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समय की लीला के डमरू ओह, समय!

विश्वगुरूता

बेचारा हुंकारों, झांकियों के फोटो और रीलों के शोर में दबा और ठिठका तथा देश-दुनिया को एक साथ डांवाडोल करता हुआ। साल छब्बीस की जनवरी के पहले ही पखवाड़े में भारत और दुनिया ने बहुत कुछ देखा। मंदिरों में उमड़ा हिंदुओं का सैलाब तो प्रधानमंत्री डमरू, बछड़े से प्रजा को झूमाते, थिरकाते हुए। भारत की सौ साल पहले पहचान सांप-सपेरों के फोटो से थी। आज वह पहचान डमरू, बछड़े और आस्था में उमड़ती भीड़ की है।

सो, नया जमाना है राजा के डमरू का, झांकियों और प्रजा के नाचने का। गाय है, गंगा है और फल-पुण्य प्राप्ति के लिए मंदिरों की ओर और गंगा स्नान के लिए लोगों का उमड़ना है। भले फिर गंगा में नाला गिरता दिखे या मंगला दर्शन धुंध-कोहरे-जहरीली, दमघोंटू हवा में हो! कोई सौ साल पहले एक विवेकानंद थे, जिन्होंने नौजवानी की स्फूर्ति में भारत का एक वैश्विक संदेश बनाया था। अब राजा संग वह सेनापति अजित डोवाल हैं, जिन्होंने इस पखवाड़े भारत के युवाओं को संदेश दिया- उठो, जागो और इतिहास का बदला लो। सो, राजा ने डमरू बजाया। गाय की पूजा की और सेनापति ने ललकारा तो वही भाजपा-संघ के सेनानियों ने चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी के दिमागी चेहरों से समझा कि पुनर्जागरण का असल मंत्र हिंदी-चीनी भाई-भाई है!

पर समय के स्वांग में भारत ही नहीं पूरी दुनिया लिपटी हुई है। क्या कभी यह कल्पना थी कि ग्रीनलैंड में यूरोपीय संघ याकि नाटो के लड़ाकू विमानों, सैनिकों के उतरने के फोटो होंगे क्योंकि अमेरिका से एक नाटो देश डेनमार्क को खतरा है? व्हाइट हाउस में ग्रीनलैंड-डेनमार्क के नेता घिघियाते हुए कि हमें तो बख्शो! मगर अमेरिकी राष्ट्रपति इस जिद्द पर कायम कि मुझे तो ग्रीनलैंड चाहिए। सो, नाटो के यूरोपीय देश ही नहीं ट्रंप की दिन-प्रतिदिन की बातों के आगे कथित महाशक्ति रूस और चीन भी बेजुबां। ईरान के अयातुल्लाह की जिस धर्मसत्ता का रूस और चीन दोनों ने फायदा उठाया (भारत ने भी धंधा किया) उनमें यह कहने की हिम्मत नहीं जो जुबानी जमाखर्च में ही बोलें कि कैसे ट्रंप अपनी दादागिरी कर रहे हैं। हम ईरान की मदद के लिए वहां सैनिक भेज रहे हैं।

बातों-बातों में डोनाल्ड ट्रंप ने 48 साल पुरानी इस्लामी धर्मसत्ता के पाए हिला दिए। और एक भी देश सहानुभूति में उसके साथ खड़ा नहीं है। वेनेजुएला और ईरान दोनों से साल छब्बीस के पहले पखवाड़े यह सर्वकालिक सत्य साबित हुआ है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस। बड़बोले नेता व धर्म की सत्ता में प्रजा भले 48 साल मूर्ख, गंवार बनी रहे लेकिन वह देश शक्तिमान नहीं हो सकता। देश और सभ्यता बाहरी ताकत के आगे एक झटके में भरभरा कर ढह जाती है।

इसलिए ट्रंप-अमेरिका के आगे इस पखवाड़े सभी देशों ने डमरू बजाया मगर डोनाल्ड ट्रंप टस से मस नहीं हैं। असल वजह शक्तिमान अमेरिका की वास्तविकताएं हैं। समय यदि आज अनिश्चितता, झूठ में डांवाडोल है तो वजह अमेरिका है या उसकी नकल (पूंजी-पुरुषार्थ-मेहनत) में खड़ा हुआ एक हद तक चीन है।

इस पखवाड़े की खबर थी कि ट्रंप-अमेरिका के झटके के बावजूद दुनिया को सामान बेच कर चीन ने विदेश व्यापार से इतना मुनाफा कमाया जो भारत की कुल जीडीपी के एक तिहाई बराबर है। सो, इधर डमरू और उधर मुनाफा। वही दूसरी तरफ पखवाड़े में अमेरिकी राष्ट्रपति की दिन-प्रतिदिन के हुंकारे थे। अमेरिकी क्षमता का यह कमाल भी देखने को मिला कि अंतरिक्ष यात्रा कर रहे एक यात्री की तबीयत खराब हुई तो अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से स्पेसएक्स का क्रू-11 मिशन समय से पहले पृथ्वी लौट आया। मतलब एक यात्री की चिंता में अंतरिक्ष विमान का वैसे ही लौट आना जैसे कोई बस वापिस लौट आए। आपातकालीन स्थिति में प्राइवेट कंपनी के स्पेसएक्स का सुरक्षित लौट आना क्या बताता है?

इसका अर्थ यह नहीं कि अमेरिका का समय अच्छा है। ढाई सौ साल पूरे करने वाला अमेरिका भी ट्रंप के डमरू का मारा है। अनिश्चितताओं, उत्पातों, संकटों में अमेरिका भी है। अमेरिका का अंदरूनी पानीपत मैदान भविष्य के भारी खतरे लिए हुए है। बावजूद इसके वहां जो भी है वह अमेरिकियों की उस क्षमता के दायरे में है, जो पखवाड़े में अंतरिक्ष के स्पेसएक्स के फोटो से जाहिर हुई है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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