एआई का जिस तेजी से विकास हो रहे है और उसके नए-नए टूल्स आ रहे हैं, उससे मौजूदा अर्थव्यवस्था के बीच रोजगार बाजार में उथल-पुथल मचना तय है। लेकिन तकनीक के बदलाव को रोका नहीं जा सकता। फिर भी लोग विकल्पहीन नहीं हैं। उनके पास नई आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था बनाने का विकल्प मौजूद है।
आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) रिसर्च एवं डेवलमेंट कंपनी एंथ्रोपिक के नए एआई टूल्स ने शेयर बाजारों में उथल-पुथल मचाई। यह जनवरी 2025 में चीन के चैटबॉट डीपसीक के लॉन्च होने पर मची उथल-पुथल जितनी व्यापक तो नहीं थी, फिर भी टेक कंपनियों के शेयरों के भाव में काफी गिरावट देखी गई। एंथ्रोपिक के नए AI टूल्स में विशेष रूप से लीगल ऑटोमेशन टूल और एजेंटिक प्लग‑इन्स शामिल हैं। इन टूल्स के कारण निवेशकों को डर है कि पारंपरिक SaaS (Software as a Service) मॉडल और आईटी सेवाओं की मांग घट सकती है। इसी आशंका का दुष्प्रभाव बड़ी टेक कंपनियों के शेयर भाव पर पड़ा।
- एंथ्रोपिक ने अपने एआई मॉडल Claude को ऐसा रूप दिया है, जिससे वह किसी कंपनी, टीम, या विशेषज्ञ सहकर्मी की तरह काम कर सकेगा।
- यह टूल कॉन्ट्रैक्ट रिव्यू, लीगल ब्रीफिंग, और अन्य नियमित कानूनी कार्यों को स्वचालित करने में सक्षम है।
- Claude में शामिल प्लग‑इन्स एंटरप्राइज प्रोसेस को ऑटोमेट कर सकते हैं, जिससे पारंपरिक SaaS कंपनियों के बिज़नेस मॉडल पर असर पड़ने का अंदेशा है। निवेशकों को चिंता है कि अगर एआई टूल्स सीधे एंटरप्राइज प्रोसेस संभालने लगेंगे, तो पारंपरिक सॉफ्टवेयर प्लेटफ़ॉर्म्स की मांग घट जाएगी। उधर लीगल और एनालिटिक्स सॉफ्टवेयर कंपनियों को सीधी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा।
जानकारों के मुताबिक एंथ्रोपिक का नया लॉन्च सिर्फ़ तकनीकी प्रगति नहीं है, बल्कि यह सॉफ्टवेयर और आईटी सेवाओं के बिज़नेस मॉडल को चुनौती देने वाला कदम है। इसका अर्थ है कि कार्य ऑटोमेशन अब अपने चौथे चरण में तीव्र गति से आगे बढ़ने लगा है। इस चरण का खराब असर ह्वाइट कॉलर कर्मियों- यानी मानसिक श्रम करने वाले कर्मचारियों पर पड़ेगा। आशंका है कि एआई का उपयोग बढ़ने के साथ-साथ उनकी नौकरियां बड़ी संख्या में खत्म होंगी।
कार्य स्वचालन का पहला चरण यांत्रिक ऑटोमेशन (18वीं-19वीं सदी) था। औद्योगिक क्रांति के दौरान भाप इंजन और यांत्रिक मशीनों ने मानव और पशु श्रम की जगह ली। कपड़ा मिलों में बुनाई की मशीनों और कारखानों में उत्पादन के नए उपकरणों ने शारीरिक श्रम का स्थान लिया। ब्रिटेन में इसी दौर में Luddite आंदोलन हुआ था, जब कारीगरों ने मशीनों को नष्ट किया, क्योंकि उन्हें मशीनें अपनी नौकरी के लिए खतरा मालूम पड़ती थीं। लेकिन वे मशीनीकरण को रोक नहीं पाए।
कार्य स्वचालन का दूसरा चरण विद्युत और असेंबली लाइन ऑटोमेशन (20वीं सदी की शुरुआत) के रूप में आया। बिजली के आगमन और कारखानों में मशीनों के अधिक इस्तेमाल ने बड़े पैमाने पर उत्पादन को संभव बनाया। यह अर्ध-स्वचालित (semi-automated) प्रक्रिया थी, जहां मानव श्रमिक मशीनों का इस्तेमाल करते थे। इस दौर में कई हस्तशिल्प और पारंपरिक काम खत्म हो गए।
कार्य स्वचालन का तीसरा चरण था- कंप्यूटर और डिजिटल ऑटोमेशन (1950-2000)। इसे कंप्यूटर, रॉबोट्स और programmable logic controllers (PLCs) का युग कहा जाता है। कारखानों में औद्योगिक रॉबोट्स, कार्यालयों में कंप्यूटर, एटीएम मशीनें, आदि, इस दौर की पहचान हैं। इस दौर में blue-collar यानी शारीरिक श्रम वाली नौकरियों का बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ।
फिलहाल हम कार्य स्वचालन के चौथे चरण में हैं। यह एआई और स्मार्ट ऑटोमेशन (साल 2000 से अब तक) का युग है। इसमें एआई, मशीन लर्निंग, और एडवांस्ड रॉबोटिक्स का उपयोग हो रहा है। यह पिछले चरणों से अलग है, क्योंकि:
- इसमें केवल शारीरिक या बार-बार दोहराव वाले (repetitive) काम ही नहीं, बल्कि cognitive (संज्ञानात्मक) और creative (रचनात्मक) कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं। मसनल, चैटबॉट जैसे टूल्स लेखन, कोडिंग, डिजाइन आदि करने में सक्षम हैं। स्वचालित वाहन, स्वचालित चिकित्सकीय परीक्षण, स्वचालित वैधानिक अनुसंधान आदि इस दौर की पहचान बन रहे हैं। इस वजह से मानसिक श्रम करने वाले पेशेवर कर्मियों- यानी वकीलों, एकाउंटैंड्स, पत्रकारों, प्रोग्रामरों आदि की नौकरी खतरे में है। एंथ्रोपिक कंपनी के सीईओ डेरियो एमोदेई ने तो यहां तक कहा है कि अगले छह से 12 महीनों में सॉफ्टवेयर इंजीनियरों की भूमिका पूरी तरह खत्म हो सकती है। (https://x।com/Nigel__DSouza/status/2019624999582331357?s=20)
कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक कार्य स्वचालन का पांचवां चरण भी आने वाला है। तब एआई टूल्स मानव मेधा से होने वाले हर कार्य को कर सकेंगे। वह AGI- Artificial General Intelligence- का दौर होगा। हालांकि यह अवधारणा अभी अपने सैद्धांतिक चरण में ही है।
तो सूरत यह बन रही है कि औद्योगिक क्रांति के दौरान ऑटोमेशन प्रक्रिया ने जिस तरह कारीगरों की नौकरियां छीनीं, या कंप्यूटर या रॉबोट्स ने कुशल कर्मियों को बेरोजगार बनाया, उसी तरह एआई के नए टूल्स शिक्षित मध्य वर्ग से “मध्यम-वर्गीय जीवन” के अवसर छीन लेंगे। इसके क्या नतीजे होंगे? इस बारे में अभी सिर्फ अंदाजा लगाया जा रहा है, लेकिन ये महज कोरे अनुमान नहीं हैं। आखिर शिक्षित मध्य वर्ग उच्च-स्तरीय जीवन का आकांक्षी वर्ग होता है, जिसके पास सियासी गोलबंदी के बेहतर संसाधन मौजूद होते हैं। अक्सर देखा गया है कि इस वर्ग में असंतोष ने सामाजिक उथल-पुथल को जन्म दिया है।
Clio-dynamics (इतिहास के गणितीय अध्ययन की विधा) के विशेषज्ञ पीटर टर्चिन का elite overproduction (समाज में भद्रलोक की अत्यधिक संख्या) का सिद्धांत बहुचर्चित है। टर्चिन के अनुसार यह स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब समाज में उपलब्ध इलीट पदों की तुलना में शिक्षित, महत्त्वाकांक्षी, और संपन्न लोगों की संख्या अधिक हो जाती है। जब बहुत सारे लोग सत्ता, प्रतिष्ठा, और धन के सीमित पदों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, तो यह राजनीतिक अस्थिरता का कारण बनता है।
टर्चिन के मुताबिक इस सूरत में Counter-elites (विरोध भाव वाले भद्रलोक) का उदय होता है, जो मौजूद व्यवस्था को चुनौती देते हैं। उस स्थिति में राजनीतिक ध्रुवीकरण तीखा हो जाता है। समझा जाता है कि अनेक विकसित एवं विकासशील समाज अभी इस दौर में हैं। टर्चिन के अनुसार अमेरिका में 2020 के दशक के अंत तक ये संकट अपने चरम पर पहुंच सकता है। वहां विभिन्न विषयों में कॉलेज स्नातकों और पीएचडी धारकों की संख्या काफी बढ़ी है, लेकिन अच्छी नौकरियों में उतनी वृद्धि नहीं हुई है। साथ ही टॉप एक प्रतिशत आबादी के पास संपत्ति केंद्रित होने की प्रक्रिया ने सभ्रांत वर्ग के भीतर तनाव बढ़ाया है। यह अति-अमीर बनाम सिर्फ अमीर (या साधन संपन्न) वर्ग का तनाव है। सोशल मीडिया के प्रसार के साथ counter-elites को अपनी आवाज बुलंद करने का माध्यम मिला है।
ये परिघटना पहले से जारी थी। इसी बीच एआई का जोरदार एवं तीव्र गति से आगमन हुआ है। मतलब यह कि अब तक सभ्रांत वर्ग के लिए जिन नौकरियों की गारंटी थी, उनकी संख्या भी तेजी से घटने लगी है। जब लाखों लोगों ने उच्च शिक्षा में भारी निवेश किया हो, लेकिन एआई उनके काम छीन ले, तो उन लोगों की डिग्री मूल्यहीन हो जाएगी। यह असंतोष का बड़ा स्रोत बन सकता है। यानी सीमित बचे पदों के लिए संघर्ष काफी तीखा होगा, और इसमें जो नाकाम रहे लोग असंतोष का शिकार बनेंगे।
इसीलिए अनेक विश्लेषक यह मानते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का तेजी से विकास आधुनिक अर्थव्यवस्था की नींव को हिला सकता है। ये तकनीक मौजूदा पूंजीवादी ढांचे के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है। पूंजीवाद की केंद्रीय धारणा है कि लोग अपने श्रम के बदले मजदूरी कमाते हैं। लेकिन जब अधिकांश लोगों के पास अपने श्रम को बेचने के अवसर नहीं होंगे, तो वे कैसे जीवनयापन करेंगे? और मुद्दा सिर्फ यह नहीं है कि इससे असंतुष्ट लोगों की फौज खड़ी होगी।
बल्कि इसका परिणाम यह भी होगा कि बेरोजगारी के कारण क्रय शक्ति वाले लोगों की संख्या तेजी से घटेगी। यानी लोगों के पास सामग्रियां खरीदने के लिए पैसे नहीं होंगे। तब बाजार का क्या होगा? पूंजीपति अपना उत्पादन कहां बेचेंगे? इस तरह अंततः यह परिघटना उत्पादकता और मुनाफे की दर को भी प्रभावित करेगी।
आखिरकार अर्थव्यवस्था में मूल्य मानव श्रम से ही उत्पन्न होता है। पूंजीपति मूल्य का एक हिस्सा श्रमिकों को देते हैं और बाकी बचे हिस्से (सरप्लस) को हड़प लेते हैँ। पूंजीवादी मुनाफे का स्रोत यही है। मगर एआई के व्यापक उपयोग से पूंजी संचय के पारंपरिक मॉडल के लिए भी संकट खड़ा होने की संभावना है।
इसके अलावा पूंजीवाद की साख या औचित्य का सवाल है। पूंजीवाद लोगों में यह भरोसा बंधाए रखने पर टिका है कि कड़ी मेहनत करो तो तुम्हें उसका इनाम मिलेगा। मगर एआई इस धारणा को तोड़ता दिख रहा है। जाहिर है, उससे व्यवस्था की वैधता सवालों के घेरे में आ रही है।
हालांकि एक जवाबी तर्क यह है कि एआई के उपयोग से पैदा होने वाली बेरोजगारी की भरपाई इसकी मरम्मत और रखरखाव की प्रक्रिया में नए सृजित होने वाले रोजगार से हो जाएगी। लेकिन अतीत के स्वचालन की प्रक्रिया पर गौर करें, तो साफ होता है कि ऐसे तर्क अक्सर व्यावहारिक रूप नहीं लेते। ऐसा सिर्फ तभी होता है, जब राज्य उपयुक्त नीतियों पर अमल करता है। इसलिए आज के नव-उदारवादी दौर में ऐसी आशा का फिलहाल कोई आधार नहीं दिखता।
हाल में दावोस में वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम की सालाना बैठक के दौरान दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी एलन मस्क ने स्वीकार किया कि एआई से व्यापक रूप से लोग बेरोजगार होंगे। इसलिए उन्होंने सुझाव दिया कि एआई यूजर्स पर टैक्स लगाया जाए और उससे बेरोजगार हुए लोगों को मुआवजा दिया जाए। लेकिन सुझावों पर अमल की कोई ठोस सूरत मौजूद नहीं है। जब राजनीतिक व्यवस्थाओं पर धनी वर्ग ने पूरा नियंत्रण बना लिया हो, तब वह सरकारों को ऐसा करने की इजाजत देगा, इसकी संभावना कम ही है।
तो फिर श्रमिक वर्ग क्या करे? क्या वह Luddites की तरह नादानी भरा रुख अपनाए और एआई टूल्स के उपयोग के ठिकानों को निशाना बनाए? या वह वैसे विरोध का हिस्सा बने, जिसके पास नया समाज गढ़ने का कोई सपना नहीं होता? अब तक का तजुर्बा यही है कि ऐसे प्रतिरोध या विद्रोह से कोई समाधान नहीं निकलता। ऐसा तभी होता है, जब प्रतिरोध का नेतृत्व वैसी शक्ति करे, जिसके पास नई व्यवस्था निर्मित करने की सोच हो।
मशहूर अर्थशास्त्री एवं मार्क्सवादी चिंतक प्रभात पटनायक की इस टिप्पणी पर गौर करें- “यह तथ्य कि एआई का उपयोग नौकरियां नष्ट करेगा, निर्विवाद है। लेकिन इस पूरी चर्चा में जो बात नजरअंदाज हो जाती है, वो यह है कि समस्या एआई में नहीं, बल्कि पूंजीवाद में निहित है। एलन मस्क के एआई यूजर्स पर कर लगाने के सुझाव पर विचार करें। मान लीजिए 100 व्यक्ति एक काम करने के लिए रखे गए थे। एआई के उपयोग से उनमें से 50 बेरोजगार हो जाते हैं। इन 50 लोगों को पहले जितना वेतन मिलता था, उतना ही मुआवजा दिया जाए (अगर उन्हें उनके वेतन से कम बेरोजगारी भत्ता मिलेगा, तो अर्ध बेरोजगारी की सामाजिक समस्या कायम रहेगी), तो वेतन बिल में कोई कमी नहीं आएगी। ऐसे मामले में कंपनियां एआई का उपयोग टाल देंगी, क्योंकि इससे उन्होंने लाभ नजर नहीं आएगा। मुनाफा तभी बढ़ेगा, जब एआई रोजगार घटाते हुए उत्पादन भी बढ़ाए। यानी टर्नओवर तभी मुनाफा देगा, जब वह रोजगार एवं संभावित रोजगार को कम करे…
पूंजीवाद का तर्क ऐसा है कि इस व्यवस्था के तहत तकनीकी प्रगति बेरोजगारी बढ़ाती है, भले बेरोजगारों के लिए कोई भी मुआवजा योजनाएं लागू की जाएं।…
मगर इसकी तुलना समाजवादी व्यवस्था के तहत एआई को अपनाने की स्थिति से करें। समाजवादी आर्थिक व्यवस्था में एआई के उपयोग से बेरोजगारी की समस्या असल में कम होगी। तब श्रमिकों के वास्तविक वेतन में बिना किसी कटौती के हर श्रमिक के लिए अधिक अवकाश सुनिश्चित किया जा सकेगा, क्योंकि वहां प्राथमिकता वेतन बिल को घटाना नहीं होगी। समाजवादी समाज में तकनीकी प्रगति सभी के जीवन स्तर में सुधार करती है। प्रत्येक व्यक्ति को काम की कठिन और ऊबाऊ मेहनत से मुक्त करती है और हरेक को अपनी आंतरिक रचनात्मकता विकसित करने का समय देती है।…
ऊपर दिया गया वही उदाहरण इस बिंदु को स्पष्ट कर देगा। अगर अब 50 व्यक्ति वह काम कर सकते हैं, जहां पहले 100 करते थे, तो प्रत्येक के कार्य घंटे काम करते हुए और वेतन दर अपरिवर्तित रखते नई कार्य स्थिति बनाई जाएगी। पूंजीवाद की तरह 50 श्रमिकों को काम से बर्खास्त करने के बजाय वही 100 लोग काम करना जारी रखेंगे; लेकिन प्रत्येक का कार्य दिवस आधा हो जाएगा, जबकि वेतन पहले जितना ही मिलेगा। इस तरह उत्पादन में मुनाफे का हिस्सा पहले की तुलना में अपरिवर्तित रहेगा। तकनीकी प्रगति का प्रभाव श्रमिकों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए होगा, हरेक के लिए काम का समय और मेहनत घटाने के लिए- ना कि मुनाफा बढ़ाने के लिए।”
एआई के अलग उपयोग और उसके अलग प्रतिमान हो सकते हैं, इसकी एक झलक आज चीन में देखने को मिलती है। चीन का एआई मॉडल मिला-जुला (hybrid) है, जिसमें राज्य का नियंत्रण है, तो बाजार की ताकतों की उपस्थिति भी है। वहां निजी क्षेत्र की बड़ी टेक कंपनियां एआई विकास में सक्रिय हैं, लेकिन वे सरकारी नीतियों के दायरे में काम करती हैं। यह इस रूप में पश्चिमी मॉडल से अलग है कि अंतिम नियंत्रण राज्य के पास रहता है। बेशक चीन का यह मॉडल भी शुद्ध समाजवादी नहीं है। वहां बाजार के तत्व मौजूद हैं। लेकिन यह पूंजीवादी भी नहीं है, क्योंकि राज्य का प्रभुत्व कायम है।
नतीजा, चीन में एआई को लेकर आम तौर पर जन भावना सकारात्मक है, जबकि अमेरिका में लोग इससे भयभीत हैँ। इस तथ्य को हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के दो वैज्ञानिक सलाहकारों ने एक पॉडकास्ट के दौरान स्वीकार किया। (https://podcasts।apple।com/us/podcast/inside-americas-ai-strategy-infrastructure-regulation/id1502871393?i=1000746295746)
कहने का तात्पर्य यह कि एआई का जिस तेजी से विकास हो रहे है और उसके नए-नए टूल्स आ रहे हैं, उससे मौजूदा अर्थव्यवस्था के बीच रोजगार बाजार में उथल-पुथल मचना तय है। लेकिन तकनीक के बदलाव को रोका नहीं जा सकता। फिर भी लोग विकल्पहीन नहीं हैं। उनके पास नई आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था बनाने का विकल्प मौजूद है।


