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इन नतीजों के अच्छे अर्थ!

विधानसभा चुनाव 2023 कई कारणों से याद रहेगा। पहली बात कांग्रेस पागल होने से बच गई। पिछले सप्ताह मैंने लिखा था कि यदि कांग्रेस उम्मीद अनुसार जीती तो कहीं पागल न हो जाए। कल्पना करें तेलंगाना के साथ छतीसगढ़, मध्य प्रदेश में कांग्रेस जीत जाती तो क्या कांग्रेसियों का अहंकार नहीं बढ़ता? राहुल गांधी इसका श्रेय क्या अपने ओबीसी राग को नहीं देते?  तब जातीय जनगणना, ओबीसी राजनीति को पंख लगते। कांग्रेस के नेता इंडिया गठबंधन की बाकी पार्टियों को कुछ नहीं समझते। लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी नेताओं में दस तरह के मनमुटाव बनते। कांग्रेस और विपक्ष भाजपा की हार से जहां बम-बम होते वही रियलिटी में नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और अखिलेश आदि सब कांग्रेस से जले-भुने हुए भी होते। सो, चुनाव नतीजों से ‘इंडिया’ एलायंस के नेता जमीन पर रहेंगे। सभी को समझ आना चाहिए कि सबको इकठ्ठा होना होगा। वोटों की बूंद-बूंद चिंता करके ही लोकसभा चुनाव की मोर्चेबंदी बन सकती हैं।मई के लोकसभा चुनाव में मुकाबले के लिए अधिकतम पार्टियों को एकजुट होना होगा।

देश हित में सोचें तो सबसे बड़ी बात जनादेश से प्रदेशों की मिट्टी ऊपर-नीचे हुई है। सोचें, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना (कुछ हद तक छतीसगढ़ व मिजोरम भी) में एक या दो चेहरों के लगातार मुख्यमंत्री बने रहने से राजनीतिक-प्रशासनिक तौर पर ये राज्य क्या ठहर से नहीं गए थे? मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, राजस्थान में कभी वसुंधरा राजे, कभी अशोक गहलोत तो तेलंगाना में गठन के बाद से के चंद्रशेखर राव के परिवार या मिजोरम में जोरमथंगा या ललथनहवला के बीच लगातार कुर्सी से क्या बना हुआ है? इन चेहरों की निरंतरता या अदला-बदली ने प्रशासन और व्यवस्था के ढर्रे को जड़ तथा भ्रष्ट बनाया हुआ है।

क्या तेलंगाना लगातार चंद्रशेखर राव परिवार और ओवैसी के ठेके में बंधा हुआ नहीं था? क्या शिवराज सिंह चौहान की निरंतर सत्ता से मध्य प्रदेश एक नेता का ठिकाना नहीं हो गया था? ऐसे ही राजस्थान में अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे की निरंतरता से नौकरशाही भी अदला-बदली की व्यवस्था से एक ढर्रे में बंध गई थी? राजस्थान का उदाहरण मजेदार है। इन दो मुख्यमंत्रियों की अदला-बदली के साथ स्वार्थी-भ्रष्टाचारी अफसरों ने नेताओं के साथ साठ-गांठ में कमाऊ मंत्रालयों में अदला-बदली का स्थायी प्रबंध बनाया हुआ है। जैसे बतौर मिसाल राजस्थान में नंबर एक कमाऊ विभाग यूडीएच याकि शहरी विकास का है। भैरोसिंह शेखावत के बाद से इस मंत्रालय में लगातार जैन-बनिया मंत्री बन रहे हैं। नतीजतन एक सिस्टम बना है कि सरकार भले बदले लेकिन नए सेटअप में भी पुराने हटे मंत्री और सचिव, अफसर अपनी जाति, लेन-देन के अपने पसंदीदा लोगों, प्रदेश के हर शहर में बने भूमाफियाओं की दुकान बनवाए रखेंगे। वसुंधरा राजे के वक्त के सचिव संधू बाद में कांग्रेस के धारीवाल के यहां सलाहकार बन जाएंगे तो जेडीए हो या शहरों की यूआईटी सभी जगह अदला-बदली के साथ एक दूसरे से जुड़े अफसरों की अदला-बदली होगी। नेक्सस कभी टूट ही नहीं सकता।

सो राज भाजपा का हो या कांग्रेस का राजस्थान के यूडीएच में जैन-बनिया मंत्री रहेगा तो राजस्थान के रेवेन्यू मंत्रालय में जाट नेताओं का मंत्री बनना रिवाज है। वहीं पीडब्ल्यूडी-सड़क निर्माण में हमेशा सीएम वफादार कमजोर नेता। अशोक गहलोत ने भजनलाल जाटव को इस मंत्रालय में बैठा रखा था वही वसुंधरा राजे अपने खास युनूस खान को मंत्री बनाए हुए थी।  ऐसे ही माइनिंग मंत्रालय का मामला है। कोटा इलाके के एक तरफ धारीवाल यूडीएच चलाने वाले तो साथ ही प्रमोद जैन भाया माईनिंग विभाग में कर्ता-धर्ता। ऐसे ही कृषि मंत्रालय में जाट तो ऊर्जा मंत्रालय में आम तौर पर राजपूत मंत्री। एक जाति के ही नए और पुराने मंत्री या नए और पुराने सचिव, चेयरमैन से अपने आप मंत्रालय में जहां जातिगत आधिपत्य बना रहता है वही दलालों का नेटवर्क भी स्थायित्व के साथ काम करता है। जातिगत पहचान से लिंक बनते जाते हैं। मंत्रालयों-विभागों- बोर्ड, प्राधिकरणों आदि से लूटने का राजस्थान में कोई तीस साल से एक सिस्टम विकसित है। सरकार बदलने के साथ सचिव-चेयरमैन बदलता है तो उसकी जगह उससे जुड़ा भाजपाई वफादारी का दूसरा अफसर आ जाएगा।

निश्चित ही इस तरह का बासी मगर कमाऊ ढर्रा मध्य प्रदेश आदि उन राज्यों में भी है, जहां निरंतर एक पार्टी और एक चेहरे की कमान बनी हुई है। मेरा मानना है कि कांग्रेस के राज तक दिल्ली और लुटियन दिल्ली के एलिट ने केंद्र सरकार में जैसी जड़ता और भ्रष्टाचार का जो ताना-बाना बनाया था वह नरेंद्र मोदी के दिल्ली आने के बाद जैसे बदला है वैसा परिवर्तन कई राज्य राजधानियों के सत्ता केंद्रों में नहीं हुआ है। मगर पांच राज्यों के ताजा चुनाव नतीजों और प्रधानमंत्री मोदी के तीनों राज्यों में नए चेहरे उतारने के मूड से अब रियल परिवर्तन होता लगता है। इससे मध्य प्रदेश, राजस्थान और छतीसगढ़ का भला ही होगा। तेलंगाना में भी कांग्रेस का जीतना और नए चेहरे रेवंत रेड्डी का मुख्यमंत्री बनना प्रदेश के लिए फायदेमंद होगा। मिजोरम में भी जोरमथंगा या ललथनहवला की जगह नई जोरम पीपुल्स पार्टी के लालदुहोमा की जीत प्रशासन के लिए निश्चित ही फायदेमंद होगी।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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