‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने जो खुलासा किया है उससे विपक्ष के आरोपों की पुष्टि हुई है। इससे पहले जब राहुल गांधी और दूसरी विपक्षी पार्टियों के नेता आरोप लगाते थे कि एसआईआर में धांधली हो रही है या वोट चोरी किया जा रहा है तो लोगों को लगता था कि यह हारे हुए नेताओं का प्रलाप है। इसलिए उन पर ध्यान नहीं दिया जाता था या उनका मजाक उड़ाया जाता था। लेकिन अब आम आदमी, जिसमें भाजपा को वोट देने वाले लोग भी हो सकते हैं उनके मन में यह बात बैठेगी कि विपक्ष ठीक कह रहा था। विपक्ष जो कह रहा था उसमें कुछ तो दम है।
अगर इतना भी लोग मानने लगें तो यह विपक्ष की बड़ी जीत है। इसका सबसे बड़ा असर यह होगा कि दूसरे मामलों में भी आम मतदाता विपक्ष को गंभीरता से लेने लगेगा। ध्यान रहे राहुल गांधी सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त की मनमानियों को निशाना नहीं बना रहे हैं। उनके निशाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह हैं। तभी उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को यह ऑफर दिया कि वे इस्तीफा दे दें और सरकारी गवाह बन जाएं। राहुल ने यह संदेश दिया कि ज्ञानेश कुमार छोटा पुर्जा हैं, जो ऊपर से संचालित होते हैं और अगर वे सरकारी गवाह बनते हैं तो ऊपर वालों की पोल खुलेगी। तब बड़ी ग़ड़बड़ियां सामने आएंगी। इस खुलासे से राहुल गांधी की कॉन्फिडेंस कितना बड़ा यह उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिख रहा था। उनकी बॉडी लैंग्वेज वैसी थी, जैसी अमेरिका के प्रेसिडेंट इलेक्ट की होती है। वे जिस अंदाज में मुख्य चुनाव आयुक्त को सरकारी गवाह बनने का ऑफर दे रहे थे उससे लग रहा था कि उनकी सरकार आ चुकी है। यह भी धारणा के स्तर पर विपक्ष की बड़ी जीत है।
बहरहाल, अभी अखबार की रिपोर्ट से जो पोल खुली है वह एसआईआर के बाद की हैं। पर 10 महीने पहले क्या हो रहा था? क्या 10 महीने पहले सब कुछ ठीक था? क्या जून 2025 में बिहार में हुआ एसआईआर सही था? ध्यान रहे राहुल ने एसआईआर से पहले कर्नाटक और महाराष्ट्र में मनमाने तरीके से वोट काटने और वोट जोड़ने का मुद्दा उठाया था। राहुल ने वोट काटने और जोड़ने के अलावा यह मुद्दा भी उठाया था कि मतदान समाप्त होने के बाद कैसे वोटिंग प्रतिशत में इतनी बढ़ोतरी हो रही है। राहुल ईवीएम से छेड़छाड़ की बात नहीं करते हैं लेकिन चुनाव में अनेक किस्म की गड़बड़ियों के बारे में बताते हैं।
सो, अगर सिर्फ एसआईआर का मामला रहे और सारा ठीकरा ज्ञानेश कुमार पर फूट जाए तो उनका उद्द्श्य पूरा नहीं होगा। वे इस लड़ाई को बड़ा बना रहे हैं। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने अपनी रिपोर्ट में उन तमाम गड़बड़ियों के लक्षण बता दिए हैं। रिपोर्ट से यह स्थापित हुआ है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने सारी शक्तियों का केंद्रीकरण कर लिया था। उनके कार्यालय से सब कुछ संचालित हो रहा था। राज्यों के मुख्य चुनाव अधिकारी यानी सीईओ, जिला चुनाव अधिकारी यानी डीईओ और जिला स्तर पर मतदाता पंजीयन अधिकारी यानी ईआरओ के हाथ में कुछ नहीं था। ज्ञानेश कुमार का कार्यालय जब चाहता था तब उन्हें सेंट्रल डाटा को एक्सेस करने से रोक देता था। नाम जोड़ने या काटने या उनमें कोई सुधार करने का काम कानूनी रूप से ईआरओ का है, लेकिन उनको यह काम करने से रोके जाने की खबर भी आई है।
एसआईआर में एक चिंताजनक पहलू तो यह है ही कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों के नाम काटे जा रहे हैं। लेकिन उतनी ही चिंता इस बात को लेकर है कि इतनी बड़ी संख्या में फॉर्म सात कौन जमा कर रहा है, जिसके जरिए लोगों के नाम काटने की अपील की जा रही है? सोचें, पश्चिम बंगाल में 38 लाख याचिकाएं न्यायाधिकरणों के सामने लंबित हैं, जिनमें से सिर्फ 22 लाख ही नाम जोड़ने वाली हैं बाकी 16 लाख आवेदन नाम काटने वाले हैं।
याद करें कैसे राहुल गांधी ने कर्नाटक की एक विधानसभा सीट के बारे में प्रेजेंटेशन देते हुए बताया था कि एक बार में थोक में छह हजार नाम काटने का आवेदन जमा हुआ था सब एक ही नंबर से कनेक्टेड था। यह कई जगह से शिकायत मिली है कि लोग फॉर्म सात भर कर दूसरों का नाम कटवाने की अपील दायर कर रहे हैं। इस खुलासे से चुनाव आय़ोग और खास कर मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय की शुचिता सवालों के घेरे में है। लोगों का संदेह बढ़ा है और धारणा के स्तर पर विपक्ष की जीत हुई है। आगे इससे केंद्र सरकार और भाजपा की मुश्किलें बढ़ेंगी।
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