूर करती है। और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि फ़िल्म खत्म होने के बाद भी उसके सवाल आपके साथ घर तक चले आते हैं। ‘द इनवाइट’ ऐसी ही फ़िल्म है।

ऊपर से देखें तो यह सिर्फ़ चार लोगों की डिनर पार्टी है। लेकिन जैसे-जैसे रात आगे बढ़ती है, बातचीत उन रास्तों पर निकल जाती है, जहां हर शादीशुदा जोड़ा कभी न कभी पहुंचता है। प्यार, भरोसा, बोरियत, इच्छा, झूठ, सच और रिश्तों की वह चुप्पी, जिसके बारे में हम अक्सर बात ही नहीं करते।

निर्देशक ओलिविया वाइल्ड ने इस फ़िल्म को बहुत सादगी से बनाया है। न कोई बड़ा एक्शन है, न तेज़ रफ्तार कहानी और न ही ऐसे ट्विस्ट जो सिर्फ चौंकाने के लिए हों। पूरी फ़िल्म बातचीत पर टिकी है। लेकिन यही बातचीत धीरे-धीरे दर्शक को अपने भीतर खींच लेती है।

यह फ़िल्म 2020 की  स्पेनिश फ़िल्म ‘द पीपल अप्सटेयर्स (सेंटीमेंटल)’ का अंग्रेज़ी रीमेक है। लेकिन इसे देखकर बिल्कुल नहीं लगता कि सिर्फ़ कहानी उठाकर दूसरी भाषा में रख दी गई है। पटकथा लेखक विल मैककॉर्मैक और रशीदा जोन्स ने इसे अमेरिकी समाज के हिसाब से नया रंग दिया है। इसलिए फ़िल्म अपनी अलग पहचान बनाती है।

कहानी एक शादीशुदा जोड़े से शुरू होती है। जो (सेथ रोगन) और एंजेला (ओलिविया वाइल्ड) की शादी अब उस मोड़ पर है, जहां प्यार से ज़्यादा आदत बची हुई है। जिंदगी चल रही है, लेकिन पहले वाली गर्माहट नहीं रही। तभी उनके पड़ोसी, हॉक (एडवर्ड नॉर्टन) और पीना (पेनेलोप क्रूज़) डिनर पर आते हैं। बातचीत के दौरान वे अपने रिश्ते के बारे में ऐसी बात बताते हैं जो पूरे माहौल को बदल देती है।

यहीं से फ़िल्म शुरू होती है। असली कहानी बाहर नहीं, चारों किरदारों के अंदर चलती है।

सबसे अच्छी बात यह है कि फ़िल्म किसी का फैसला नहीं सुनाती। यह नहीं कहती कि कौन सही है और कौन गलत। बस सवाल पूछती है। क्या शादी सिर्फ़ साथ रहने का नाम है? क्या हम अपने पार्टनर से हर बात सच-सच कहते हैं? क्या प्यार हमेशा वैसा ही रहता है जैसा शुरुआत में था? और अगर नहीं रहता, तो क्या इसका मतलब रिश्ता खत्म हो गया?

यही वजह है कि फ़िल्म देखने वाला हर इंसान अपने हिसाब से जवाब ढूंढ़ता है।

ओलिविया वाइल्ड का निर्देशन बहुत संतुलित है। उन्होंने फ़िल्म को किसी टीवी डिबेट की तरह नहीं बनने दिया। कई बार सिर्फ़ एक नज़र, एक छोटी-सी मुस्कान या कुछ सेकंड की चुप्पी, लंबे संवाद से ज़्यादा असर छोड़ती है। कैमरा भी ज़्यादातर चेहरों पर टिका रहता है, क्योंकि इस कहानी का सबसे बड़ा ड्रामा लोगों के मन के अंदर चल रहा है।

सेथ रोगन को लोग आम तौर पर कॉमेडी फ़िल्मों के लिए जानते हैं। लेकिन यहां उनका बिल्कुल अलग रूप देखने को मिलता है। वे मज़ेदार भी हैं और टूटे हुए भी। उनका किरदार शायद हर उस इंसान जैसा लगता है जिसने नौकरी, जिम्मेदारियों और रोजमर्रा की ज़िंदगी में कहीं खुद को पीछे छोड़ दिया है।

ओलिविया वाइल्ड ने भी अभिनय में कमाल किया है। उनका किरदार ज़ोर-ज़ोर से नहीं बोलता, लेकिन उसकी खामोशी बहुत कुछ कह जाती है।

और फिर आती हैं पेनेलोप क्रूज़। फ़िल्म खत्म होने के बाद अगर कोई सबसे ज़्यादा याद रह जाता है, तो वह यही किरदार है। उनमें एक अजीब-सी आज़ादी है। वे हर सीन में ऊर्जा लेकर आती हैं। आप उनसे सहमत हों या नहीं, लेकिन उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। एडवर्ड नॉर्टन हमेशा की तरह बेहद सहज हैं। उनका अभिनय इतना नियंत्रित है कि कई बार सिर्फ़ उनकी आंखें पूरा संवाद बोल देती हैं।

चारों कलाकारों की केमिस्ट्री इस फ़िल्म की सबसे बड़ी ताकत है।

फ़िल्म का सबसे दिलचस्प पहलू उसका हास्य है। यहां कॉमेडी ज़ोर से हंसाने के लिए नहीं है। कई बार आप किसी बात पर हंसते हैं और अगले ही पल महसूस होता है कि वही बात तो आपके आसपास भी होती है। यही इस फ़िल्म की असली जीत है।

आज दुनिया भर में रिश्तों पर बातें पहले से ज़्यादा खुलकर हो रही हैं। लेकिन हमारे यहां सिनेमा अभी भी इस विषय पर थोड़ा संकोच करता है। या तो पति-पत्नी को आदर्श बना दिया जाता है या फिर कहानी सीधे बेवफाई तक पहुंच जाती है। इनके बीच की दुनिया पर बहुत कम फ़िल्में बनती हैं। ‘द इनवाइट’ उसी बीच वाली दुनिया की फ़िल्म है।

यही वजह है कि मुझे लगता है कि भारतीय फ़िल्मकारों को यह फ़िल्म ज़रूर देखनी चाहिए। इसलिए नहीं कि इसका रीमेक बनाया जाए, बल्कि इसलिए कि इससे यह सीखा जाए कि बड़ी फ़िल्म बनाने के लिए हमेशा बड़ा बजट नहीं चाहिए। चार अच्छे कलाकार, एक मजबूत स्क्रिप्ट और ईमानदार संवाद भी दर्शकों को दो घंटे तक सीट से बांधे रख सकते हैं

हमारे यहां आज भी कई निर्माता मानते हैं कि दर्शक सिर्फ बड़े सेट, गाने या एक्शन देखने आता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भारतीय दर्शक ने बार-बार साबित किया है कि अगर कहानी अच्छी हो तो वह छोटे शहर की कहानी भी देखेगा, एक कमरे में बनी फ़िल्म भी देखेगा और ऐसे किरदार भी पसंद करेगा जो बिल्कुल उसके जैसे हों।

मुझे लगता है कि हिंदी सिनेमा में रिश्तों पर एक नई लहर आने की ज़रूरत है। ऐसी फ़िल्में जो उपदेश न दें, फैसला न सुनाएं, बल्कि सवाल पूछें। जो दर्शक को सोचने का मौका दें। ‘द इनवाइट’ यही करती है।

इस फ़िल्म का सबसे बड़ा सबक यही है कि रिश्ते किसी एक बड़े झगड़े से नहीं टूटते। वे धीरे-धीरे चुप्पियों में कमज़ोर होते हैं। जब लोग एक-दूसरे से बातें करना छोड़ देते हैं, तब दूरी शुरू होती है।

ओलिविया वाइल्ड ने इस छोटी-सी कहानी के ज़रिए बहुत बड़ी बात कह दी है।

‘द इनवाइट’ सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं, बल्कि रिश्तों पर होने वाली एक लंबी बातचीत है। ऐसी बातचीत, जो शायद फ़िल्म खत्म होने के बाद आपके अपने घर में भी शुरू हो जाए। और अगर कोई फ़िल्म ऐसा कर सके, तो समझिए उसने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया है।

नज़दीकी सिनेमाघर में है। देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)

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