ऐसा नहीं है कि भारत का सिर्फ आम आदमी या गरीब आदमी परजीवी है और सरकार की ओर से सम्मान निधि के नाम पर मिलने वाले पांच सौ या हजार, दो हजार रुपए के लिए सारे तरह के गैरकानूनी काम करता है। देश में जो सबसे बड़ा है वह भी परजीवी है। सबसे बड़ा कारोबारी भी दूसरे पर निर्भऱ है। भारत का सबसे बड़ा या दूसरा सबसे बड़ा कारोबारी भी यह नहीं कह सकता है कि उसने अपना कुछ निर्माण किया है, जिसकी वजह से उसको पूरी दुनिया से पैसा मिल रहा है। इल़ॉन मस्क दुनिया के पहले ट्रिलिनेयर बने तो उन्होंने किसी और उत्पाद बेच कर यह उपलब्धि नहीं हासिल की। मार्क जकरबर्ग या बिल गेट्स या सैम ऑल्टमैन या डारियो आमोदेई किसी और के उत्पाद की मार्केटिंग करके दुनिया भर से पैसा नहीं कमा रहे हैं। ये माई बाप सरकार की कृपा से ठेके या सब्सिडी हासिल करके भी ब़डे नहीं बने हैं। उलटे अमेरिका की सरकार तो इनका रास्ता रोक रही है, फिर भी ये बड़े बने हैं।
इसके उलट भारत में क्या हो रहा है? देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी ने पिछले दिनों अपनी सालाना आम सभा यानी एजीएम की मीटिंग की तो शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके सबसे ज्यादा समय तक निर्वाचित प्रधानमंत्री बनने पर बधाई और शुभकामना से की। यह संभवतः पहला मौका था, जब किसी उद्योग समूह की एजीएम को संबोधित करते हुए उसका मालिक अपने भाषण की शुरुआत में प्रधानमंत्री को बधाई दे, शुभकामना दे। ऐसा करने की जरुरत क्यों है यह समझने के लिए बहुत जानकार होने की जरुरत नहीं है। चाहे देश का सबसे बड़ा उद्योगपति हो या दूसरा, तीसरा, चौथा सबसे बड़ा उद्योगपति हो, सबको माई बाप सरकार की कृपा से काम करना है।
मुफ्त की जमीन लेनी है, जंगल कटवाने हैं, खदान लेने हैं, लाइसेंस और परमिट लेने हैं इसलिए सरकार की जय जयकार करनी है। कोई उद्योगपति रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर खर्च नहीं करता है। इसलिए वह अपना कोई उत्पाद नहीं बना सकता है।
अगर रिलायंस या अडानी समूह ने 10 साल पहले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में पैसा लगाया होता और उनके पास अपना लार्ज लैंग्वेज मॉडल यानी एलएलएम होता तो उनको इलॉन मस्क या मार्क जकरबर्ग का मुंह नहीं देखना होता। वे अपना उत्पाद बनाते और दुनिया भर से पैसा कमा कर भारत लाते। अगर उन्होंने सेटेलाइट में निवेश किया होता तो सेटेलाइट से इंटरनेट की सेवा देने के लिए स्पेसएक्स का वेंडर नहीं बनना होता। लेकिन आज स्थिति यह है कि रिलांयस या अडानी समूह के मालिक एआई की जो बात कर रहे हैं वह सिर्फ दुनिया की बड़ी कंपनियों का वेंडर बनने की बात है। उनके लिए डाटा सेंटर बनाने में साझीदार बनने की बात है। उनके एलएलएम पर आधारित सेक्टर स्पेशिफिक एप्लीकेशन बनाने की बात है।
भारत की बड़ी संचार कंपनियां स्पेसएक्स के जरिए सेटेलाइट से इंटरनेट सेवा देने का करार कर रही हैं। मेटा और अन्य कंपनियों के साथ डाटा सेंटर बनाने के करार कर रही हैं। उसी को एआई में बड़ा काम बता कर प्रचारित किया जा रहा है। देश का सबसे बड़ा उद्योग समूह दुनिया के सभी लक्जरी ब्रांड की फ्रेंचाइजी लेकर भारत में उसके उत्पाद बेच रहा है। यही भारत के आत्मनिर्भर होने का मॉडल है।


