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भाजपा की मुश्किल सहयोगी!

दूसरे चरण में भाजपा को अपने कमजोर सहयोगियों का नुकसान उठाना पड़ सकता है। खासतौर से महाराष्ट्र और बिहार में। इन दोनों राज्यों में भाजपा के साथ साथ उसकी सहयोगी पार्टियों की भी सीटें दांव पर लगी हैं। दूसरे चरण में बिहार में जिन पांच सीटों पर मतदान हुआ उन पांचों सीटों पर भाजपा के सहयोगी नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यू लड़ रही थी। पिछली बार जनता दल यू ने इनमें से चार सीटें जीती थीं। इनमें से एक सीट पूर्णिया तो ऐसी है, जो नीतीश कुमार ने 2014 में भी जीती थी, जब उनको पूरे प्रदेश में सिर्फ दो सीटें मिली थीं। सो, पूर्णिया तो प्रतिष्ठा की बात तो बाकी जगह भी जदयू को सीटें बचानी थीं।

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बिहार की रिपोर्ट यह है कि भाजपा ने इन पांच सीटों पर लड़ने के लिए जदयू को अकेले छोड़ दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सिर्फ एक सभा हुई। वह भी पहले चरण के मतदान का प्रचार बंद होने से एक दिन पहले 16 अप्रैल को। सोचें, 16 अप्रैल के बाद 26 अप्रैल तक मोदी प्रचार के लिए नहीं गए। पहले चरण में चार सीटों पर मतदान था तो मोदी तीन बार गए और तीन सीटों पर रैली की। लेकिन दूसरे चरण में जनता दल यू की पांच सीटों में से सिर्फ एक सीट पर रैली करने गए।

भाजपा द्वारा नीतीश को अकेले छोड़ने का नतीजा यह हुआ कि पार्टी के कार्यकर्ता भी उदासीन हुए। भाजपा के एक अन्य सहयोगी चिराग पासवान के साथ नीतीश कुमार के संबंधों में बहुत कड़वाहट है, जिसकी वजह से लोजपा और जदयू के कार्यकर्ता एक दूसरे के साथ बहुत सहयोग नहीं कर रहे हैं। ऊपर से सीमांचल के इलाके की सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है। किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया, बांका और भागलपुर की पांचों सीटों पर लड़ाई फंसी हैं। नीतीश कुमार भाजपा के साथ चले गए, इसके बावजूद भाजपा का सोशल मीडिया का इको सिस्टम उनके खिलाफ प्रचार करता रहा, इसका खामियाजा उनको भुगतना पड़ सकता है।

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बिल्कुल इसी तरह की स्थिति महाराष्ट्र में है, जहां भाजपा एकीकृत शिव सेना की भरपाई एकनाथ शिंदे वाली असली शिवसेना और अजित पवार वाली असली एनसीपी से करने की कोशिश में है। इसमें कितनी कामयाबी मिलेगी यह नहीं कहा जा सकता है लेकिन यह हकीकत है कि कांग्रेस के साथ उद्धव ठाकरे और शरद पवार का गठबंधन बहुत मजबूती से लड़ रहा है। लोगों की सहानुभूति उद्धव ठाकरे और शरद पवार दोनों के साथ है। दूसरे चरण में पश्चिमी विदर्भ की पांच और मराठवाड़ा की तीन सीटों पर मतदान हुआ है। इन आठ में से पिछली बार चार सीटें एकीकृत शिवसेनाने जीती थीं। भाजपा को तीन सीट मिली थी और अमरावती सीट निर्दलीय नवनीत राणा ने जीती थी। उन्होंने इस सीट पर शिव सेना के आनंदराव अडसुल को हराया था। आठ में से पांच सीटों पर शिव सेना लड़ी थी और चार पर जीती थी। इसलिए उद्धव ठाकरे ने इस दौर की सीटों पर बड़ी मेहनत की।

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दोनों गठबंधनों का फर्क यह है कि एक तरफ भाजपा ने एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री और अजित पवार को उप मुख्यमंत्री बना रखा है लेकिन आम मराठी मानुष के मन में यह भाव है कि दोनों केंद्रीय एजेंसियों से बचने के लिए ये भाजपा में गए हैं। भाजपा के सामने उनके सरेंडर करने की धारणा है तो दूसरी ओर कांग्रेस और शरद पवार ने उद्धव ठाकरे को गठबंधन के नेता के तौर पर प्रोजेक्ट किया है। ज्यादा सीटें देकर उनका मान बढ़ाया है। इसका फायदा महाविकास अघाड़ी को होता दिख रहा है। शिव सैनिक और व्यापक रूप से हिंदुत्व का समर्थक वोट भाजपा या असली शिवसेना के साथ जाने की बजाय महाविकास अघाड़ी की ओर मुड़ा है। ऊपर से मुस्लिम वोट का पूरा समर्थन उसे मिल रहा है। मराठा आरक्षण के मुद्दे पर जो राजनीति हुई उससे भी भाजपा के लिए मुश्किल है। मराठवाड़ा में मराठा बनाम ओबीसी की बहस महीनों तक चली है। मराठाओं को ओबीसी के तहत आरक्षण देने के विरोध में लोगों को आंदोलित करने वाले छगन भुजबल नासिक सीट से लड़ना चाहते थे लेकिन उनको सीट नहीं मिली। सो, मनमाफिक आरक्षण नहीं मिलने से मराठे नाराज हैं तो ओबीसी की भी नाराजगी है। बिहार की तरह महाराष्ट्र में भी भाजपा ने ही अपने दोनों सहयोगियों को पिछलग्गू के तौर पर स्थापित किया है। इसका नुकसान उसे उठाना पड़ सकता है।

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